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नेपाल में नाजीपथ का नजारा : रणधीर चौधरी

हिमालिनी  अंक अगस्त , सितंबर  2019 |किसी भी देश मे सरकार प्रमुख अगर देश बाहर हो तो नियमतः सरकार के काफिले में रहे उप–प्रमुख को जिम्मेदारी प्राप्त होती है देश की गतिविधि आगे बढ़ाने की । हमारे देश नेपाल में तो और दो उप–प्रधानमन्त्री की मौजुदगी है । देश के प्रधानमन्त्री खडग प्रशाद शर्मा ओली जब अपने स्वास्थोपचार हेतु सिंगापुर गए तो संबैधानिक प्रावधान अनुसार इश्वर पोखरेल को कार्यवाहक प्रधानमन्त्री बनाया गया था ।

ऐसी अनुकूल अवस्था में इलाज करवा रहे प्रधानमन्त्री ने विडियो प्रविधि का प्रयोग कर मन्त्रिपरिषद की बैठक क्यों करवाई उन्हें पता होगा । परंतु इस से दो चीज स्पष्ट है । पहला, उनके अलावा नेपाल के प्रति न तो कोई वफादार है और न ही किसी को स्नेह है देश से । दूसरा, उनके खुद के मन्त्रीमण्डल में विश्वास का स्खलन (ट्रस्ट डिफिसिट) है । परंतु प्रधानमन्त्री को यह नही भूलना चाहिए था कि जनता के कर से उपचार करा रहे प्रम को मानसिक रूप से भी आराम की आवश्यकता थी ।

प्रविधि का प्रयोग करना गलत हो ही नही सकता मन्त्रिपरिषद की बैठक विडियो प्रविधि से संचालन करना न की अशोभनीय है बल्कि सुरक्षा की दृष्टिकोण से भी घातक सिद्ध हो सकता है । नेपाल की प्रविधि की औकात तो चीन के ह्याकर ने हाल के एटीएम काण्ड से पर्दाफास कर दिया है । गौरतलब है की विडियो क्याबिनेट के बाद जितनी आलोचना हुई प्रधानमन्त्री की उसके बाद उनके स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर ही पड़ा होगा ।

राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग, सम्पत्ति शुद्धिकरण विभाग और राजस्व अनुसन्धान विभाग समेत प्रधानमन्त्री कार्यालय मातहत मे रखने वाले ओली सरकार द्वारा लाया गया मिडिया काउन्सिल विधेयक, मानव अधिकार आयोग विधेयक आदि अन्य विधेयक जिस तरीके से लाया गया है उसने वर्तमान सरकार को ना सिर्फ आलोचित किया है बल्कि सरकार तानाशाही पथ पर आगे निकल चुकी हैयह धारणा पुष्ट होती है । सरकार की एकलवादी छवि की चर्चा न सिर्फ आलोचक और प्रतिपक्षी के द्वारा किया जा रहा है अपितु सरकार पक्ष के वरिष्ठ नेतागण भी करने लगे हैं ।
वर्तमान सरकार द्वारा किए गए आप्पतिजनक निर्णय और व्यवहारों का अगर कोई आलोचक आलोचना करे तो सरकार द्वारा पालित अघोषित लठैतों द्वारा प्रहार किया जाता है । उपर उल्लेखित बिल और सरकार भीतर के ‘ट्रस्ट डिफिसिट’ को देखा जाय तो उदारवाद और उत्तरआधुनिक युग मे सर्बसत्ता की मनोवृति की पुनरावृत्ति की झलक है ये ।

वर्तमान सरकार का रवैया को देख मुझे जर्मनी के नाजी पार्टी का संगठन आँधी दल की सान्दर्भिकता की याद आती है । हिटलर का पार्टी था नाजी दल । आँधी दल का काम था कि नाजी सिद्धान्त का प्रचार करना, अपने दल के बैठक की रक्षा करना । दूसरा समुह था विशिष्ट वर्ग का रक्षक । अपने दल के नेताओ के साथ रक्षक के रूप में रहकर नेताओ का आँख बन्द कर पालन करना ।

व्यपारी वर्ग और उद्योगपति नाजी दल के साम्यवादी विरोध भावना से प्रसन्न था । साथ ही में उनलोगो का सिमेटिक विरोधी नीति की घोषणा से भी उद्योगपतियो को प्रसन्नता हुई । राजनीति के पण्डित मैकियावेली के सिद्धान्त से प्रभावित था हिटलर । मैकियावेली का मानना है कि अपने उदेश्य पूर्ति के लिए किसी भी प्रकार का अच्छा या बुरा उपाय अपनाना चाहिए ।

अभी समाजिक संजाल मे जिस तरह से सरकार के ‘डिजिटल लठैत’ काम कर रहे हैं उससे हिटलर का आँधी दल (स्ट्रोम विंग) की याद आती है । उसी तरह वर्तमान सरकार की कोई आलोचना करे तो सरकार के गलत कदम को वैधानिकता का लेप लगाने के लिए सरकार के कुछ ‘बौद्धिक बहलमान’ सामने आते दिखते हैं, हिटलर के रक्षकों के जैसा । उसी तरह मेडिकल शिक्षा का क्षेत्र हो या अन्य व्यपारीवर्ग जिसकी सत्ता से सामिप्यता है उन्हें वर्तमान सरकार से नाखुश होने का सवाल ही पैदा नहीं होता । समाजवाद के आवरण में चाकर पुँजीवादियाें को सरकार से प्राप्त हो रहा बिशेष प्यार किसी से छिपा नही ।

सिंगापुर से देश संचालन करके दिखाने वाला ‘जज्बा’ उनके पार्टी कार्यकर्ताओ के लिए जयकारा लगाने वाला कृत हो सकता है परंतु यह प्रम के एकलवादी सोच को दर्शाता है । क्या उप–प्रधानमन्त्री लगायत मन्त्रिमण्डल के सदस्यों को देश चलाने की सामथ्र्यता नही है ? या उनमे इमानदारी की कमी है ।

पिछले समय नेपाल भारत संयुक्त आयोग की बैठक में भाग लेने आए विदेशमन्त्री एस.जयशंकर और प्रधानमन्त्री ओली के बीच हुए एक घण्टे की गोप्यवार्ता (कनक्लेव) ओली की नीति को बहुत हदतक वर्णन करता है । नेपाल के परराष्ट्र मन्त्री प्रदिप ज्ञवाली को औपचारिकता के अलावा समय प्राप्त नही हो पाया समकक्षी जयशंकर से । भारत के विदेश मन्त्री के साथ नेपाल के प्रधानमन्त्री का मनमोहक लगााव देखने लायक था । आम संचार मे ओली जयशंकर के बीच हुई वार्ता के बारे में खास बिश्लेषण और टिप्पणी नही आया । परंतु गोप्य वार्ता के औचित्य, आवश्यकता और भारत को गालियाँ दे कर महान राष्ट्रवादी के स्वनिर्मित छवि बनाने मे सफल ओली की राष्ट्रवादिता की चर्चा होनी आवश्यक है । सपाट भाषा में कहा जाय तो जयशंकर को जितना हो सके ‘इंगेज’ कर के रखने का प्रयास था ओली का ताकि उनको भारत प्रति की भीतरी भक्ति का अनुभूति करा सके और दूसरे नेताओं से मिलने से वंचित कर सके । क्या ओली का यह कदम उनके एकलवादी सोच को स्पष्ट करने का आधार नही देता ?

उसी तरह नेकपा सरकार के संचारमन्त्री गोकुल बासकोटा ने पिछले महीने संविधान दिवस पर बियर पीने और छुट्टियाँ मनाने के लिए नही दिया जाएगा ऐसा फरमान जारी किया था । मन्त्री बासकोटा के उस बयान के पीछे क्या अभिप्राय था पता नही परंतु विवादित संविधान प्रति असंतुष्ट के लिए यह धमकी जरूर थी । संविधान संसोधन सहित के दो बुंदे कागज लेकर सरकार के सेयर धनी समाजवादी पार्टी को लज्जाबोध अवश्य हुआ होगा उनके ही संचारमन्त्री की अभिव्यक्ति से । वैसे तो संचारमन्त्री के परपीड़क प्रकृति की प्रतिक्रिया आम जनता के लिए पीड़ा सहित का गुदगुदाने का इतिहास रचा जा रहा है ।

हिटलर के समय मे भी शक्ति अनाधिकृत शक्ति की प्यास थी हिटलर एण्ड कम्पनी में । परंतु देश के स्वभिमान का कम्बल ओढकर राष्ट्रवाद का घी पीने का काम किया करता था । नेपाल वैसे पथ पर आगे न बढे यही देश हित में होगा ।

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