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यह समय सृष्टि के लिए चिंतित होने का है : श्वेता दीप्ति

 

डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय हिमालिनी, अंक मार्च 025 ।

प्राकृतिक प्रकोप, असामयिक मृत्यु, साँसों पर संकट ये ऐसी आपदाएँ हैं जो मन को डराती हैं । वैज्ञानिक बताते रहे हैं कि १९६० के दशक से तेजी से औद्योगिक विकास और जनसंख्या वृद्धि के नकारात्मक प्रभावों के कारण पृथ्वी की जलवायु में परिवर्तन आया है । ग्लोबल वार्मिंग मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन के अत्यधिक उपयोग और उनके द्वारा उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों के कारण होता है । कोयला, तेल और गैस जैसे संसाधनों के बढ़ते दोहन से वायुमंडल में अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित हो रही है । वनों की कटाई और भूमि क्षरण से भी वायुमंडल में अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होती है, तथा खेती से लेकर सिंचाई तकनीक तक की गतिविधियां भी ग्रीनहाउस गैसों का निर्माण करती हैं ।

इस स्थिति का सबसे अधिक प्रभाव नेपाल जैसे पर्वतीय देशों पर पड़ा है, जो प्राकृतिक संसाधनों और विरासत से समृद्ध हैं । नेपाल जैसे विकासशील देश जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण नहीं हैं, लेकिन हाल के समय में नेपाल वैश्विक जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित देश है । इसका नेपाल के पहाड़ों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, जिसमें मानव जीवन, सामाजिक–आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यटन विकास आदि शामिल हैं। परिणामस्वरूप, भारी वर्षा, सूखा, बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन और अनावृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा भी बढ़ रहा है ।

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ग्लेशियर ग्लोबल वार्मिंग से प्रभावित होने वाले सबसे संवेदनशील क्षेत्र हैं । किसी ग्लेशियर का आकार बर्फ पिघलने के अनुपात पर निर्भर करता है । इसका सीधा असर नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों में पहले ही देखा जा चुका है । नेपाल में कई हिमनदी झीलें अत्यधिक खतरे में हैं । पूर्व से लेकर सुदूर पश्चिम तक कई हिमनद झीलों की स्थिति खÞतरनाक है । दशकों से यह भविष्यवाणी की जा रही है कि ये झीलें कभी भी फट सकती हैं । पहाड़ उजाड़ हो रहे हैं । बढ़ते तापमान के कारण पहाड़ों में चट्टानें दिखाई देने लगी हैं । पर्वतारोही विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर बर्फ के पिघलने को लेकर चिंता व्यक्त कर रहे हैं । इसी प्रकार, प्रदूषण भी बढ़ रहा है क्योंकि पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर पर्वतारोहण के परमिट अंधाधुंध तरीके से जारी किए जा रहे हैं । अकेले माउंट एवरेस्ट पर प्रतिवर्ष हजारों टन कचरा जमा हो जाता है ।

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हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने तथा बर्फ पिघलने के कारण तराई में भीषण गर्मी बढ़ रही है तथा यह और भी तीव्र होती जा रही है । इससे न केवल आपदा जोखिम उत्पन्न हुआ है, बल्कि नागरिक सुरक्षा और संरक्षण के लिए अतिरिक्त समस्याएं भी उत्पन्न हुई हैं, जैसे कि नई और असाध्य बीमारियों का फैलना, कृषि उत्पादन पैटर्न में परिवर्तन, तथा पैदावार में गिरावट, जिसके परिणामस्वरूप अकाल और व्यापक विस्थापन हुआ है । इसकी शुरुआत हो चुकी है । नेपाल में तापमान प्रतिवर्ष औसतन ०.०४ डिग्री सेल्सियस की दर से बढ़ रहा है । यह वैश्विक औसत वृद्धि से कहीं अधिक है । उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान वृद्धि की दर भी बढ़ रही है । जलवायु परिवर्तन से गरीबी बढ़ती है और हाशिए पर पड़े तथा कमजोर समूहों को अधिक कठिनाई का सामना करना पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रवास में तेजी से वृद्धि होती है ।

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यह वास्तविकता छिपाई नहीं जा सकती कि दुनिया के औद्योगिक और धनी देश इस बढ़ती वैश्विक समस्या के लिए जिम्मेदार हैं । ग्रीनहाउस गैसों के मुख्य कारण के रूप में देखे जाने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का कारण माना जाता है, लेकिन इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि नेपाल, जिसकी इसमें कोई भूमिका नहीं है, लगातार कष्ट क्यों झेल रहा है ?
विभिन्न आंकड़े बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्र में तापमान तेजी से बढ़ रहा है । इसका नेपाल की कृषि व्यवस्था पर बड़ा प्रभाव पड़ रहा है । यह समस्या हमारी आर्थिक स्थिति को भारी नुकसान पहुंचा रही है । हमें कड़े कदम उठाने होंगे तथा जलवायु परिवर्तन से प्रभावित क्षेत्रों के उत्थान और प्रकृति संरक्षण के लिए, इसके प्रभाव को न्यूनतम करने के लिए कदम उठाना आवश्यक है ।

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