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केयू में सफलता के बाद अब टीयू की बारी: प्रो. भोला थापा के सामने नेपाल के सबसे बड़े विश्वविद्यालय को बदलने की चुनौती

 

काठमांडू, ३ जुलाई।। नेपाल के सबसे बड़े और सबसे पुराने उच्च शिक्षा संस्थान त्रिभुवन विश्वविद्यालय (टीयू) को नया नेतृत्व मिल गया है। सरकार ने काठमांडू विश्वविद्यालय (केयू) के पूर्व उपकुलपति प्रो. डॉ. भोला थापा को टीयू का नया उपकुलपति नियुक्त किया है। उनकी नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब त्रिभुवन विश्वविद्यालय वर्षों से शैक्षणिक अनियमितताओं, प्रशासनिक जटिलताओं, राजनीतिक हस्तक्षेप और परीक्षा परिणामों में लगातार हो रही देरी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है।

शिक्षा जगत की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या प्रो. थापा काठमांडू विश्वविद्यालय में किए गए सुधारों की तरह त्रिभुवन विश्वविद्यालय में भी बदलाव ला पाएंगे।

कौन हैं प्रो. भोला थापा?

प्रो. डॉ. भोला थापा नेपाल के प्रतिष्ठित शिक्षाविद् और मैकेनिकल इंजीनियर हैं। उन्होंने भारत के पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से स्नातक, बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (BITS Pilani) से स्नातकोत्तर तथा नॉर्वे के Norwegian University of Science and Technology (NTNU) से पीएचडी की है।

सन् 1994 में काठमांडू विश्वविद्यालय से जुड़े थापा ने शिक्षक, विभागीय जिम्मेदारियों, डीन, रजिस्ट्रार और अंततः उपकुलपति तक का लंबा प्रशासनिक अनुभव हासिल किया। ऊर्जा, जलविद्युत और इंजीनियरिंग शिक्षा उनके प्रमुख शोध क्षेत्र रहे हैं।

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केयू में कैसी रही उनकी कार्यशैली?

काठमांडू विश्वविद्यालय में अपने कार्यकाल के दौरान प्रो. थापा ने संस्थागत सुधार, शोध संस्कृति को बढ़ावा, डिजिटल प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर विशेष ध्यान दिया। विश्वविद्यालय में उद्योग और अकादमिक जगत के बीच सहयोग बढ़ाने की दिशा में भी उन्होंने कई पहल कीं।

हालांकि, उनके कार्यकाल में कुछ प्रशासनिक निर्णयों को लेकर आलोचनाएं भी हुईं, लेकिन शिक्षा क्षेत्र के कई विशेषज्ञ मानते हैं कि उन्होंने विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली को अधिक व्यवस्थित और आधुनिक बनाने की कोशिश की।

त्रिभुवन विश्वविद्यालय के सामने क्या हैं प्रमुख समस्याएं?

त्रिभुवन विश्वविद्यालय नेपाल के लाखों विद्यार्थियों की उच्च शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र है, लेकिन पिछले कई वर्षों से यह अनेक गंभीर समस्याओं का सामना कर रहा है।

इनमें प्रमुख हैं—

– शैक्षणिक कैलेंडर का नियमित रूप से लागू न हो पाना।
– परीक्षा और परिणाम प्रकाशित करने में महीनों की देरी।
– छात्र राजनीति और बाहरी हस्तक्षेप का बढ़ता प्रभाव।
– प्रशासनिक निर्णयों में सुस्ती।
– शोध और नवाचार पर अपेक्षाकृत कम ध्यान।
– अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा में पिछड़ना।

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इन चुनौतियों के कारण विश्वविद्यालय की साख और विद्यार्थियों का भविष्य दोनों प्रभावित हुए हैं।

नए उपकुलपति से क्या उम्मीदें?

शिक्षाविदों का मानना है कि प्रो. भोला थापा के अनुभव का लाभ त्रिभुवन विश्वविद्यालय को मिल सकता है। यदि वे समयबद्ध शैक्षणिक कैलेंडर लागू करने, परीक्षा प्रणाली को नियमित बनाने, प्रशासन में डिजिटल तकनीक का विस्तार करने और शोध गतिविधियों को बढ़ावा देने में सफल होते हैं, तो विश्वविद्यालय की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार संभव है।

इसके अलावा, विश्वविद्यालय में पारदर्शिता बढ़ाना, शिक्षकों और छात्रों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना तथा राजनीतिक हस्तक्षेप को सीमित करना भी उनके सामने बड़ी जिम्मेदारियां होंगी।

चयन प्रक्रिया भी रही प्रतिस्पर्धी

उपकुलपति पद के लिए बड़ी संख्या में शिक्षाविदों ने आवेदन किया था। प्रारंभिक चयन के बाद कुछ प्रमुख नामों को अंतिम सूची में शामिल किया गया, जिनमें से सरकार ने प्रो. डॉ. भोला थापा को इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के लिए चुना।

आसान नहीं होगी राह

विशेषज्ञों का मानना है कि काठमांडू विश्वविद्यालय और त्रिभुवन विश्वविद्यालय की परिस्थितियां एक-दूसरे से काफी अलग हैं। जहां केयू अपेक्षाकृत छोटा और प्रशासनिक रूप से अधिक व्यवस्थित संस्थान है, वहीं टीयू का ढांचा विशाल, जटिल और राजनीतिक प्रभाव से प्रभावित रहा है। ऐसे में केवल प्रशासनिक अनुभव ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि व्यापक संस्थागत सहयोग और मजबूत इच्छाशक्ति भी जरूरी होगी।

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निष्कर्ष

प्रो. डॉ. भोला थापा की नियुक्ति को त्रिभुवन विश्वविद्यालय के लिए एक नए अवसर के रूप में देखा जा रहा है। यदि वे अपने अनुभव, प्रशासनिक क्षमता और सुधारवादी दृष्टिकोण को प्रभावी ढंग से लागू कर पाए, तो नेपाल की उच्च शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा मिल सकती है। लेकिन यदि पुरानी समस्याएं और राजनीतिक दबाव हावी रहे, तो यह चुनौती उनके लिए भी आसान नहीं होगी। आने वाले वर्ष तय करेंगे कि उनका कार्यकाल त्रिभुवन विश्वविद्यालय के इतिहास में परिवर्तनकारी साबित होता है या नहीं।यदि यह रिपोर्ट किसी समाचार पोर्टल के लिए है, तो इसे और अधिक खोजी तथा विश्लेषणात्मक शैली में भी तैयार किया जा सकता है।

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