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डिजिटल युग का जासूसी युद्ध : चीन की रणनीति, नेपाल की चुनौती और खुफिया व्यवस्था : अनिल तिवारी

 

अनिल तिवारी, 13 जुलाई। कभी युद्ध जीतने के लिए हजारों सैनिकों, शक्तिशाली हथियारों और विशाल सैन्य शक्ति की आवश्यकता होती थी। लेकिन 21वीं सदी में युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। आज किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ी शक्ति बंदूक, मिसाइल या लड़ाकू विमान नहीं, बल्कि सूचना (Information) है। जो देश सही समय पर सही सूचना प्राप्त कर लेता है, वही राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, कूटनीति और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त हासिल करता है।

इसी कारण विश्वभर की खुफिया एजेंसियाँ पारंपरिक जासूसी से आगे बढ़कर तेजी से डिजिटल जासूसी की ओर रूपांतरित हो रही हैं। एक समय जासूस सीमापार गुप्त मुलाकातों, दस्तावेज़ों की चोरी या मानव स्रोतों (Human Intelligence) के माध्यम से सूचनाएँ एकत्रित करते थे। आज वे सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), साइबर तकनीक, उपग्रह, क्लाउड कंप्यूटिंग तथा खुले स्रोतों से उपलब्ध विशाल डेटा का विश्लेषण करके रणनीतिक सूचनाएँ प्राप्त कर रहे हैं।

डिजिटल युग ने जासूसी को केवल गुप्त गतिविधियों तक सीमित नहीं रखा है। आज प्रत्येक व्यक्ति का मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, बैंकिंग लेन-देन, यात्रा विवरण, लोकेशन, बायोमेट्रिक जानकारी और इंटरनेट गतिविधियाँ संभावित खुफिया स्रोत बन चुकी हैं। यही कारण है कि आधुनिक जासूसी का केंद्र अब सीमाओं से अधिक डिजिटल डेटा बन गया है।

चीन की उभरती डिजिटल खुफिया शक्ति

पिछले कुछ वर्षों में चीन विश्व की सबसे प्रभावशाली डिजिटल शक्तियों में से एक बनकर उभरा है। आर्थिक और सैन्य विकास के साथ-साथ उसने अपनी खुफिया क्षमताओं में भी अभूतपूर्व निवेश किया है। चीन का राज्य सुरक्षा मंत्रालय (Ministry of State Security – MSS) अब केवल पारंपरिक मानव स्रोतों पर निर्भर नहीं है, बल्कि डिजिटल माध्यमों को प्राथमिकता दे रहा है।

अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के खुफिया गठबंधन “फाइव आइज़ (Five Eyes)” द्वारा जारी रिपोर्टों के अनुसार चीन LinkedIn, Indeed और Upwork जैसे पेशेवर प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग करके सरकारी अधिकारियों, वैज्ञानिकों, सैन्य अधिकारियों, शोधकर्ताओं और रणनीतिक क्षेत्रों के विशेषज्ञों से संपर्क स्थापित कर रहा है।

शुरुआत में ये संपर्क सामान्य नौकरी, शोध या परामर्श प्रस्ताव के रूप में दिखाई देते हैं। लेकिन धीरे-धीरे इन व्यक्तियों से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न होने वाली संवेदनशील सूचनाएँ प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार इस प्रक्रिया में आकर्षक पारिश्रमिक, अंतरराष्ट्रीय अवसर और शोध अनुदान जैसे प्रलोभनों का भी उपयोग किया जाता है।

यह आधुनिक जासूसी के एक नए आयाम को दर्शाता है। अब किसी जासूस को गुप्त रूप से कार्यालय में प्रवेश कर दस्तावेज़ चुराने की आवश्यकता नहीं होती। यदि किसी व्यक्ति के डिजिटल व्यवहार, सामाजिक संबंधों और पेशेवर नेटवर्क का विश्लेषण कर लिया जाए, तो अत्यंत संवेदनशील जानकारी भी प्राप्त की जा सकती है।

आज दुनिया की अधिकांश खुफिया एजेंसियाँ ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (Open Source Intelligence – OSINT) को प्रमुख सूचना स्रोत के रूप में उपयोग कर रही हैं। OSINT का अर्थ है इंटरनेट, सोशल मीडिया, समाचार, सरकारी वेबसाइटों, शोध रिपोर्टों, सार्वजनिक अभिलेखों और अन्य खुले स्रोतों से उपलब्ध सूचनाओं का व्यवस्थित विश्लेषण।

पहले सार्वजनिक सूचनाओं को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था, लेकिन आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बिग डेटा के विकास के कारण हजारों स्रोतों से प्राप्त जानकारी का कुछ ही मिनटों में विश्लेषण करके किसी व्यक्ति, संस्था या राष्ट्र की गतिविधियों का विस्तृत चित्र तैयार किया जा सकता है।

इसी कारण चीन अपने एआई सिस्टम, विशाल डेटा भंडार और स्वचालित विश्लेषण प्रणालियों में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है। सामान्य प्रतीत होने वाली जानकारी—जैसे यात्रा विवरण, सोशल मीडिया की तस्वीरें, पेशेवर प्रोफ़ाइल, शोध पत्र या किसी सम्मेलन में भागीदारी—जब एक-दूसरे से जोड़ी जाती हैं, तो वे रणनीतिक महत्व की सूचना बन सकती हैं।

एआई : आधुनिक जासूसी का नया हथियार

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने जासूसी की प्रकृति को पूरी तरह बदल दिया है। एआई केवल डेटा विश्लेषण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसी व्यक्ति के व्यवहार का पूर्वानुमान लगाने, नकली डिजिटल पहचान (Fake Identity) तैयार करने, सोशल मीडिया पर लक्षित संदेश भेजने और विशाल मात्रा में सूचनाओं का वर्गीकरण करने में भी सक्षम है।

आज दुनिया की प्रमुख खुफिया एजेंसियाँ सेंटिमेंट एनालिसिस (Sentiment Analysis), फेसियल रिकग्निशन (Facial Recognition), वॉइस रिकग्निशन (Voice Recognition), पैटर्न डिटेक्शन (Pattern Detection) और प्रेडिक्टिव इंटेलिजेंस (Predictive Intelligence) जैसी एआई आधारित तकनीकों का व्यापक उपयोग कर रही हैं।

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चीन ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। बायोमेट्रिक डेटा, चेहरे की पहचान प्रणाली, सार्वजनिक निगरानी कैमरों और विशाल डेटा विश्लेषण प्रणालियों को एकीकृत कर उसने राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित सूचना प्रबंधन को अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया है।

यह आधुनिक जासूसी की एक नई वास्तविकता को स्पष्ट करता है—आज सबसे बड़ी शक्ति सूचना एकत्र करना नहीं, बल्कि उसका प्रभावी विश्लेषण करने की क्षमता है। नेपाल का परिप्रेक्ष्य

जब विश्व तेजी से डिजिटल खुफिया प्रणाली की ओर बढ़ रहा है, तब नेपाल की स्थिति अपेक्षाकृत भिन्न दिखाई देती है। नेपाल भू-राजनीतिक दृष्टि से भारत और चीन जैसी दो प्रमुख शक्तियों के बीच स्थित है। इसी कारण उसका रणनीतिक महत्व हमेशा से अत्यधिक रहा है।

यद्यपि नेपाल प्रत्यक्ष रूप से महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा का केंद्र नहीं है, फिर भी खुली सीमा, अंतरराष्ट्रीय आवागमन, साइबर अपराध, विदेशी प्रभाव, डिजिटल प्लेटफॉर्मों का विस्तार तथा संवेदनशील भू-राजनीतिक स्थिति के कारण यहाँ भी आधुनिक जासूसी की चुनौतियाँ लगातार बढ़ रही हैं।

हालाँकि, नेपाल की सुरक्षा व्यवस्था अभी भी काफी हद तक पारंपरिक मानव स्रोत (Human Intelligence) आधारित सूचना प्रणाली पर निर्भर है। सूचना संग्रह की पद्धति, आधुनिक तकनीक का उपयोग, साइबर अनुसंधान क्षमता तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रयोग में अभी व्यापक सुधार की आवश्यकता महसूस की जाती है।

इसी संदर्भ में राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग (National Investigation Department – NID) की भूमिका का नए दृष्टिकोण से पुनर्मूल्यांकन करना आवश्यक हो गया है। यह स्पष्ट हो चुका है कि आधुनिक राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों का सामना केवल पारंपरिक जासूसी से संभव नहीं है।

विश्व के अधिकांश विकसित देशों में खुफिया एजेंसियों को राष्ट्रीय सुरक्षा की पहली रक्षा पंक्ति माना जाता है। किसी भी सुरक्षा संकट के उत्पन्न होने से पहले संभावित जोखिमों का आकलन करना, उनका विश्लेषण करना तथा सरकार को समय रहते आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराना इन संस्थाओं का प्रमुख दायित्व होता है।

आधुनिक शासन व्यवस्था में खुफिया एजेंसियाँ केवल सूचना संग्रह करने वाली संस्थाएँ नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय नीति-निर्माण में सहयोग देने वाली रणनीतिक संस्थाएँ भी हैं। लेकिन नेपाल में राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग अभी तक अपेक्षित स्तर पर संस्थागत, तकनीक-सक्षम और स्वायत्त नहीं बन पाया है।

राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग का विकासक्रम

नेपाल के राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग की स्थापना पंचायती शासनकाल में नेपाल विशेष सेवा अधिनियम, 2042 (1985) के अंतर्गत की गई थी। उस समय यह विभाग सीधे प्रधानमंत्री के अधीन कार्य करता था।

सन् 1990 के राजनीतिक परिवर्तन के बाद कार्य-विभाजन नियमावली के माध्यम से इसे व्यवहारिक रूप से गृह मंत्रालय के अंतर्गत रखा गया। वर्ष 2018 में तत्कालीन प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सरकार ने इसे पुनः प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद कार्यालय के अधीन कर दिया।

इसके बाद सरकार बदलने के साथ इसे फिर गृह मंत्रालय में स्थानांतरित किया गया और वर्तमान में इसे पुनः प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन रखा गया है।

इस प्रकार विभाग का प्रशासनिक नियंत्रण बार-बार बदलना अपने आप में एक गंभीर नीतिगत समस्या है। खुफिया एजेंसी किसी सरकार के राजनीतिक हितों के अनुसार संचालित होने वाली संस्था नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के अनुरूप कार्य करना चाहिए। किंतु नेपाल में सरकार बदलने के साथ-साथ विभाग की संरचना और नियंत्रण में परिवर्तन होने की परंपरा ने इसकी संस्थागत स्थिरता को कमजोर किया है।

राजनीतिक हस्तक्षेप : एक दीर्घकालिक चुनौती

विश्लेषकों के अनुसार नेपाल की खुफिया प्रणाली के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक हस्तक्षेप है। प्रधानमंत्री या गृह मंत्री के बदलते ही विभाग की प्राथमिकताओं, नेतृत्व और कार्यशैली पर भी प्रभाव पड़ता है।

यद्यपि राजनीतिक नेतृत्व विभाग को अपने नियंत्रण में रखने में विशेष रुचि दिखाता है, लेकिन उसकी तकनीकी क्षमता बढ़ाने, अनुसंधान अवसंरचना विकसित करने, साइबर इंटेलिजेंस तथा आधुनिक उपकरणों में पर्याप्त निवेश नहीं किया गया है। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग आज भी मुख्यतः पारंपरिक कार्यशैली तक सीमित है।

खुफिया एजेंसी किसी राजनीतिक दल या सरकार का उपकरण बनने के बजाय राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने वाली एक पेशेवर संस्था होनी चाहिए। इसके लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था, संसदीय निगरानी, पारदर्शी प्रशासन और पेशेवर नेतृत्व आवश्यक हैं।

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पारंपरिक खुफिया प्रणाली की सीमाएँ

नेपाल की खुफिया प्रणाली अभी भी मुख्य रूप से ह्यूमन इंटेलिजेंस (HUMINT) पर आधारित है। अर्थात स्थानीय स्रोतों, प्रत्यक्ष मुलाकातों, मौखिक सूचनाओं और फील्ड रिपोर्टों के माध्यम से जानकारी एकत्र करना ही इसकी प्रमुख कार्यप्रणाली बनी हुई है।

इसके विपरीत, विश्व के विकसित देशों में अब साइबर इंटेलिजेंस (Cyber Intelligence), सिग्नल इंटेलिजेंस (SIGINT), ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT), जियोस्पेशियल इंटेलिजेंस (GEOINT) तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण को प्राथमिकता दी जा रही है।

यदि नेपाल केवल पुरानी पद्धति पर निर्भर रहता है, तो भविष्य में साइबर सुरक्षा खतरों, डिजिटल आतंकवाद, विदेशी प्रभाव अभियानों, आर्थिक अपराधों तथा अन्य रणनीतिक जोखिमों की समय रहते पहचान करना अत्यंत कठिन हो जाएगा। कानूनी सुधार क्यों आवश्यक हैं?

नेपाल विशेष सेवा अधिनियम को समयानुकूल बनाने के लिए कई बार प्रयास किए गए, लेकिन राजनीतिक मतभेदों के कारण नई कानूनी व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं हो सकी।

फोन टैपिंग, डिजिटल निगरानी, इंटरनेट इंटरसेप्शन तथा साइबर जांच से संबंधित अधिकारों को लेकर लंबे समय से यह बहस चल रही है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

एक ओर सुरक्षा एजेंसियों को प्रभावी जांच के लिए आवश्यक कानूनी अधिकार चाहिए, तो दूसरी ओर नागरिकों की गोपनीयता का संवैधानिक अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

इसलिए डिजिटल निगरानी और साइबर जांच के लिए न्यायालय की अनुमति, स्वतंत्र निगरानी तंत्र तथा स्पष्ट कानूनी मानकों के साथ व्यवस्था विकसित करना आवश्यक है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक मजबूत खुफिया संस्था जरूरी होती है, लेकिन उसका संचालन कानून, जवाबदेही और मानवाधिकारों की सीमाओं के भीतर ही होना चाहिए।

प्रौद्योगिकी में सीमित निवेश

नेपाल सरकार प्रत्येक वर्ष राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बजट आवंटित करती है, किंतु उसका अधिकांश भाग प्रशासनिक खर्च, वेतन-भत्तों और नियमित संचालन पर ही खर्च हो जाता है।

साइबर सुरक्षा अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बिग डेटा विश्लेषण, डिजिटल फॉरेंसिक प्रयोगशालाएँ, सुरक्षित डेटा केंद्र, उपग्रह आधारित सूचना विश्लेषण तथा आधुनिक निगरानी प्रणालियों में अपेक्षित निवेश अभी तक नहीं हो पाया है।

आज विश्व की विकसित खुफिया एजेंसियाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा तथा स्वचालित डेटा विश्लेषण पर अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं। यदि नेपाल का राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग भी आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी में पर्याप्त निवेश नहीं करता, तो भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करना कठिन होगा।

संघीय व्यवस्था और नई सुरक्षा चुनौतियाँ

नेपाल में संघीय व्यवस्था लागू होने के बाद केंद्र, प्रांत और स्थानीय सरकारों के बीच अधिकारों का विभाजन हुआ है। इससे प्रशासनिक संरचना में नए अवसर तो पैदा हुए हैं, लेकिन सुरक्षा के दृष्टिकोण से नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं।

साइबर अपराध, सीमा-पार अपराध, मानव तस्करी, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय अपराध, डिजिटल धोखाधड़ी, विदेशी प्रभाव अभियान तथा दुष्प्रचार (Disinformation) जैसी चुनौतियाँ अब इतनी जटिल हो चुकी हैं कि उनका समाधान केवल एक एजेंसी के माध्यम से संभव नहीं है।

इसलिए राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग, नेपाल पुलिस, सशस्त्र पुलिस बल, नेपाली सेना, सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े संस्थानों तथा अन्य सुरक्षा एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था और संयुक्त कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाना आवश्यक है।

नेपाल को क्या सीखना चाहिए?
सुधार की रणनीति और भविष्य की सुरक्षा दृष्टि

विश्व अब चौथी औद्योगिक क्रांति के साथ “सूचना युद्ध (Information Warfare)” के युग में प्रवेश कर चुका है। आज युद्ध केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं रह गया है।

किसी देश की विद्युत व्यवस्था को ठप कर देना, बैंकिंग नेटवर्क पर साइबर हमला करना, सोशल मीडिया के माध्यम से दुष्प्रचार फैलाना, सरकारी सर्वरों को हैक करना या किसी वरिष्ठ अधिकारी की डिजिटल गतिविधियों से रणनीतिक जानकारी प्राप्त कर लेना भी आधुनिक युद्ध का हिस्सा बन चुका है।

पिछले कुछ वर्षों में चीन ने इस परिवर्तन को एक अवसर के रूप में अपनाया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), बिग डेटा, क्लाउड कंप्यूटिंग, चेहरे की पहचान प्रणाली (Facial Recognition), बायोमेट्रिक डेटा, साइबर इंटेलिजेंस तथा ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) को एकीकृत करके उसने अपने खुफिया तंत्र को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।

इसका स्पष्ट अर्थ है कि आज जासूसी केवल गुप्त बैठकों या मानव स्रोतों तक सीमित नहीं रह गई है; अब यह तकनीक, डेटा और विश्लेषण का समन्वित रूप बन चुकी है।

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नेपाल भले ही महाशक्तियों जैसी विशाल खुफिया व्यवस्था विकसित न कर सके, लेकिन वह आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने में सक्षम, तकनीक-सक्षम और जवाबदेह खुफिया प्रणाली अवश्य विकसित कर सकता है। इसके लिए कुछ बुनियादी सुधार अत्यंत आवश्यक हैं।

प्रौद्योगिकी सुरक्षा एजेंसियों को अधिक सक्षम बनाती है, लेकिन उसका उपयोग कानूनी सीमाओं के भीतर होना भी उतना ही आवश्यक है। नागरिकों की निजता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल आधार हैं।

इसलिए फोन टैपिंग, डिजिटल निगरानी, इंटरनेट इंटरसेप्शन और बायोमेट्रिक डेटा के उपयोग जैसे विषयों पर स्पष्ट कानून, न्यायालय की अनुमति, स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था तथा संसदीय जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए।

एक प्रभावी खुफिया एजेंसी केवल शक्तिशाली ही नहीं, बल्कि उत्तरदायी भी होनी चाहिए।अनुसंधान और नवाचार में निवेश

नेपाल में राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित अनुसंधान संस्कृति अभी अपेक्षाकृत कमजोर है। विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित कर साइबर सुरक्षा, डिजिटल जासूसी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, भू-राजनीति तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अध्ययनों को प्रोत्साहित करना आवश्यक है।

विश्व के अनेक विकसित देशों में विश्वविद्यालयों और खुफिया एजेंसियों के बीच घनिष्ठ सहयोग के माध्यम से नई तकनीकों का विकास किया जा रहा है। नेपाल को भी ऐसे अनुभवों से सीख लेते हुए अनुसंधान और नवाचार को राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का अभिन्न अंग बनाना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता

साइबर अपराध और डिजिटल जासूसी की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। इसलिए नेपाल को क्षेत्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ सूचना आदान-प्रदान, संयुक्त प्रशिक्षण, साइबर अनुसंधान तथा क्षमता विकास के क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार करना चाहिए।

विशेष रूप से दक्षिण एशिया तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखते हुए नेपाल की सुरक्षा एजेंसियों को अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से सीखने और अपनी प्रणालियों को समयानुकूल बनाने का निरंतर प्रयास करना होगा।

भविष्य का राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग कैसा होना चाहिए?

भविष्य का राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग केवल सूचना एकत्र करने वाला पारंपरिक कार्यालय नहीं होना चाहिए, बल्कि वह एक उच्च तकनीक-संपन्न, विश्लेषण-आधारित, उत्तरदायी और पूर्णतः पेशेवर संस्था होना चाहिए।

इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से संभावित जोखिमों का पूर्वानुमान लगाने, साइबर हमलों के शुरुआती संकेतों की पहचान करने, सोशल मीडिया पर फैलने वाले दुष्प्रचार का विश्लेषण करने, आर्थिक सुरक्षा से जुड़े जोखिमों का आकलन करने तथा राष्ट्रीय नेतृत्व को समय पर रणनीतिक सुझाव देने की क्षमता विकसित की जानी चाहिए।

साथ ही, राष्ट्रीय अनुसन्धान प्रणाली को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का विषय बनाने के बजाय राष्ट्रीय सहमति के आधार पर संचालित होने वाली दीर्घकालिक संस्था के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
संस्थागत स्थिरता, तकनीकी क्षमता, स्पष्ट कानूनी ढाँचा और जनता का विश्वास—इन चार स्तंभों के बिना कोई भी आधुनिक खुफिया प्रणाली प्रभावी नहीं हो सकती।
प्रसिद्ध चीनी सैन्य रणनीतिकार सुन त्ज़ु (Sun Tzu) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “द आर्ट ऑफ़ वॉर (The Art of War)” में लिखा है—”यदि तुम स्वयं को और अपने शत्रु को जानते हो, तो तुम्हें सौ युद्धों में भी पराजय का भय नहीं रहेगा।”

डिजिटल युग में यह विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। आज का युद्ध सूचना, डेटा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और साइबर क्षमताओं पर केंद्रित होता जा रहा है।

नेपाल को अपनी भू-राजनीतिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए अपनी राष्ट्रीय खुफिया प्रणाली को नए युग के अनुरूप रूपांतरित करना ही होगा। केवल प्रशासनिक नियंत्रण या संगठनात्मक ढाँचे में परिवर्तन से खुफिया व्यवस्था प्रभावी नहीं बन सकती।

वास्तविक आवश्यकता दीर्घकालिक राष्ट्रीय नीति, आधुनिक तकनीक में निवेश, प्रशिक्षित एवं दक्ष मानव संसाधन, स्पष्ट कानूनी आधार तथा संस्थागत स्वायत्तता की है।

यदि नेपाल समय रहते इन सुधारों को लागू कर सका, तो राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग भविष्य की जटिल सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने में सक्षम, विश्वसनीय और प्रभावशाली संस्था के रूप में स्थापित हो सकता है। अन्यथा, डिजिटल युग में तेजी से बदलते जासूसी युद्ध के बीच नेपाल हमेशा प्रतिक्रियात्मक स्थिति में ही सीमित रहने का जोखिम उठाएगा।

अनिल तिवारी
बीरगंज

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