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बहुमत के मर्म पर राष्ट्रपति की सख्ती—संवैधानिक परिषद अध्यादेश सरकार को लौटाया

 

 

काठमांडू, 3 मई । नेपाल में संवैधानिक प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। राष्ट्रपति कार्यालय ने सरकार द्वारा सिफारिश किए गए संवैधानिक परिषद से संबंधित अध्यादेश को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया है।

राष्ट्रपति के कानूनी सलाहकार बाबुराम कुँवर के अनुसार, अध्यादेश का गहन अध्ययन करने के बाद इसे वर्तमान स्वरूप में जारी करना उचित नहीं समझा गया। राष्ट्रपति ने विशेष रूप से इस बात पर आपत्ति जताई कि प्रस्तावित प्रावधान बहुमतीय प्रणाली की मूल भावना को कमजोर कर सकता है।

दरअसल, 14 बैशाख को मंत्रिपरिषद की बैठक ने संवैधानिक परिषद (काम, कर्तव्य, अधिकार और कार्यविधि) संशोधन अध्यादेश, 2083 को राष्ट्रपति कार्यालय भेजा था। इस संशोधन में यह प्रस्ताव रखा गया था कि परिषद की बैठक चार सदस्यों की उपस्थिति में हो सके और उपस्थित सदस्यों के बहुमत—यानी केवल तीन सदस्यों के निर्णय से भी फैसला लिया जा सके।

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राष्ट्रपति पौडेल ने इसी व्यवस्था पर असहमति जताते हुए कहा कि जब परिषद में कुल छह सदस्य हैं, तो निर्णय कम से कम चार सदस्यों की सहमति से ही होना चाहिए। उनके अनुसार, तीन सदस्यों द्वारा लिया गया निर्णय बहुमत की संवैधानिक अवधारणा के विपरीत होगा।

राष्ट्रपति कार्यालय के प्रवक्ता रितेश कुमार शाक्य द्वारा जारी विज्ञप्ति में यह भी उल्लेख किया गया कि इस निर्णय के दौरान पूर्व में संसद से पारित विधेयकों, पूर्व सरकार द्वारा सिफारिश किए गए अध्यादेशों तथा सर्वोच्च अदालत के नज़ीरों को भी ध्यान में रखा गया है।

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संवैधानिक परिषद, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं, में सभामुख, राष्ट्रीय सभा अध्यक्ष, प्रधान न्यायाधीश, प्रमुख प्रतिपक्ष के नेता और उपसभामुख सदस्य होते हैं। ऐसे में राष्ट्रपति का मानना है कि इस संरचना में बहुमत का अर्थ कम से कम चार सदस्यों की सहमति होना चाहिए।

वहीं, सरकार का तर्क है कि संवैधानिक पदाधिकारियों की नियुक्ति प्रक्रिया में बाधा न आए, इसके लिए यह संशोधन आवश्यक है। हालांकि, राष्ट्रपति ने नैतिक और संवैधानिक जटिलताओं को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों, संविधानविदों और नेपाल बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों से भी परामर्श किया था।

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अंततः, बहुमतीय प्रणाली की रक्षा को प्राथमिकता देते हुए राष्ट्रपति ने अध्यादेश को पुनर्विचार के लिए सरकार के पास लौटा दिया है। यह कदम नेपाल की संवैधानिक राजनीति में एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जहां प्रक्रिया और सिद्धांत के बीच संतुलन की बहस फिर से तेज हो गई है।

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