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आत्महत्या ! आखिर इसका समाधान क्या है ? : श्वेता दीप्ति

 
क्यों हार जाता है मन ?
हिमालिनी,अंक अगस्त,2019 (सम्पादकीय)| आत्महत्या । एक डरावना शब्द । एक शब्द, जो आँखों के सामने मौत का भयावह मंजर खड़ा
 कर देता है । कहने को इसके अर्थ मनचाही मौत से जुड़ते हैं लेकिन सच यह है कि यह एक अनचाही और अनपेक्षित मौत की दर्दनाक 
स्थिति है । एक हँसते–खेलते जीवन का त्रासद अंत । फाँसी, जÞहर, आग और नदी जैसे कितने ही नए–पुराने तरीके मौत को गले लगाने 
के लिए आजमाएँ जा रहे हैं । पिछले समय में आत्महत्या की कई ऐसी घटनाएँ देश में सामने आई हैं जिसने मन विचलित कर दिया है ।

ये आत्महत्या करने वाले वो अवकाशप्राप्त व्यक्ति थे जिन पर भ्रष्टाचार का आरोप था । यह सवाल हमेशा जेहन को कुरेदता है कि क्या ये आत्महत्या आत्मग्लानि की वजह से की गई या कि समाज की बदलती निगाहों या उपेक्षाओं से बचने के लिए की गई ? जिन्दगी भर जिस ओहदे पर आपने काम किया इज्जत पाई क्या उसे खोने के डर से यह आत्मघाती कदम उठाते हैं ? कई बार वह व्यक्ति जो हमेशा से एक साफ सुथरे जीवन या कैरियर को जीता है उस पर जब बेबुनियाद आरोप लगाए जाते हैं तो वह सहन नहीं कर पाता ऐसे में अगर वो अपने परिवार के बीच रहकर भी मानसिक रूप से अकेला होता है तब वह ऐसे अवांछित कदम को उठाता है । बहुत हद तक उस वक्त यह जिम्मेदारी परिवार पर होती है कि ऐसे समय वो साथ खड़ा रहे ।

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किशोरावस्था में की गई आत्महत्या तो रुह को कँपा जाती है । इनके पीछे की वजह तो ऐसी होती है जहाँ माता पिता ही कटघरे में आ जाते हैं । जो बच्चे आपकी सपनों का आधार होते हैं, उन्हें ही आपकी बातें चुभ जाती हैं । कभी वजह किशोरावस्था का आकर्षण होता है, जिसे वो प्यार समझ बैठते हैं, तो कभी उनके परीक्षा का परिणाम वजह बन जाता है, जहाँ अभिभावक की कसौटी पर वो खरे नहीं उतर पाते और यह निर्मम कदम उठा लेते हैं और आजकल तो मोबाइल जैसे उपकरण वजह बनने लग गए हैं । एक पूरा जीवन जो इस धरा पर आने में सतरंगे सपनों से लेकर नौ माह का खूबसूरत समय लेता है, अचानक अपनों को रोता–बिलखता छोड़कर चल देता है अज्ञात में सुख खोजन े। क्या जरूरी है कि मौत के बाद सारी समस्याएँ सुलझ जाएँगी ? असमय प्रकृति का नियम तोड़ने से हो सकता है आप और अधिक अनजानी–अजीब समस्याओं के जाल में उलझ जाएँ ।

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बहरहाल, आत्महत्याओं के बढ़ते आँकड़ों से निकलती आह को अनसुना नहीं किया जा सकता ।
आत्महत्या को कायरता से जोड़ देने का प्रचलन भी पुराना है, लेकिन आत्महत्या को कायरता मानते हुए भी, यह कहना जरूरी है कि उन मनःस्थितियों, जिनमें कोई व्यक्ति खुद को खत्म कर लेने से जैसा कदम उठाता है, उसे समझना आसान नहीं है । पर कोशिश तो की ही जा सकती है । और सामाजिक व्यवस्था में भी यह उम्मदि करनी चाहिए कि कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है कि उसने गलती नहीं की हो ऐसे में किसी का सामाजिक वहिष्कार करने से पहले खुद को जरुर आँके तभी किसी पर ऊँगली उठाएँ ।

हम यह सकते हैं कि आखिर इसका समाधान क्या है ? समाधान कहीं और से नहीं हमारे ही भीतरहै । खुद को खत्म कर देने की बात जब आती है तो दूसरों को दोष देने में थोड़ा संकोच होता है । वास्तव में हम स्वयं ही हमारे लिए जिम्मेदार होते हैं । कोई भी दुख या तकलीफ जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती । हर व्यक्ति के जीवन में ऐसा दौर आता है जब सबकुछ समाप्त सा लगने लगता हैं लेकिन इस का यही तो सार नहीं कि खुद ही खत्म हो जाएँ ।

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हर आत्महत्या करने वाले को एक बार, सिर्फ एक बार यह सोचना चाहिए कि क्या उसकी जिंदगी सिर्फ उसकी है ? हमें कोई हक नहीं उस जिंदगी को समाप्त करने का जिस पर सिर्फ हमारा नहीं हमारे अपनों का भी अधिकार होता है । जब रोशनी की एक महीन लकीर अंधेरे को चीर सकती है ।

जब एक तिनका डूबते का सहारा हो सकता है और एक आशा भरी मुस्कान निराशा के दलदल से बाहर ला सकती है तो फिर भला मौत को वक्त से पहले क्यों बुलाया जाए ? जिंदगी परीक्षा लेती है तो उसे लेने दीजिए, हौसलों से आप हर बाजी जीतने का दम रखते हैं, यह विश्वास हर मन में होना चाहिए ।

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