Tue. May 12th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

मधेश की उम्मीद बने बालेन, क्या विभेद की दीवार गिरेगी ? : डॉ.श्वेता दीप्ति

imagr_balen_pm
 

मुख्य हाइलाइट्स 

  • पुराने दलों का पतन: नेपाली कांग्रेस (१८ सीट) और एमाले (९ सीट) का ऐतिहासिक रूप से कमजोर होना। यह जनता द्वारा भ्रष्टाचार और अस्थिरता के विरुद्ध दिया गया ‘दंड’ है।

  • ‘ओली प्रवृत्ति’ की हार: केपी ओली की कार्यशैली—संसद भंग करना और कुशासन—को जनता ने सिरे से नकार दिया है।

  • बालेन शाह का उदय: बालेन ने खुद को “मधेश का बेटा” बताकर और मैथिली में संवाद कर मधेशी युवाओं के बीच एक नया भरोसा जगाया है। उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखा जा रहा है।

  • मधेशी दलों का संकट: दशकों से मधेश की राजनीति करने वाले क्षेत्रीय दल (जसपा, लोसपा) लगभग संसद से बाहर हो गए हैं। मतदाताओं ने मुद्दे नहीं, बल्कि नेतृत्व बदल दिया है।

  • नई राजनीतिक ध्रुवीकरण: भविष्य में संघर्ष कांग्रेस (पुरानी शक्ति) बनाम रास्वपा (नई शक्ति) के बीच होने की संभावना है, जिससे कम्युनिस्ट प्रभाव घट सकता है।

  • बड़ी चुनौती: ‘अति-आशा’ कहीं निराशा में न बदल जाए। क्या ये नए चेहरे सुशासन और भ्रष्टाचार मुक्त नेपाल का सपना सच कर पाएंगे?

 

imagr_balen_pm

डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी आवरण, अंक अप्रैल । नेपाल ने अक्सर अप्रत्याशित घटनाक्रम और उसके परिणाम को देखा है । जेन जी आन्दोलन के बाद हुए चुनाव परिणाम ने भी यही साबित किया है । ये परिणाम और जनता के उत्साह को देखकर यही लग रहा है कि जनता बहुत अधिक उत्साहित, आशावादी और परमानंद की स्थिति में हैं । पहले यह डर था कि चुनाव होगा या नहीं, कहीं हत्या–हिंसा न हो जाए, या देश फिर से अस्थिरता में ही न उलझ कर रह जाए ।
लेकिन लोकतंत्र की एक अच्छी तस्वीर सामने आई कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव संपन्न हुआ और एक प्रकार का निकास या समाधान सामने आया । जीतने और हारने वाले दोनों पक्षों ने अब तक इसे बहुत संयम के साथ स्वीकार किया है । देश की प्रथम अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की इस मामले में सक्षम रहीं ये और बात है कि देश कार्की आयोग के रिपोर्ट का इंतजार कर रहा था जो चुनाव से पहले ही आ जाना चाहिए था ।
खैर, यह चुनाव परिणाम एक हद तक अपेक्षित भी था । यह अनुमान तो था कि रास्वपा जीत सकती है, लेकिन इस तरह से जीत जाएगी, ऐसा नहीं लगा था । इस माहौल ने बहुत से लोगों में फिर से आशा जगाई है । लेकिन यह समय सचेत होने का भी है । क्योंकि,

“अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेण रावणः ।
अतिदानाद् बलिर्बद्धो ह्यति सर्वत्र वर्जयेत् ।।”

वैसे भी देश ने २०६४ साल के संविधानसभा चुनाव और शांति प्रक्रिया के बाद बहुत बड़े सपने थे । जो बहुत हद तक दिवा स्वप्न की तरह ही है । अभी भी नई पीढ़ी से लेकर पुरानी पीढ़ी तक लोगों में बहुत अधिक आशा दिखाई दे रही है । कहीं ऐसा ना हो कि यही अधिक आशा फिर से निराशा में बदल जाए ।

हालाँकि मतदाताओं की आशा पूरी तरह आधारहीन या अस्वाभाविक भी नहीं है । नेपाल की मुख्य समस्या यही मानी जाती रही है कि यहाँ के दलतंत्र में आंतरिक लोकतंत्र की कमी है और दल अत्यधिक भ्रष्ट हो गए हैं । ऐसी स्थिति में जब भ्रष्ट दलों की जगह नए चेहरे आते हैं, तो लोगों को उनसे आशा और उम्मीद होना स्वाभाविक ही है ।

देश ने अत्यधिक राजनीतिक अस्थिरता को झेला है । कोई भी सरकार बहुत लंबे समय तक टिक नहीं सकी, इसलिए दीर्घकालीन दृष्टि और कार्यक्रम ही नहीं बन पाए । जो भी सरकार में गया, उसका पूरा ध्यान और दिमाग सिर्फ सत्ता को बचाए रखने के खेल में ही उलझा रहा । जिससे विकास की जिस गति की अपेक्षा देश कर रहा था वह नहीं हो पाया । भ्रष्ट तंत्र के साथ साथ प्राकृतिक आपदा ने भी देश को तोड़ा है यह सच है बची खुची जो कमी थी वह कथित जेन जी आन्दोलन के असर ने दिखा दिया । इस आन्दोलन को कथित इस रूप में ककह रही हूँ क्योंकि यह आन्दोलन पूर्ण रूप से जेन जी आन्दोलन था ही नहीं । खैर बीती ताहि बिसारिए । आज परिदृश्य बदला हुआ है । वर्तमान परिणाम से कम से कम पाँच वर्षों के लिए सरकार को सत्ता बचाने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी । सरकार अपनी इस मजबूती का उपयोग करके कुछ दीर्घकालीन काम कर सकती है । यह उम्मीद जनता को है जो उसे आशावादी बना रहा है । परन्तु यह नेपाल है सच कहूँ तो आन्दोलन का देश भी इसे कह सकते हैं । सत्ता से बाहर रहे दल जो आज तक नेपाल की राजनीति में वर्चस्व रखते थे वो और उनके कार्यकर्ता आगे कितना संयम रख सकते हैं यह तो समय बताएगा परन्तु नेपाली समाज आज एक बड़े परिवर्तन के मोड़ पर पहुँच चुका है, जिसका अपेक्षित परिणाम क्या होगा यह देखना है । देश की चरमराती अर्थव्यवस्था, आमूल भ्रष्टाचार में डूबा समग्र निकाय और इन कथित नए चेहरों में शीर्षस्थ कई चेहरे ऐसे हैं जो आरोपों से आबद्ध हैं, ऐसे में सुशासन, विकास और भ्रष्टाचार मुक्त देश कैसे और कितना बनेगा यह सवाल भी सामने हैं ।

यह भी पढें   बाल बाल बचा तुर्की एयरलाइंस का विमान

आज जो परिणाम हमारे सामने है उसे देख कर यह कह सकते हैं कि जनता को राजनीतिक दलों के प्रति गहरा विश्वासघात महसूस हुआ । इसलिए नेपाली जनता ने अपनी बात आंदोलन के रूप में, मतदान के रूप में और शायद विद्रोह के रूप में दिखाया है, उसे स्वीकार करके उसका विश्लेषण करना पक्ष और विपक्ष दोनों को ही करना आवश्यक है । वैसे जो परिवर्तन दिख रहा है वह पूरी तरह सही है यह कहना उचित नहीं होगा । क्योंकि जनता का आक्रोश अगर देश को क्षति पहुँचाने के रूप में सामने आए तो इसका समर्थन भी नहीं करना चाहिए । क्योंकि यही आगे चलकर परिपाटी बन जाती है ।

चुनाव में अपेक्षाकृत परिणाम न आने के बाद संसदीय राजनीति के पुराने खिलाड़ी माने जाने वाले दल–कांग्रेस और एमाले फिलहाल खामोश हैं । चुनाव समाप्त हुए एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी उन्होंने कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं की है । एमाले अध्यक्ष केपी ओली जिस निर्वाचन क्षेत्र से लगातार जीतते आए थे, उसी क्षेत्र से चुनाव जीतने वाले बालो साह को बधाई तो दी है, लेकिन इस चुनावी हार पर उनकी प्रतिक्रिया एक सप्ताह बाद ही सामने आई है । हालांकि पार्टी समिति के माध्यम से अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है ।

इधर विशेष महाधिवेशन के माध्यम से कांग्रेस का नेतृत्व संभालने वाले गगन थापा ने अभी तक एक ‘स्टेटस’ तक नहीं लिखा है । जबकि समय–समय पर वीडियो संदेश जारी करने वाले थापा के बारे में यह खबरें आई थीं कि वे इस्तीफा देने के ‘मूड’ में हैं, लेकिन अब तक जिम्मेदार दल के सभापति की ओर से कोई आधिकारिक वक्तव्य जारी नहीं हुआ है ।
इस चुनाव में प्रत्यक्ष प्रणाली के तहत कांग्रेस केवल १८ सीटों तक सिमट गई है, जबकि एमाले ९ सीटों पर रह गई है । लंबे संसदीय अनुभव और सरकार चलाने का इतिहास रखने वाले ये दल जनता से अप्रत्याशित परिणाम मिलने के बाद भी चुनावी नतीजों की समीक्षा कर भविष्य की दिशा तय करने को लेकर तुरंत सक्रिय होते नहीं दिख रहे हैं ।

नेपाली कांग्रेस पार्टी की बैठक चैत्र महीने के पहले सप्ताह में बुलाई गई है । जिसमें संभवतः चुनाव के विषय पर चर्चा हो ।
उधर एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली ने गुरुवार को एक लंबा स्टेटस लिखकर कहा कि वे “जनता के मत का पूर्ण सम्मान करते हुए उसे स्वीकार करते हैं”, लेकिन इस परिणाम के पीछे के कारणों पर वे मौन रहे । उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि पार्टी अपेक्षित परिणाम नहीं ला सकी । इस चुनावी नतीजे की समीक्षा होगी या पार्टी प्रमुख के रूप में वे नैतिक जिम्मेदारी लेंगे–इसका कहीं उल्लेख नहीं किया गया ।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हाल ही में हुए चुनाव में कांग्रेस और एमाले की यह स्थिति उनकी अपनी निष्क्रियता का परिणाम है । उनका कहना है कि लंबे समय तक शासन करने के लिए जनता से समर्थन पाने के बावजूद ये दल जनता की अपेक्षाओं और अपने किए वादों के अनुसार काम नहीं कर सके, इसलिए जनता ने मतदान के माध्यम से उन्हें दंडित किया है । कांग्रेस और एमाले के लंबे शासन के बावजूद अपेक्षित विकास नहीं हो सका । भ्रष्टाचार, कुशासन, अनैतिकता और अवसरवादिता हावी होती गई, जबकि जनता बदलाव चाह रही थी । इस चुनाव के माध्यम से जनता ने अपनी ताकत दिखा दी ।
माना जा रहा है कि यह चुनाव संसदीय प्रणाली के तहत होने के बावजूद प्रत्यक्ष कार्यकारी प्रणाली जैसा प्रतीत नहीं हो रहा है । क्योंकि मतदाताओं ने अपने क्षेत्र के उम्मीदवार को देखकर नहीं, बल्कि सीधे बालेन शाह के चेहरे को देखकर निर्णय लिया । युवा पीढ़ी ने बालेन के चेहरे में अपनी उपस्थिति देखी और विश्वास के साथ एक बार उन्हें वोट देने का निर्णय लिया है । गणतंत्र के बाद जन्मे मतदाताओं ने बालेन को अपना आइकन माना और उसी को आगे रखकर रास्वपा ने यह परिणाम हासिल किया है ।

यह भी पढें   पूर्व प्रधानमन्त्री सुशीला कार्की ने पत्रकार को कहा – तुमलोगों की माँ बदल चुकी है

देखा जाए तो हर चुनाव कुछ न कुछ संदेश देता है । इसलिए लंबे समय से संसदीय राजनीति में सक्रिय दल–कांग्रेस और एमाले–के लिए यह परिणाम स्वयं को सुधारने का अवसर भी है । लंबे राजनीतिक सफर में दलों के बीच समय–समय पर ऐसे परिणाम आना असामान्य नहीं होता । सन् २०६४ (वि.सं.) में माओवादी लहर के समय और उससे पहले जब ज्ञानेन्द्र शाह ने सत्ता अपने हाथ में ली थी, तब भी राजनीतिक दलों का अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ था । इसलिए जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप काम करके दलों के पास फिर से जनता से अनुमोदन प्राप्त करने का अवसर अभी भी मौजूद है ।
चुनाव परिणाम को देखते हुए यह भी कह सकते हैं कि इस चुनाव में दलों की नहीं, बल्कि ‘ओली प्रवृत्ति’ की हार हुई है । जब जनता बार–बार अवसर देती रही, तब भी संसद भंग करना, कुशासन की शुरुआत होना, विवादित मामलों की पर्याप्त जांच न होना, रिश्तेदारों की नियुक्ति करना और सुशासन स्थापित न कर पाना–इन सब कारणों से ओली और देउवा उस स्तर से ऊपर उठ ही नहीं सके । इसलिए दोनों को यह सजÞा मिलनी ही थी, और इस चुनाव ने वही किया है ।

विश्लेषक मानते हैं कि कम्युनिस्ट शक्तियाँ धीरे–धीरे कमजोर होती जा रही हैं । पहले कांग्रेस और कम्युनिस्ट–इन दो ध्रुवीय शक्तियों के बीच राजनीति चलती थी । अब बीच में रास्वपा के आने से यदि उसके अच्छे कामों की छाप जनता में पड़ती गई, तो कम्युनिस्ट शक्तियाँ धीरे–धीरे समाप्त होती जाएँगी और आगे चलकर यहाँ कांग्रेस और रास्वपा–इन दो शक्तियों के बीच राजनीतिक संघर्ष देखने को मिलेगा ।

मधेश की उम्मीद बने बालेन
इस चुनाव ने मधेशी दलों को भी नकार दिया है । आत्मविश्लेषण की अपेक्षा उनसे भी है । लंबे समय से मधेश की राजनीतिक प्रतिनिधित्व करने वाले मधेश–केंद्रित दल इस बार प्रतिनिधि सभा से लगभग बाहर हो गए हैं । सन् २०४८ (वि.सं.) से लगातार संसद में उपस्थिति दर्ज कराते आ रहे ये दल पहली बार ऐसी स्थिति में पहुँचे हैं, जहाँ उनका संसदीय प्रतिनिधित्व लगभग समाप्त हो गया है । मधेश आंदोलन के बाद स्थापित हुए नेताओं की संसदीय यात्रा में आए इस अचानक विराम ने मधेश की राजनीतिक बहस को एक नई दिशा की ओर मोड़ दिया है । इस परिणाम को केवल दलों की हार या जीत के रूप में नहीं देखा जा सकता । बल्कि यह मधेशी समाज के भीतर चल रहे गहरे राजनीतिक परिवर्तन का संकेत देता है । सन् २०८२ (वि.सं.) के चुनाव परिणाम यह सवाल उठाते हैं–क्या मधेश के मुद्दे कमजोर हो गए हैं, या उन मुद्दों को उठाने वाले नेतृत्व पर मतदाताओं का भरोसा समाप्त हो गया है ?

 

मधेश के राजनीतिक इतिहास को देखें तो मधेशी समुदाय का प्रतिनिधित्व लंबे समय तक सीमित रूप में ही रहा । २०४८ (वि.सं.) के बाद मधेश के मुद्दे उठाने वाली प्रमुख राजनीतिक शक्तियाँ मुख्यतः नेपाल समाजवादी पार्टी, लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी, जनमत पार्टी जैसे दल थे । लेकिन मधेश की राजनीति वास्तव में राष्ट्रीय बहस के केंद्र में मधेश आंदोलन के बाद (२०६४ वि.सं.) ही प्रमुखता से उभरी । उस आंदोलन ने नेपाल राज्य की संरचना पर ही सवाल खड़े कर दिए । मधेशी समुदाय ने समान प्रतिनिधित्व, समावेशी राज्य संरचना, संघीयता और पहचान की राजनीति को जोरदार तरीके से आगे बढ़ाया । इसी कारण २०६४ (वि.सं.) के संविधान सभा चुनाव में मधेशवादी दलों ने उल्लेखनीय संख्या में सीटें भी जीतीं ।
उस आंदोलन ने मधेशी राजनीतिक शक्तियों को बड़ी ऊर्जा दी । इसके बाद उस आंदोलन से निकली राजनीतिक धारा से ः मधेश जनअधिकार फोरम, तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी, नेपाल सद्भावना पार्टी जैसे दल उभरे और मधेश की राजनीति में मजबूत शक्ति बने । समय के साथ विभिन्न दल एकीकृत होते और टूटते रहे । इसी प्रक्रिया से जनता समाजवादी पार्टी, लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी, राष्ट्रिय मुक्ति पार्टी जैसे दल बने । इन दलों का राजनीतिक आधार स्पष्ट था–मधेश की पहचान, समान अवसर, संघीयता और समावेशी प्रतिनिधित्व । कुछ समय तक ये मुद्दे मधेश की राजनीति को एकजुट करते दिखाई दिए, लेकिन आंदोलन के बाद पैदा हुई राजनीतिक ऊर्जा लंबे समय तक टिक नहीं सकी ।

यह भी पढें   सुप्रीम कोर्ट का सरकार को निर्देश: स्क्वाटर और अव्यवस्थित बस्तियाँ हटाने से पहले कानूनी प्रक्रिया अपनाएँ

समय के साथ मधेश–केंद्रित दल आंतरिक विवाद, नेतृत्व संघर्ष और सत्ता समीकरणों में अधिक उलझने लगे । बार–बार होने वाले विभाजन ने इन दलों की राजनीतिक विश्वसनीयता को कमजोर बना दिया । मधेश आंदोलन से पैदा हुई आशा और परिवर्तन की अपेक्षाएँ पूरी न होने से मतदाताओं में निराशा बढ़ती गई । राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार मधेशवादी दलों की सबसे बड़ी चुनौती एजेंडा की कमी नहीं, बल्कि विश्वास का संकट था । मधेश के मतदाताओं ने आंदोलन के दौरान उठाए गए मुद्दों को नहीं भुलाया था, लेकिन उन मुद्दों को उठाने वाले नेतृत्व के प्रति उनका भरोसा धीरे–धीरे कम होता गया ।
इसी परिवेश के बीच मधेश की राजनीति में अप्रत्याशित रूप से एक नया चेहरा सामने आया–काठमांडू के पूर्व मेयर तथा रास्वपा के वरिष्ठ नेता बालेन्द्र साह । यद्यपि वे औपचारिक रूप से मधेश की राजनीति से उभरे नेता नहीं हैं, फिर भी चुनाव में मधेश में उनका प्रभाव उल्लेखनीय रूप से बढ़ता हुआ दिखाई दिया । पिछले चुनाव में प्रत्यक्ष चुनाव से एक भी सीट न जीत पाने वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने बालेन को भावी प्रधानमंत्री के रूप में आगे रखकर जनकपुरधाम में “परिवर्तन उद्घोष सभा” आयोजित की । इस सभा में बालेन ने मैथिली भाषा में संबोधन दिया । उस संबोधन में उन्होंने स्वयं को “मधेश का बेटा” कहकर परिचित कराया था । पहले मधेश की पहचान को खुलकर सामने न लाने वाले बालेन ने इस बार स्पष्ट रूप से स्वयं को “मधेश का बेटा” बताते हुए मधेशी जनता के साथ भावनात्मक संबंध जोड़ने में सफलता पाई । मधेश की पहचान, सम्मान और अवसरों तक समान पहुँच के बारे में दिए गए उनके संदेश ने कई लोगों को आकर्षित किया–ऐसा विश्लेषकों का मानना है ।

मधेश की राजनीति में पहचान का प्रश्न हमेशा महत्वपूर्ण रहा है । लेकिन इस बार यह पहचान की राजनीति एक नए तरीके से प्रस्तुत होती दिखाई दी । कुछ मतदाताओं ने बालेन को पहली बार मधेश से प्रधानमंत्री बनने की संभावित क्षमता रखने वाले नेता के रूप में भी देखा । इस मनोवैज्ञानिक पक्ष को भी विश्लेषक महत्वपूर्ण मान रहे हैं ।
मधेश के कई मतदाता लंबे समय से यह महसूस करते रहे हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में उनके समुदाय का नेतृत्व अभी पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हो पाया है । इसलिए नए नेतृत्व के प्रति दिखाई दे रहा आकर्षण केवल चुनावी रणनीति ही नहीं, बल्कि राजनीतिक आकांक्षा की अभिव्यक्ति के रूप में भी समझा जा सकता है ।

सभा में बालेन शाह ने संघीयता को मजबूत बनाने, अधिकारों के लिए अब काठमांडू तक जाने की आवश्यकता समाप्त करने, सामाजिक न्याय तथा समान अवसर के मुद्दों पर भी विशेष जोर दिया । उन्होंने यह भी प्रतिबद्धता व्यक्त की कि विकास और अधिकारों के लिए राजधानी तक दौड़ने की आवश्यकता समाप्त की जाएगी और स्थानीय स्तर पर ही सेवाएँ सुनिश्चित की जाएँगी । राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार ऐसे संदेशों ने विशेष रूप से मधेश के युवा वर्ग को आकर्षित किया है ।

पहले जिन मुद्दों को मधेशवादी दल उठाते थे, अब वही मुद्दे नए चेहरे और नई राजनीतिक शैली के माध्यम से सामने आते दिखाई दे रहे हैं । इस बार के चुनाव परिणाम ने एक महत्वपूर्ण संकेत दिया है । उनके अनुसार मधेशी मतदाताओं ने अपने मुद्दे नहीं बदले हैं, बल्कि नेतृत्व बदल दिया है । संघीयता, समान प्रतिनिधित्व, सामाजिक न्याय और अवसरों तक समान पहुँच जैसे मुद्दे अभी भी मधेश की राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं । लेकिन इन मुद्दों को उठाने वाले नेतृत्व के प्रति मतदाताओं का भरोसा बदलता हुआ दिखाई देता है ।
मधेशवादी दलों की कमजोर उपस्थिति के बीच नई राजनीतिक शक्तियों के प्रति दिखाई दे रहा आकर्षण यह संकेत देता है कि मधेश की राजनीति अब एक नए चरण में प्रवेश कर चुकी है । आने वाले वर्षों में यह परिवर्तन स्थायी राजनीतिक रूपांतरण में बदलता है या फिर किसी नए विकल्प की खोज शुरू होती है–यह मधेश के राजनीतिक भविष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न होगा ।

डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक, हिमालिनी

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *