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स्वामी विवेकानंद ने कहा था “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत” : श्वेता दीप्ति

 

डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय, हिमालिनी अंक ऑक्टोबर। चीनी दार्शनिक लाओत्से ने कहा था कि, सबसे श्रेष्ठ शासक वह है, जिसके होने की खबर प्रजा को न हो । उससे कम श्रेष्ठ वह शासक है, जिसको प्रजा प्रेम और प्रशंसा देती है । उससे भी कम श्रेष्ठ वह राजा होता है, जिससे प्रजा डरती है और सबसे घटिया वह राजा होता है, जिसकी प्रजा निंदा करती है । इनमें से नेपाल के शासक किस श्रेणी में आते हैं ? आज यह ज्वलन्त सवाल प्रत्येक नेपाली जनता के मस्तिष्क को उद्वेलित कर रहा है । देश को बहुत पहले से युवा शक्ति की आवश्यकता रही है किन्तु नेपाल की राजनीति और राजनीतिक दलों की विडम्बना यह है कि आज भी थके और पुराने चेहरे ही नजर आते हैं । जनता क्या चाहती है या क्या सोचती है इस तथ्य को नकारते हुए और इतनी बर्बादी के बाद भी इन चेहरों पर शिकन या पश्चाताप नहीं है । एनकेन प्रकारेण वो अपनी स्थिति में बने रहना चाहते हैं ।

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देश की भू–राजनीतिक स्थिति जटिल होती जा रही है और युवाओं की आवश्यकता महसूस की जा रही है । प्रत्येक समाज की अपनी पारंपरिक प्रेरणा, मूल्य एवं नैतिकता होती है, जो युवाओं के माध्यम से प्रवाहित होती रहती है । पश्चिमी समाजों से भिन्न एशियाई समाजों की अपनी पारंपरिक ऊर्जस्विता है । यही ऊर्जस्विता चीन, जापान और दक्षिण कोरिया के विकास की प्रक्रिया में उनकी युवा शक्ति का मूल आत्मा बनकर उभरी है । चीन में कन्फ्यूशियस की प्रेरणा आज भी युवा शक्ति को प्रेरित करती है । पारंपरिक ऊर्जस्विता का आधुनिक ज्ञान, विज्ञान एवं तकनीकी के साथ संतुलित संयोग समाज की युवा शक्ति को प्रभावी बनाता रहा है ।
कहा जाता है कि युवा राष्ट्र के रत्न, भविष्य के कर्णधार और प्रगति के नायक होते हैं । वे उत्साह के प्रतीक होते हैं । वे राष्ट्र निर्माण के प्रमुख स्रोत होते हैं । वे राष्ट्र की अमूल्य नींव होते हैं । वे परिवर्तन के वाहक और विकास के उत्प्रेरक होते हैं । किसी भी राष्ट्र के विकसित, समृद्ध और शक्तिशाली होने का एक विश्वसनीय और भरोसेमंद पैमाना उस देश के युवाओं की सक्रियता, लगन, परिश्रम, अनुशासन और उत्पादकता को माना जा सकता है, लेकिन नेपाली समाज में युवा शक्ति की सही पहचान नहीं हो पाई और न ही युवाओं की क्षमता का उपयोग हो पाया । यदि राष्ट्र युवाओं के लिए सही कार्ययोजना और नीतियाँ नहीं बना पाता और उन्हें लागू नहीं कर पाता, तो यह व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व के लिए दुर्भाग्यपूर्ण हो सकता है । अतीत का इतिहास इस बात की पुष्टि करता है कि किसी भी देश के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और अन्य क्षेत्रों में युगांतकारी परिवर्तन लाने में युवाओं की भूमिका सदैव अग्रणी रही है । चाहे वह इतिहास विश्व का हो या नेपाल का ।

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वर्तमान में जो परिदृश्य दिख रहा है उसे कायम रखने के लिए युवाओं को सही नेतृत्व, दूरदर्शिता, धैर्य, सहयोग एवं संयम की आवश्यकता है । तभी देश का चेहरा बदला जा सकता है । इस कार्य में देश से बाहर जो हमारी युवा पीढ़ी हैं उन्हें भी सक्रिय होना पड़ेगा । बिना सही नेतृत्व, निर्देशन और विजन के आगे बढ़ना घातक सिद्ध हो सकता है । क्योंकि कई ऐसे विदेशी कारक हैं जो अप्रत्यक्ष रूप से अपना हित साधने के लिए नेपाल को प्रयोगशाला बनाए हुए हैं । कहते हैं सतर्कता गई और दुर्घटना घटी । इसलिए सतर्कता और अर्जुन दृष्टि दोनों ही आवश्यक हैंस्वामी विवेकानंद ने कहा था, “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत”अर्थात् उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाए । देश हित सर्वोपरि ।

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उर्जा, उत्साह और उजाले का त्योहार तथा प्रकृति और सद्भाव का महापर्व छठ की अनंत मंगलमय शुभकामनाओं के साथ एक नई सुबह का इंतजार हम सबको है ।

डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक, हिमालिनी

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