लेन-दखलअंदाजी में बालेन और भविष्यद्रष्टा बुद्धछिरिङ : सी.एन. थारू, आर.के. तामाङ
सी.एन. थारू, आर.के. तामाङ, काठमांडू, 12 सितंबर ।
वर्तमान सरकार और जनजीविका के सवाल
वर्तमान सरकार के बारे में जनजीविका के सवाल पर क्या धारणा बन रही है? अब यह कहने की बारी आ गई है कि कितना विकास और कितना शासन—यह कसौटी वर्तमान सरकार पर भी लागू होगी।
प्रधानमन्त्री बालेन्द्र शाह बोलते नहीं, काम करते हैं—यह बात कौन कह सकता है? जबकि उन्होंने राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी के महाधिवेशन के उद्घाटन सत्र में शुभकामना मन्तव्य देते हुए कहा था—“मेरी गाड़ी बिना ब्रेक की है और हाईवे पर है। रफ्तार में हम कूदेंगे।” उनके अब तक के रणनीतिक कदमों से उनका यह कथन पुष्ट होता आया है।
बार-बार यह संदेश दिया जा रहा है कि यह सरकार पुराने बोझ—बोझा या बैगेज—को लेकर नहीं चलेगी। इससे यह अनुमान भी लगाया जा रहा है कि शक्ति-संतुलन बनाने के लिए वार्ता और संवाद का रास्ता अपनाया जा सकता है। आज चीनी सरकार की ओर से भी दूर के मित्र से बेहतर पास के पड़ोसी होते हैं, यह संदेश दिया जा रहा है।
लेकिन दूसरी ओर, नेपाल सरकार कई मामलों में असंवेदनशील और अकर्मण्य दिखाई देती है तथा अनेक अवस्थाओं में वही परम्परागत प्रवृत्तियाँ दोहराती हुई नजर आती है। राजनीतिक घोटालों और विवादों के बीच गठित वर्तमान सरकार में राजनीतिक संस्कार का अभाव दिखाई देने लगा है। देश जिस अस्तित्वगत संकट से गुजर रहा है, वह और गहरा होता जा रहा है।
संसद में प्रधानमन्त्री का व्यवहार तथा निषेध की राजनीति को बढ़ावा देने से देश में भय और त्रास का वातावरण बनता दिखाई दे रहा है। ऐसी कार्रवाइयों के कारण नेपाल के ग्रे लिस्ट से बाहर निकलने की सम्भावना भी कमजोर होती जा रही है।
लेन-दखलअंदाजी में बालेन्द्र शाह
प्रधानमन्त्री बनने के बाद भी बालेन्द्र शाह काठमांडू महानगर की अपनी पुरानी टीम के अनुभव और कार्यशैली से बाहर निकलने में छह महीने से अधिक समय लगा चुके हैं। देश का लम्बा संक्रमणकाल अब अस्तित्वगत संकट की अवस्था तक पहुँच चुका है।
जब कमीशन और भ्रष्टाचार के जाल चारों ओर फैले हों और राजस्व-संकलन की स्थिति कमजोर हो, तब राज्य के ग्रे लिस्ट से बाहर निकलने की सम्भावना भी कम दिखाई देती है। वैदेशिक ऋण और व्यापार घाटा दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। इस प्रकार की आर्थिक परनिर्भरता के कारण हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर विदेशी हस्तक्षेप बढ़ाने की आशंका भी पैदा होती है।
लेन-दखलअंदाजी के इस दौर में बालेन्द्र शाह भी सक्रिय दिखाई देते हैं। सभी को जानकारी है कि बालेन्द्र शाह एकतरफा ढंग से शक्ति और उग्रता का प्रदर्शन कर रहे हैं। एल्गोरिदम और सेना की आन्तरिक राजनीति पर नियंत्रण के आरोपों के बीच यह वातावरण भी बन रहा है कि बालेन्द्र शाह अमेरिकी इन्डो-प्यासिफिक रणनीति के हिस्से के रूप में एक मोहरे की भूमिका में दिखाई दे रहे हैं। यह स्थिति नेपाल के अस्तित्वगत संकट की नई जमीन तैयार करती हुई प्रतीत होती है।
जेन-जी विद्रोह के एक वर्ष बाद
आज नेपाल जेन-जी विद्रोह का एक वर्ष पार कर चुका है। राजनीतिक अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के विरुद्ध हुए इस विद्रोह में युवाओं ने अपनी असन्तुष्टि व्यक्त की थी। लेकिन आज भी युवाओं के सामने महंगाई और बेरोजगारी की समस्या कम नहीं हुई है। विदेश पलायन की दर में भी अपेक्षित कमी नहीं आई है।
देश बनाने वाली टीम की घोषणा करने वाले नेतृत्व के सामने अब यह सवाल है कि क्या शासन वास्तव में जनजीवन को बेहतर बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है या केवल सत्ता-संरचना को मजबूत करने में लगा है?
बालेन्द्र शाह का संविधान और संसद के प्रति व्यवहार भी अफसोसपूर्ण दिखाई देता है। संसद के प्रति गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाते हुए अध्यादेश के माध्यम से शासन करने का रास्ता अपनाया गया। आवश्यक कानूनी प्रक्रिया के नाम पर लोगों को पुलिस हिरासत में लेने से लेकर डोजर आतंक के माध्यम से सुकुम्बासी बस्तियों और गाँव-गाँव में सड़क विस्तार के नाम पर की गई कार्रवाइयों तक अनेक सवाल खड़े हुए हैं।
इन कार्रवाइयों के कारण कई लोगों के आत्महत्या की ओर जाने की घटनाओं ने राज्य की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। दूसरी ओर महंगाई तेजी से बढ़ रही है और जनजीवन तबाह होता जा रहा है। रसुवा की बाढ़ से हुई तबाही का दर्द भी देश भाद्र १० गते से भुगत रहा है।
ऐसा लगने लगा है कि देश बनाने वाली टीम अब लाशों के व्यापार में योजनाबद्ध ढंग से काम कर रही है।
सिंगापुर मॉडल और राज्य की क्षमता
सिंगापुर के विकास मॉडल की चर्चा करते हुए कानूनों में व्यापक हेरफेर करने का विचार प्रदर्शित किया गया है। लेकिन उसी अनुपात में सेवा और आपूर्ति की व्यवस्था करने की क्षमता भी राज्य को विकसित करनी होगी।
कर्मचारीतन्त्र में व्याप्त चाकरीतन्त्र और शासकों का लघुताभास नेपाल की आन्तरिक क्षमता बढ़ाने में बाधक है। इसके विपरीत बालेन्द्र शाह भी इसी प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हुए नेपाली सेना को राजनीति में धकेलने और उसे एक हैंडलर की तरह व्यवस्थापित करने की दिशा में बढ़ते हुए दिखाई देते हैं।
इस घड़ी में बालेन्द्र शाह ने जितने भी रणनीतिक कदम उठाए हैं, उनके पीछे किसी रणनीतिक साझेदार और योजना की भूमिका होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। साथ-साथ एल्गोरिदम के सहारे लोगों को अर्धसत्य में उलझाने का काम भी हो रहा है।
राजनीतिक दुष्प्रभाव
पश्चिम-केन्द्रित आधुनिकीकरण और औपनिवेशिक परियोजना आज मुक्ति का मार्ग साबित होने के बजाय यहाँ के स्वदेशी ज्ञान, सनातन प्रज्ञा, मूल्य और परम्परा के संहारक के रूप में प्रस्तुत हो रही है। यह मानव समाज के अस्तित्वगत खोखलेपन, नैतिक पतन और सैन्य उन्माद के माध्यम से दोहनकारी भू-राजनीतिक वर्चस्व की संरचना कायम करने वाले औजार में बदलती जा रही है।
नेपाल के सन्दर्भ में पिछले अस्सी वर्षों अर्थात् द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से जिस राजनीतिक व्यवस्था का अभ्यास होता रहा है, उसने औपनिवेशिकता को समाप्त करने के बजाय कई स्तरों पर उसे और मजबूत किया है। नेपाल की विविध संस्कृति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इससे प्रभावित होती आई है।
इसका परिणाम यह हुआ कि स्थानीय संस्कृति, सभ्यता और सनातन प्रज्ञा की उपेक्षा होती गई तथा बाहरी विश्वासों और अभ्यासों को थोपने का सिलसिला जारी रहा।
वर्तमान नेपाली नेतृत्व, विशेषतः नई पीढ़ी अर्थात् जेन-जी, वैचारिक रूप से अस्पष्ट दिखाई देती है। वही पीढ़ी आज व्यक्तिवाद और उपभोक्तावाद के भँवर में फँसी हुई है। परिणामस्वरूप सामूहिक मूल्यबोध और सामाजिक सुरक्षा का मर्म भुलाया जा रहा है।
साथ-साथ औपनिवेशिक मानसिकता का प्रभाव भी बढ़ता चला गया है। फिर भी भय और त्रास का वातावरण दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। ग्रीन आर्मी, नेपाल और हिन्दू सम्राट सेना जैसे अवांछित तत्वों की मौजूदगी तथा निषेध की राजनीति इस वातावरण को और जटिल बना रही है।
कार्की आयोग की रिपोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक न करने के पीछे की वजह भी सवाल खड़े करती है। यदि इसका कारण शक्ति का उन्माद है, तो इसका हिसाब इतिहास अवश्य रखेगा।
बुद्धछिरिङ मोक्तान का वैचारिक हस्तक्षेप
अस्सी वर्षों की अवधि में नेपाल में राजनीतिक स्वतन्त्रता और मानवाधिकार प्राप्ति के लिए संघर्ष चलता रहा। बार-बार व्यवस्था परिवर्तन के बहाने संविधान और शासन के स्वरूप को बदलने का काम हुआ।
संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र की व्यवस्था का अभ्यास करने के बावजूद जनता ने इस उन्नत राज्य-व्यवस्था में भी सेवा-प्रवाह की सहजता महसूस नहीं की। शासकीय विसंगति का एक कारण यह भी है कि पश्चिमी ज्ञान प्रणाली, मूल्य एवं मान्यताओं के साथ-साथ शासन मॉडल भी आयात किए गए।
कानून के अनुसार मानवीय व्यवहार में सुधार लाने की कोशिशों के बावजूद कई बार यह प्रक्रिया उपनिवेशकारी साबित हुई। दीर्घकालीन और स्थानीय विकास की अवधारणा से अलग विकास मॉडल थोपने वाली नीतियों को भी बाध्यतावश स्वीकार किया गया।
नई शक्ति और वैकल्पिक विचारों की जोरदार चर्चा प्रथम संविधान सभा के विघटन के बाद शुरू हुई। उसके बाद आधुनिक राज्य नेपाल, शक्ति-व्यूह और राज्य-प्रणाली से सम्बन्धित प्रचलित ज्ञान-प्रणाली के विरुद्ध बुद्धछिरिङ मोक्तान का वैचारिक हस्तक्षेप तीव्र रूप से आगे बढ़ा।
एक दशक से अधिक समय से उन्होंने पूर्वीय दर्शन और उससे परिभाषित सनातन प्रज्ञा के अस्तित्व-बोध को स्थापित करने वाले अभियान में स्वयं को समर्पित किया है।
सनातन प्रज्ञा की जमीन पर विश्वदृष्टि को ठोस रूप देने वाली अवधारणा की वकालत करते हुए बुद्धछिरिङ मोक्तान ने स्वदेशवाद की वैचारिकी प्रस्तुत की। साथ-साथ नेपाल की विकास रणनीति से जुड़े विषयों को ठोस रूप देते हुए उन्होंने यह सवाल उठाया कि हमारे जैसे अल्पविकसित देश वर्तमान महाशक्ति प्रतिस्पर्धा में अस्तित्वगत संकट से मुक्त होने का रास्ता कैसे निकाल सकते हैं।
यदि देश की आर्थिक समृद्धि में सीमा-विवाद बाधक है, तो उसका समाधान भी सभ्यतागत आलोक में खोजा जाना चाहिए।
स्वदेशवाद : वैकल्पिक विचार की जमीन
सार रूप में नई शक्ति को वैकल्पिक विचार की जमीन पर परिभाषित किया जाना जरूरी है। पश्चिमी ज्ञान प्रणाली ने जिस तरह सभ्य और असभ्य की अवधारणाओं को परिभाषित किया, उसके विपरीत सनातन प्रज्ञा किसी प्रतिगमन का रास्ता नहीं हो सकती।
बल्कि यह चरम व्यक्तिवाद, उपभोक्तावाद और उपनिवेशवाद से मुक्ति का ज्ञान-पथ हो सकता है।
ज्ञान-सत्ता में जिसका वर्चस्व रहा है, इतिहास में राजकीय सत्ता भी काफी हद तक उसी के नियंत्रण में रही है। इसलिए यदि स्वदेशवाद को वैकल्पिक राजनीति की वैचारिकी के रूप में स्वीकार किया जाता है, तो नेपाल के लिए भू-राजनीति को सभ्यतागत पहचान और विकास रणनीति के कार्यान्वयन से जोड़ना जरूरी होगा।
बुद्धछिरिङ मोक्तान के माध्यम से निर्मित यह भाष्य वैकल्पिक शक्ति के लिए आधार बन सकता है। आज भी हमारा मुद्दा उदारवाद और मार्क्सवाद के मोह से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है। यदि सामाजिक लोकतन्त्र को ही अंतिम समाधान मान लिया जाए, तो उपनिवेश की मानसिक और संरचनात्मक जंजीरों को पूरी तरह तोड़ पाना कठिन होगा।
नेपाल का अस्तित्वगत संकट
नेपाल का रणनीतिक महत्व शक्ति राष्ट्रों के बीच की प्रतिस्पर्धा में लगातार बढ़ता आया है। उत्तर में चीन और दक्षिण में उभरती शक्ति भारत के बीच नेपाल की स्थिति हमेशा चुनौतीपूर्ण रही है। वर्तमान समय में ये चुनौतियाँ और जटिल होती जा रही हैं।
चीन की बेल्ट एण्ड रोड इनिसिएटिव (BRI) और अमेरिका की इन्डो-प्यासिफिक स्ट्रेटेजी (IPS) जैसी रणनीतिक पहलों के टकराव के बीच नेपाल विश्व शक्तियों के खेल का मैदान बनता जा रहा है।
फिर भी हमारे शासक-सम्भ्रान्त लोग देश बनाने वाली टीम की घोषणा में तल्लीन हैं।
ऐसा पॉपुलिस्ट ट्रेडमार्क कभी केपी शर्मा ओली के पास भी था। एक समय विद्यार्थी उन्हें “केपी बा, आई लभ यू” कहकर पुकारते थे। लेकिन राजनीतिक विसंगति और भ्रष्टाचार के विरुद्ध असन्तोष व्यक्त करते हुए सड़क संघर्ष में जुटे वही विद्यार्थी बाद में जेन-जी के रूप में सामने आए और कुछ ही घंटों के प्रतिरोधपूर्ण संघर्ष ने ओली को प्रधानमन्त्री पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया।
इन घटनाओं से यह पुष्ट होता है कि नेपाल आधुनिकता के इस लम्बे दौर में भी एक प्रशासनिक राज्य से ऊपर उठकर पूर्ण अर्थों में राष्ट्र-राज्य नहीं बन पाया है।
नेपाल राज्य का राष्ट्रीय स्वार्थ स्पष्ट रूप से निर्धारित न हो पाने की स्थिति रही है। इसका एक कारण यह भी है कि यहाँ की राष्ट्रीयता भू-राजनीतिक दबावों का सामना करने की पर्याप्त क्षमता विकसित नहीं कर सकी।
फिर भी संयुक्त राष्ट्रसंघ के सिद्धान्तों के अनुसार किसी भी संप्रभु देश के आन्तरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
नेपाल राज्य के पुनर्नवीकरण के लिए आवश्यक ज्ञान और योजना वर्तमान दो-तिहाई बहुमत वाली बालेन्द्र शाह नेतृत्व की सरकार और उसके दल के पास नहीं है। इसका एक कारण यह है कि वे अल्ट्रा-मॉडर्निस्ट धारा में आगे बढ़ रहे हैं, जिसका अंतिम गन्तव्य वही औपनिवेशिक संरचना बन सकती है, जिससे मुक्ति का दावा किया जाता है।
इसलिए केवल पुस्तान्तरण—अर्थात् सत्ता और नेतृत्व का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरण—नेपाल की राजनीति और विकास रणनीति की सही दिशा सुनिश्चित करने का उपाय नहीं हो सकता। वर्षों से चले आ रहे हिपोक्रेटिक ट्रैप से वर्तमान सरकार भी मुक्त नहीं हो पाई है।
अबकी राह
नेपाल का अस्तित्वगत संकट गहरा होते जाने का एक कारण हमारी घरेलू राजनीति भी है। राष्ट्रीय स्वार्थ को स्पष्ट रूप से निर्धारित न करके वर्षों से शासक-सम्भ्रान्त वर्ग हिपोक्रेटिक ट्रैप में फँसा हुआ दिखाई देता है।
इस संकट का समाधान केवल प्रशासनिक या तकनीकी उपायों से नहीं, बल्कि वैचारिकी के स्तर पर खोजा जाना आवश्यक है। वास्तविक चुनौती विशिष्टता और समग्रता के बीच के द्वन्द्व का समाधान करना है।
अस्तित्व और मूल्य की राजनीति का समाधान केवल तकनीकी चमत्कार से सम्भव नहीं दिखाई देता।
दार्शनिक बुद्धछिरिङ मोक्तान का प्रस्तावित स्वदेशवाद इन दोनों तथ्यों के बीच समन्वय स्थापित कर सकता है और संकट-मोचन का आधार प्रदान कर सकता है।
विशेष रूप से निम्न तीन महासंकटों से मुक्ति का रास्ता तलाशना आवश्यक होगा—
१. उच्छेदवादी चेतना
परम्परागत, आध्यात्मिक और सामूहिक ज्ञान एवं मूल्यों को अवैज्ञानिक करार देते हुए उन्हें खारिज करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इसका परिणाम नेपाली समाज की बुनियादी संरचना को कमजोर करते हुए उसे अस्तित्वगत शून्यता की ओर ले जाना हो सकता है।
२. औपनिवेशिक शक्ति-व्यूह
औपचारिक उपनिवेशवाद का अन्त होने के बावजूद ज्ञान, अर्थतन्त्र, राजनीति, संस्कृति और आत्मनिर्णय के अधिकार पर पश्चिमी नियंत्रण कायम रखने वाली संरचनाएँ विभिन्न रूपों में मौजूद हैं। इनके माध्यम से नव-सांस्कृतिक उपनिवेश थोपे जाने का खतरा बना हुआ है, जिससे हमारी मौलिक संस्कृति और पहचान के नष्ट होने का खतरा है।
३. शक्ति-उद्दण्डता
पश्चिमी राष्ट्रों की सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक शक्ति को ही सभ्यता अथवा विकास का मॉडल मानकर लम्बे समय तक वैधता प्रदान की जाती रही है। इसके प्रभावस्वरूप स्थानीय ज्ञान और तकनीक कमजोर तथा समाज परनिर्भर होता चला गया।
निष्कर्ष : पुनर्नवीकरण की राह
अतः विगत दो सौ वर्षों से चले आ रहे हिपोक्रेटिक ट्रैप से बाहर निकलना जरूरी है। इसके लिए नेपाल की राज्यकला (Statecraft) और स्वकला (Soulcraft) को पुनर्स्थापित करना अनिवार्य शर्त के रूप में सामने आता है।
पश्चिमी आधुनिक उदारवाद और मार्क्सवाद—दोनों आधुनिकता की अपनी-अपनी सीमाओं के भीतर राज्यकला को परिभाषित करते रहे हैं। नेपाल के सन्दर्भ में इनके परिणाम अपेक्षित सफलता देने में असफल सिद्ध होते जा रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में मोक्तान का प्रस्तावित स्वदेशवाद अधिक प्रासंगिक होता जा रहा है।
यह मौलिक विचारधारा संवादात्मक (Dialogical) होने के कारण समग्र, समावेशी और लोकतान्त्रिक होने का दावा करती है। बहुलराष्ट्रीय लोकतन्त्र की दिशा में राज्य को निर्देशित करने के लिए राष्ट्रीय मुक्ति क्रान्ति को एक सम्भावित समाधान की राह के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
सी.एन. थारू
राष्ट्रीय मुक्ति क्रान्ति के सह-संयोजक
आर.के. तामाङ
समान नेपाल के संयोजक

