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‘हिमालिनी’ जिसके पन्नों पर इतिहास दर्ज होता चला गया : डा श्वेता दीप्ति

 

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“राह कठिन थी किन्तु हौसला बुलंद था”

सम्पादकीय, जनवरी २०२२ | आज एक नजर ‘हिमालिनी’ की चौबीस वर्षों की यात्रा पर डालें । दौर वह था जब नेपाल में हिन्दी पत्रकारिता का कार्य या हिन्दी पत्रिका का प्रकाशन आसान नहीं था । राह कठिन थी परन्तु कहते हैं ना ‘जहाँ चाह वहाँ राह’ । पहाड़ी रास्तों की तरह उबड़–खाबड़ राह रही ‘हिमालिनी’ की, फिर भी पहाड़ी नदी की ही तरह बाधाओं को राह से हटाती यह अबाध गति से आगे बढ़ती रही ।

हिमालिनी के इस सफर में कई उतार–चढाव आए किन्तु इसकी गति को कोई रोक नहीं पाया । यह कल भी अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति के साथ हमारे समक्ष थी और आज भी है । इसकी सफलता में हिमालिनी से सम्बद्ध लोगों की मेहनत है तो आपका भरपूर प्यार भी ।

सच तो यह है कि ‘हिमालिनी’ के प्रकाशन का निर्णय व्यवसायिक दृष्टिकोण से शुरु नहीं किया गया था इसके पीछे थी पिता के प्रति भावपूर्ण श्रद्धा का भाव और हिन्दी भाषा के प्रति आत्मीय लगाव और रिश्ता । या कहूँ कि ‘हिमालिनी’ श्रद्धा है, आदर है और है नेपाल में हिन्दी के प्रति समर्पित नाम श्रद्धेय डॉ. कृष्णचन्द्र मिश्र के लिए हम सबकी भावपूर्ण श्रद्धाजंलि ।

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‘हिमालिनी’ का शुरुआती दौर, जब समय था राजतंत्र का, जहाँ शब्दों पर पहरे थे, जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं थी,ऐसे मुश्किल दौर का साक्षी बनी ‘हिमालिनी’ । इस दुरुह कार्य को सम्पन्न किया सक्षम हाथों ने और उनके जीवट विश्वास और प्रतिकूल को भी अनुकूल कर देने की अदम्य लालसा ने । ‘हिमालिनी’ का प्रकाशन डॉ. कृष्णचन्द्र मिश्र अकादमी और नेपाल हिन्दी साहित्य कला संगम के सहयोग से प्रारम्भ हुआ । ‘हिमालिनी’ का बीज प्रस्फुटित होकर आज एक वटवृक्ष के रूप में अपना अस्तित्व कायम किए हुए है, जिसकी छाँव तले राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय, क्षेत्रीय विचारों, घटनाओं और विश्लेषणों को पनाह मिलती है ।

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साहित्यिक धरातल पर जन्मी ‘हिमालिनी’ वक्त की नजाकत, माँग और नब्ज को समझती हुई विविधताओं को अपनाती चली गई । विगत वर्षों में नेपाल में हुए परिवर्तन का साक्षी बनी ‘हिमालिनी’ । राजतंत्र का अन्त, राजदरबार हत्याकांड, माओवादी जनविद्रोह, कोशी का कहर, महाभूकम्प की त्रासदी और पिछले वर्ष हुए मधेश आन्दोलन का जीवन्त दस्तावेज बनी ‘हिमालिनी’, जिसके पन्नों पर इतिहास दर्ज होता चला गया ।

‘हिमालिनी’ के कामयाब सफर में कई सहयोगी हाथों का संबल है, जिसने इसे सजाया, सँवारा और कलेवर दिया । ‘हिमालिनी’ अपने प्रथम संपादक डॉ. संजीता वर्मा, प्रधान संपादक डॉ. उषा ठाकुर, अतिथि संपादक नवीन मिश्रा, संपादक रमेश झा, कार्यकारी संपादक मुकुन्द आचार्य, प्रवीण मिश्रा आदि कई महत्तवपूर्ण नाम हैं जिनके प्रति आभारी है, जिनके कुशल हाथों ने ‘हिमालिनी’ को जीवंतता प्रदान की । ‘हिमालिनी’ अपने समस्त लेखकों को नमन करती है, जिनकी तीक्ष्ण लेखनी पाठकों को आकर्षित करती है और जिसकी वजह से पाठकों की संख्या दिन–ब–दिन बढ़ती जा रही है ।

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Shweta dipti
श्वेता दीप्ति

‘हिमालिनी’ आभार मानती है अपने तकनीकी सहायकों का, बाजार–व्यवस्थापन समूह का, विज्ञापन दाताओं का जिनकी वजह से ‘हिमालिनी’ कल भी थी, आज भी है और कल भी रहेगी । ‘हिमालिनी’ आज की आवाज आप सबकी आवाज । हिमालिनी की इस निर्बाध यात्रा में आप सभी का साथ और सहयोग मिलता रहा है और भविष्य में हम इस सहयोग के आकाँक्षी हैं ।

नववर्ष और विश्व हिन्दी–दिवस की अनेक शुभकामनाएँ ।

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1 thought on “‘हिमालिनी’ जिसके पन्नों पर इतिहास दर्ज होता चला गया : डा श्वेता दीप्ति”

  1. शानदार बहुत ही सुंदर पत्रिका रही है ।संपादकीय टीम को शुभकामनाएं एवं बधाई।

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