वैश्वीकरण की दौर में हिंदी : डॉ. प्रमोद पाण्डेय
डॉ. प्रमोद पाण्डेय, जनवरी, 2022। आज का युग वैश्वीकरण का युग है । वैश्वीकरण के इस युग में आज संपूर्ण विश्व एक छोटा सा गांव लगने लगा है । वैश्वीकरण यह विश्व के अर्थतंत्र के निर्माण की प्रक्रिया है जो कि विश्व के अर्थतंत्र तथा विश्व बाजार के निर्माण में प्रत्येक राष्ट्र को जोड़ता है । वैश्वीकरण एक निरंतर
चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें विश्व के सभी देश एक–दूसरे से आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से परस्पर जुड़े हुए होते हैं । वैश्वीकरण यह अंग्रेजी के ‘ग्लोबलाइजेशन’ (न्यिदबष्शिबतष्यल) शब्द का हिंदी रूपांतरण है । यह ‘ग्लोबल’ (न्यिदब)ि शब्द का परिवर्तित रूप है । जिसका अर्थ भूमंडलीकरण, जगतीकरण, विश्वायन, उदारीकरण, विश्ववाद, बाजारवाद, अंतरराष्ट्रीयवाद, वैश्वीकरण आदि है । वैश्वीकरण या कोई नया सिद्धांत नहीं है अपितु सदियों पहले इसकी अवधारणा हो चुकी थी ।
वैश्वीकरण का अर्थः
वैश्वीकरण के अर्थ पर विचार करें तो वैश्वीकरण का अर्थ है– ‘स्थानीय या क्षेत्रीय वस्तुओं या घटनाओं के विश्व स्तर पर रूपांतरण की प्रक्रिया । इसे एक ऐसी प्रक्रिया का वर्णन करने के लिए भी प्रयोग में लाया जा सकता है, जिसके द्वारा संपूर्ण विश्व के लोग मिलकर एक समाज बनाते हैं तथा एक साथ कार्य करते हैं । यह प्रक्रिया आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक और राजनीतिक ताकतों का एक संयोजन है । ”
वैश्वीकरण का अंग्रेजी में अर्थ इस प्रकार से है–
Globalization is the word used to describe the growing interdependence of the world’s economies, cultures, and populations, brought about by cross–border trade in goods and services, technology, and flows of investment, people, and information
दूसरे शब्दों में–
“Globalization is the spread of products, technology, information, and jobs across national borders and cultures= In economic terms, it describes an interdependence of nations around the globe fostered through free trade”
जब हम वैश्वीकरण के उपयोग पर दृष्टिपात करते हैं तो पाते हैं कि वैश्वीकरण का उपयोग अक्सर आर्थिक दृष्टिकोण से वैश्वीकरण के सन्दर्भ में किया जाता है ।
वैश्वीकरण की परिभाषाः
वैश्वीकरण को परिभाषित करते हुए– टॉम जी । पाल्मर लिखते हैं कि “वैश्वीकरण यह सीमाओं के पार विनिमय पर राज्य प्रतिबंधों का ह्रास और इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न हुए उत्पादन और विनिमय का अत्यधिक गतिशील संगठित और जटिल विश्व प्रणाली है । ”
वैश्वीकरण के संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय जी अपनी पुस्तक हिंदी का विश्व संदर्भ में लिखते हैं कि “वैश्वीकरण अथवा भूमंडलीकरण को लेकर खुला विमर्श वर्तमान दौर की एक अपरिहार्य मांग है । यह अंग्रेजी के “ग्लोबलाइजेशन” शब्द का हिंदी रूपांतरण है । हिंदी में इसके पर्याय के तौर पर भूमंडलीकरण, जगतिकरण, विश्वायन जैसे शब्दों का भी प्रयोग होता है । वैश्वीकरण एक ही विश्व व्यवस्था कायम करने के लक्ष्य को लेकर संकल्पित है । यह विश्व बाजारवाद के रथ पर आरूढ़ होकर शिक्षण प्रौद्योगिकी के सहारे वैश्विक अर्थतंत्र को प्रतिष्ठित करने के लिए हरेक देश की अर्थव्यवस्था से अनिवार्य रूप से जुड़ने के प्रति प्रतिबद्ध है । इसे साकार रूप देने के लिए पहले ‘गेट’ (न्भलभचब िब्नचभझभलत यल त्बचषा बलम त्चबमभक) के द्वारा तथा बाद में विश्व व्यापार संगठन (ध्यचमि त्चबमभ इचनबलष्शबतष्यल) के सटीक माध्यम द्वारा सक्रिय अभियान चलाया गया । इसके परिणाम स्वरूप संपूर्ण विश्व के अर्थतंत्र को एक खुली व्यवस्था के तहत लाकर निश्चित विधान का दायरा प्रदान किया गया । आज वैश्वीकरण एक विराट एवं वर्चस्वी संरचना के रूप में हमारे सामने है तथा विश्वबैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, कारपोरेट जगत, बहुराष्ट्रीय निगम तथा तकनीकी आविष्कृतियां उसके आधार स्तंभ के रूप में कार्यरत हैं । वैश्वीकरण अर्थशास्त्र और प्रौद्योगिकी के सानुपातिक समायोजन द्वारा एक ऐसी विश्व व्यवस्था कायम करने का हिमायती है जहां किस्म–किस्म की अर्थव्यवस्थाओं का स्वाभाविक और अनिवार्य तौर पर संश्लेषण होगा । उनमें अंतरावलंबन, विनिमय और परस्पर व्यवहार जोर पकड़ेगा ।’
कहना न होगा किवैश्वीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें संपूर्ण विश्व एक हो जाता है तथा संपूर्ण अभिषेक बाजार के रूप में उभरकर सामने आता है । अंतर्गत विश्व हजारों में पारस्परिक निर्भरता उत्पन्न होती है और व्यापार देश की सीमाओं में सीमित ना रखकर विश्व व्यापार में अंतर्निहित होता है
भारत में वैश्वीकरण की संकल्पना प्राचीन काल से चली आ रही है । विकिपीडिया से प्राप्त जानकारी के आधार पर “ईसापूर्व से ही भारत अपने ज्ञान–विज्ञान, दर्शन तथा अतिसम्पन्न अर्थव्यवस्था के कारण विश्वविख्यात रहा है । दो हजार वर्ष पहले विश्व के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग ३२.९% हिस्सा भारत का था तथा इसकी जनसंख्या विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग १७% थी । अति प्राचीन काल से ही भारत में निर्मित सामान विश्व के विभिन्न भागों में दूर–दूर तक निर्यात किए जाते थे । अतः ’वैश्वीकरण’ की संकल्पना भारत के लिए कोई नई बात नहीं है, ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरी धरती ही अपना परिवार है) का विचार यहाँ अनादि काल से प्रचलित है ।’
मेरा मानना है कि भारत की असली ताकत हिंदी भाषा है क्योंकि हिंदी यह आम बोलचाल की भाषा है जिसे भारत देश की कुल आबादी की ५०% से अधिक जनसंख्या बोलती औरसमझती है । इस देश में विभिन्न भाषा–भाषियों के होने के बावजूद उनके बीच अधिकतर हिंदी ही संवाद सेतु का काम करती है । हिंदी को न सिर्फ संपर्क की भाषा के रूप में अपितु व्यवसाय की दृष्टि से यदि देखा जाए तो बाजार हमेशा बिकने वाली वस्तु की ताकत को देखता है । हिंदी भाषा में वह ताकत है । यही कारण है कि आज सबसे अधिक विज्ञापन हिंदी में ही प्रसारित किए जाते हैं । आज इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भी हिंदी का प्रभाव दिन–प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है । इतना ही नहीं आज कई सा‘फ्टवेयर और हार्डवेयर अंतर्निर्मित हिंदी यूनिकोड की सुविधा के साथ आ रहे हैं । जिसके कारण हिंदी की तकनीकी समस्याएं लगभग समाप्त हो गई हैं । एक तरफ आजकल अधिकांशतः सोशल मीडिया और इंटरनेट का प्रयोग करने वाले लोग हिंदी का प्रयोग करते हैं । तो वहीं दूसरी तरफ अधिकांशतः बड़ी–बड़ी संचार कंपनियों को हिंदी में बड़ा उपभोक्ता बाजार दिखाई दे रहा है, जिससे वे हिंदी तकनीक के जरिए सुविधाएं प्रदान कर रही हैं । यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्वीटर भी इससे अछूता नहीं है, भारतीय युवावर्ग अधिकतर इनका उपयोग हिंदी में ही करते दिखाई देते हैं ।
वैश्वीकरण, बाजारवाद और सूचना क्रांति के इस युग में प्रतिपल बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच हिंदी भाषा एक नए रूप में सामने उभर कर आ रही है । आज भारत वैश्विक अर्थजगत में महाशक्ति बनकर उभर रहा है । प्राप्त जानकारी के आधार पर विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली माने जाने वाले देश अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने तो अपने देश के नागरिकों को कई बार हिंदी सीखने की सलाह दे चुके हैं क्योंकि उन्हें भी लगता है कि भारत विश्व शक्ति के रूप में सामने उभर कर आ रहा है जिसके लिए आने वाले भविष्य में हिंदी सीखना अनिवार्य होगा ।
हिंदी पूरी तरह से सक्षम और समर्थ भाषा होने के साथ–साथ यह वैज्ञानिक भाषा भी है । इसकी सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि यह जैसे बोली जाती है, वैसी ही लिखी जाती है । अतः हिंदी भाषा पूरी तरह से ध्वनि और उच्चारण आधारित भाषा है । कहना न होगा कि जितनी वैज्ञानिकता हिंदी भाषा में है उतनी विश्व की अन्य किसी भी भाषा में नहीं है ।
जहां एक तरफ पहले लोग हिंदी को नफरत भरी दृष्टि से देखते थे वहीं आज उन लोगों की सोच बदल चुकी है । भारत में उपभोक्ता वस्तुओं के वृहद् बाजार को आज अनदेखा करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है । विदेशी कंपनियों के लिए भारतीय बाजारों के खुलने के साथ ही कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत की तरफ अपने कदम बढ़ाया है । अपने उत्पादों के विपणन के लिए आज कंपनियों ने हिंदी भाषा को चुना है क्योंकि यह भाषा सबसे बड़ा बाजार उपलब्ध कराती है । यह सच है कि आज वैश्वीकरण तथा भूमंडलीकरण के कारण विश्व के अनेक देशों में व्यापार बढ़ा है । बढ़ते बाजारवाद के कारण ही उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिला है । भूमंडलीकरण सीधा बाजारवाद से जुड़ा हुआ है तथा बाजार का सीधा संबंध भाषा से है ।
आज बाजारवाद ने राष्ट्रीय सीमाएँ तोड़ दी हैं क्योंकि सभी देश यही चाहते हैं कि उसका सामान बिके । जब सामान बिकेगा तो ही उत्पादन बढ़ेगा । इस भूमंडलीकृत उपभोक्तावाद के दौर में हिन्दी आम जन के बोलचाल की भाषा के साथ–साथ उपभोक्ता की भी भाषा बन गई है । कहना न होगा कि हिंदी आज वैश्विक अथवा ग्लोबल बनती जा रही है । विश्व बाजार में हिन्दी की बढ़ती हुई ताकत को देखते हुए भूमंडलीकरण के इस दौर में हिन्दी का भविष्य काफी उज्ज्वल प्रतीत हो रहा है ।

