Thu. Jan 23rd, 2020

आहः प्रकृति हमें कितना देती है : श्वेता दीप्ति

हिमालिनी, अंक नोभेम्बर 2018, (सम्पादकीय ) हिन्दू धर्म या यूँ कहूँ कि सनातन हिन्दू धर्म पद्धति हमारे जीने की पद्धति है तो गलत नहीं होगा क्योंकि हम प्रकृति के हरेक सोपान से जुड़कर जीवन की शुरुआत करते हैं । जहाँ हम प्रकृति के कण–कण के प्रति ऋणी होते हैं और समय–समय पर उसके प्रति अपना आभार भी व्यक्त करते हैं । किन्तु अफसोस कि आज हम अपनी प्रकृति की पूजा तो करते हैं, पर उसका संरक्षण नहीं करते । नदियाँ प्रदूषित हो गईं, कल–कल बहती नदियों का स्वरूप बदल गया । हवा दूषित हो गई, विकास के नाम पर वृक्षों का कटना, नदियों की सीमाओं को बाँधना, पहाड़ों के विस्तार को कम करना, उसके गर्भ में सुरंग बनाना जारी है और यही कई पीढि़यों के बाद सभ्यता के विनाश का कारण भी बनने वाली है । जिसकी आहट कई बार प्रकृति देती भी है, पर आज का सभ्य मानव विज्ञान से विनाश की ओर बढ़ने से तनिक भी नहीं हिचकिचा रहा है । सूर्योपासना का महापर्व अब काठमान्डू में भी बहुत ही जोरशोर और धूमधाम से मनाया जाता है, पर जब भी व्रतियों को बागमती के पानी में आराधना करती देखती हूँ तो सिहरन होती है । क्योंकि राजधानी की बागमती ने तो कब का अपना स्वरूप हम जैसों की वजह से बदल कर नदी से नाले में परिवर्तित कर लिया है । कब चेतेंगे हम ?
एक छोटे से शब्द “प्रकृति” में कितना कुछ समाता है कोई सोच भी नहीं सकता । प्रकृति के अन्दर वायु, पानी, मिट्टी, पेड़–पौधे, पशु–पक्षी, नदियाँ, सरोवर, झरने, समुद्र, जंगल, पहाड़, खनिज आदि और न जाने कितने प्राकृतिक संसाधन आते हैं । इन सभी से हमें साँस लेने के लिए शुद्ध हवा, पीने के लिए पानी, भोजन आदि जो जीवन के लिए नितान्त आवश्यक हैं उपलब्ध होते हैं । प्रकृति से हमें जीवन जीने की उमंग मिलती है । बसंत देख कर दिल खुश होता है, सावन में रिमझिम बरसात मन को मोह लेती है, इंद्रधनुष हमारे अंतरंग में रंगीन सपने सजाता है । प्रकृति हमें शारीरिक सुख–सुविधा के साथ–साथ मानसिक सुख भी देती है पर हमारे पास प्रकृति को देने के लिए कोई वस्तु नहीं है । यदि कुछ है तो वह सिर्फ इतना कि हम इसका संरक्षण कर सकें ।
नेपाल की बामपंथी राजनीति से राजनीतिज्ञ और मानवअधिकारकर्मी पद्मरत्न तुलाधर का परलोकवासी होना निःसन्देह देश के लिए एक अपूरणीय क्षति है । राष्ट्रीय पंचायत की सभा में बहुदलीय व्यवस्था और प्रजातंत्र के पक्ष में बोलने वाले मुखर वक्ता थे आप । युद्धरत माओवादी को शांतिप्रक्रिया में लाने में आपकी गहन भूमिका थी । देश आपको अश्रुपुरित श्रद्धांजलि अर्पित करता है ।
प्रकृति के महान पर्व सूर्योपासना छठ पर्व की मंगलमय कामना और यह शुभेच्छा कि हम अपने कर्तव्य के प्रति सजग हों और उर्जावान बनें । प्रकृति पर्व पर हम सब यह प्रण करें कि जो प्रकृति हमें सिर्फ देती है हम उसे सिर्फ सुरक्षा और संरक्षण दें ।

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