Fri. Jan 24th, 2020

प्रत्येक साहित्यकार अपने देश के अतीत से प्राप्त विरासत पर गर्व करता है : श्वेता दीप्ति

साहित्यसङ्गीतकलाविहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः

हिमालिनी, अंक डिसेम्वर 2018, (सम्पादकीय ) भर्तृहरि नीतिशतक में कहा गया है कि “साहित्यसङ्गीतकलाविहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः” अर्थात् “साहित्य संगीत और कलाविहीन नर साक्षात नाखून और सींघ रहित पशु के समान है ।”

 

साहित्य, संगीत, कला और संस्कृति किसी भी देश की पहचान होती है । साहित्य यानि वास्तविकता में कल्पना की उड़ान, संगीत यानि ईश्वर की प्राप्ति का माध्यम और कला तथा संस्कृति यानि स्वयं से स्वयं की पहचान । और इन सब में जो तत्व अहम है, वह है अपनी मिट्टी की सोंधी खुशबु क्योंकि, इनका जन्म इसी मिट्टी से होता है, जो उस मिट्टी की पहचान बन जाती है । तभी तो लोक साहित्य या लोक संगीत या कला का जीवंत भाव हमें अपनी धरती से आबद्ध करता है । प्रत्येक देश का साहित्य अपने देश की भौगोलिक, सामाजिक, राजनीतिक,  सांस्कृतिक परिस्थिति से संबद्ध होता है और इसमें देश की आत्मा निहित होती है । इतिहास की महत्ता जहाँ तिथियों और सत्य घटनाओं से है, वहीं साहित्य की महत्ता उन घटनाओं को रोचकता के साथ प्रस्तुत करने के लिए है । जहाँ इतिहास की नीरसता सभी को स्वयं से आबद्ध नहीं कर पाती, वहीं साहित्य बहुत ही सहजता के साथ पाठक को खुद से जोड़ लेता है । प्रत्येक साहित्यकार अपने देश के अतीत से प्राप्त विरासत पर गर्व करता है, वर्तमान का मूल्यांकन करता है और भविष्य के लिए सपने बुनता है ।
नेपाली साहित्य का विकास अन्य देशों की अपेक्षा काफी बाद में हुआ, बावजूद इसके एक समृद्ध साहित्य यहाँ की विरासत है । विकास की गति प्रारम्भ में कम होने की वजह सम्भवतः यहाँ का राजतंत्र रहा हो, क्योंकि लेखकों की कलम स्वतंत्र नहीं थी और प्रकाशन की सुविधा भी नहीं थी । भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन का और वहाँ  के साहित्य एवं साहित्यकारों का यहाँ के साहित्य पर गहराई से प्रभाव पड़ा । शिक्षा का केन्द्र भारत था इसलिए भी स्वाभाविक रूप से यहाँ का साहित्य प्रभावित हुआ । कई लेखक ऐसे हैं जिनकी लेखनी की शुरुआत हिन्दी भाषा से हुई । विभिन्न संस्कृति, भाषा और परम्पराओं से सुसज्जित प्रकृति के आँचल में बसा नेपाल सचमुच पृथ्वी का सिरमौर है जो धवल हिमालय के ताज से गौरवान्वित है ।
उतार चढ़ाव के साथ ही हिमालिनी अपने इक्कीस वर्ष पूरी कर रही है जो स्वयं में एक महत्तवपूर्ण उपलब्धि है । यह वर्ष नेपाल के साहित्य के इतिहास में इसलिए भी महत्तवपूर्ण है, क्योंकि यह वर्ष नेपाल अपने राष्ट्रकवि माधवप्रसाद धिमिरे का शतायु वर्ष मना रहा है । इसी सुखद अवसर पर हिमालिनी का इक्कीसवें वर्ष का यह अंतिम अंक, नेपाल के राष्ट्रकवि, नेपाल की बहुरंगी संस्कृति और समृद्ध साहित्य को समर्पित है ।
राहें कठिन हो तो गम न कर
मुश्किलों में हौसले कम न कर ।
वक्त बदला है और बदलेगा जरुर,
उम्मीदों की रोशनी कम न कर ।

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