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Shweta Deepti डा. श्वेता दीप्ति
 

 

हम उस देश में साँसे ले रहे हैं जहाँ सबकुछ औरों के भरोसे चलता है क्योंकि हमारे प्रतिनिधियों के पास न तो कुछ करने की चाहत है और न ही किसी संशाधन को बनाने की सूरत है

 हिमालिनी,सम्पादकीय,अंक मई ।  कोरोना के कहर ने जिन्दगियों को लील लिया है । बेबस लाचार इंसान हर पल अपने सामने मौत की नंगी तसवीर देखने को विवश है । मौत सत्य है किन्तु आज सिर्फ मौत ही सत्य लग रहा है क्योंकि, जिन्दगी पर से यकीन उठता जा रहा है । 

कहाँ हार गई दुनिया और कहाँ हार गए हम ?

यथा ह्यल्पेन यत्नेन च्छिद्यते तरुणस्तरुः । 

स एवाऽतिप्रवृध्दस्तु च्छिद्यतेऽतिप्रयत्नतः ।। 

एवमेव विकारोऽपि तरुणः साध्यते सुखम् । 

विवृध्दः साध्यते कृछ्रादसाध्यो वाऽपि जायते ।। (चरक निदान ५÷१३–१६)

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अर्थात् जिस तरह छोटे और कोमल पौधे, बड़े पेड़ों की तुलना में, आसानी से तोड़े और काटे जा सकते हैं, ठीक उसी तरह किसी भी रोग को शुरुआत में ही उपचार और नियंत्रित करना आसान होता है, बढ़ जाने पर इसे साधना असंभव हो जाता है । जी हाँ बस यहीं हार गए हम और हमारी व्यवस्था । सब कुछ जीत लेने का भ्रम आज हमें हमारी औकात दिखा रहा है । एक वायरस और दुनिया घुटने पर आ गई । आज भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह वायरस एक सोची समझी साजिश का नतीजा था जिसका भयंकर परिणाम हमारे सामने है । किन्तु हम अपनी लापरवाही से और भी अधिक इसमें फसते चले गए । 

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हम उस देश में साँसे ले रहे हैं जहाँ सबकुछ औरों के भरोसे चलता है क्योंकि हमारे प्रतिनिधियों के पास न तो कुछ करने की चाहत है और न ही किसी संशाधन को बनाने की सूरत है । हम सहायता के भरोसे साँस लेते हैं और जीते हैं । परन्तु यह सहायता भी ईमानदारी से कहाँ हम तक पहुँच पाती है । यहाँ भी सौदा है, कमीशन है और मरते–मरते भी कमा लेने की भूख है । 

सत्ता की दौड़ और अनिश्चितताओं ने जनता की मौत को अनदेखा कर दिया है । वैसे नए कार्यकाल की शुरुआत प्रधानमंत्री ने इसी जुमले से किया है कि ‘अब राजनीति नहीं महामारी की बात करें’ । जनता भी तो यही चाहती है । गरीबी, भूख, बेरोजगारी पर यह महामारी भारी पड़ रही है । साँसों के लिए छटपटाते लोगों की पहली जरूरत उनकी साँस है और अपनी सरकार पर टिकी उनकी आस है । 

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सरकार अब तो अपनी आँखें खोलिए । पक्ष और विपक्ष दोनों को सजग होने की आवश्यकता है, एक होने की आवश्यकता है । जनप्रतिनिधियों को चाहिए कि वे अपने–अपने क्षेत्रों में जनता की समस्याओं पर ध्यान दें । सभी दलों कोे इस कार्य में एकजुट होकर सहभागी होना चाहिए और जनता को यह अहसास दिलाना चाहिए कि देश में सरकार भी है, और तंत्र भी है ।

Shweta Deepti डा. श्वेता दीप्ति
डा. श्वेता दीप्ति
सम्पादक, हिमालिनी । पूर्व अध्यक्ष- केन्द्रीय हिंदी विभाग, त्रिविवि ।

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