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प्रकृति के असीमित दोहन का परिणाम मानव भुगत रहा है : श्वेता दीप्ति

 

सम्पादकीय, हिमालिनी ,अप्रील २०२१ अंक, पिछले कुछ दिनों से काठमान्डू के आकाश में पर्यावरण प्रदूषण का जो आलम दिख रहा है, उसने अस्पतालों में आँख के बीमारों की भीड़ लगा दी है । आँखें जल रही हैं और साँस लेना दूभर हो रहा है । सच तो यह है कि हम अपनी ही गलती की सजा भुगत रहे हैं । प्राचीन काल में प्रकृति और मानव के बीच भावनात्मक संबंध था ।

मानव अत्यंत कृतज्ञ भाव से प्रकृति के उपहारों को ग्रहण करता था । प्रकृति के किसी भी अवयव को क्षति पहुँचाना पाप समझा जाता था । बढ़ती जनसंख्या एवं भौतिक विकास के फलस्वरूप प्रकृति का असीमित दोहन प्रारम्भ हुआ । वृक्षों को काट–काट कर मानव समाज ने धरती को नग्न कर दिया । वन्य जीवों के प्राकृतवास वनों के कटने के कारण वन्य–जीव बेघर होते गए । औद्योगीकरण और ईंटों की भट्टियों से लगातार जहर उगलती चिमनियों ने वायुमण्डल को विषाक्त एवं निष्प्राण बना दिया ।

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हमारी पावन नदियाँ अब गंदे नाले का रूप ले चुकी हैं । नदियों का जल विशाक्त होने के कारण उसमें रहने वाली मछलियाँ एवं अन्य जलीय जीव तड़प–तड़प कर मर रहे हैं । बढ़ते ध्वनि प्रदूषण से कानों के परदों पर लगातार घातक प्रभाव पड़ रहा है । लगातार घातक रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग भूमि को ऊसर बनाता जा रहा है । पृथ्वी पर अम्लीय वर्षा का प्रकोप धीरे–धीरे बढ़ता जा रहा है तथा लगातार तापक्रम बढ़ने से पहाड़ों की बर्फ पिघल रही है, जिससे पृथ्वी का अस्तित्व संकटग्रस्त होता जा रहा है । इन सबके पीछे वजह सिर्फ मानव जाति है । 

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हमारा वायुमण्डल हमारे स्वास्थ्य को सर्वाधिक प्रभावित करता है, इस तथ्य के विपरीत हमने विभिन्न पर्यावरणीय तंत्रों को इस सीमा तक परिवर्तित कर दिया है जिसका परोक्ष दुष्परिणाम हमें स्पष्ट दिखाई देता है । इस स्थिति पर ध्यान न देना आत्महत्या सिद्ध होगा । अतः हम सबको मिलकर इस धरती पर प्रलयकारी परिस्थिति पैदा होने की आशंका को टालने के लिये निरंतर संघर्ष करना होगा । वायु प्रदूषण से उत्पन्न समस्याओं को हम भले ही रोक तो नहीं सकते, परंतु कुछ विशिष्ट सुरक्षा उपायों से कुछ हद तक पर्यावरण संरक्षण, संतुलन व विकास में योगदान कर सकते हैं ।

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सरकार को चाहिए कि इस दिशा में कोई सार्थक कदम उठाएँ, चेतनामूलक कार्यक्रम चलाएँ और सबसे बड़ी बात कि हम स्वयं को सचेत करें । प्लास्टिक का कम प्रयोग, कचड़े का सही व्यवस्थापन, अधिक से अधिक वृक्षारोपण ये कुछ बातें हैं जो हम सामुदायिक स्तर पर कर सकते हैं और कुछ हद तक खुद की और दूसरों की भी सुरक्षा हो सकती है ।

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