नेपाल में बालेन सरकार के सौ दिन : उपलब्धि,चुनौतिऔर जनअपेक्षाएँ ! चन्दन दुबे:
चन्दन दुबे, जलेश्वर, ६ जुलाई। किसी भी नई सरकार के गठन के बाद उसके पहले सौ दिनों को विशेष महत्व के साथ देखा जाता है। यह अवधि सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं, कार्यशैली, निर्णय क्षमता और भविष्य की दिशा का प्रारम्भिक संकेत देने का महत्वपूर्ण अवसर होता है। सौ दिनों में सभी समस्याओं का समाधान संभव नहीं होता, अपितु सरकार किन प्राथमिकताओं पर कार्य करना चाहती है, प्रशासनिक तंत्र का किस प्रकार उपयोग करती है, जनता की अपेक्षाओं को किस प्रकार संबोधित करती है और सुशासन के प्रति कितनी प्रतिबद्ध है, इसका प्रारम्भिक आकलन इसी अवधि में होने लगता है।
नेपाल में लगभग दो-तिहाई बहुमत और असाधारण मत प्रतिशत के दम पर बनी बालेन सरकार से जनता की अपेक्षाएँ भी असाधारण हि है ! पूर्व की सरकारों के प्रति बढ़ती निराशा, आर्थिक सुस्ती, महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता से परेशान नागरिकों ने इस सरकार से एक परिवर्तित और अलग तरह के नेतृत्व की उम्मीद की थी। सरकार ने भी सुशासन, पारदर्शिता, आर्थिक पुनरुत्थान, सेवा-प्रवाह में सुधार, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, रोजगार सृजन और विकास निर्माण को अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की थी।
सौ दिन पूरे होने तक कुछ क्षेत्रों में सकारात्मक संकेत अवश्य दिखाई दिए हैं, किन्तु आम जनता अपने दैनिक जीवन में जिस प्रकार के परिवर्तन की अपेक्षा कर रही थी, वह अभी व्यापक रूप से अनुभव नहीं हुआ है। इसलिए सरकार की उपलब्धियों और कमियों—दोनों का संतुलित मूल्यांकन आवश्यक है।
सरकार की प्राथमिकताएं और सुशासन का नारा
सरकार के गठन के तुरंत बाद प्रधानमंत्री और मंत्रियों ने मंत्रालय अन्तर्गत कार्ययोजनाएँ तैयार करने, निर्णय प्रक्रिया को तेज़ बनाने तथा प्रशासन को परिणाममुखी बनाने की दिशा में पहल की। कुछ मंत्रालयों ने डिजिटल प्रणाली के विस्तार, फाइल प्रबंधन के सरलीकरण, नागरिक सेवाओं के ऑनलाइनकरण तथा अंतर-मंत्रालयीय समन्वय को प्राथमिकता दी।
सरकार ने नियमित निगरानी, कार्यों की समय-सीमा तय करने और प्रदर्शन मूल्यांकन की व्यवस्था लागू करने के संकेत भी दिए। फिर भी केंद्र स्तर पर लिए गए अनेक निर्णय स्थानीय स्तर तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुँच सके। नौकरशाही की पारंपरिक कार्यशैली, विलंब और प्रक्रियागत जटिलताओं के कारण सरकार के कई निर्णयों का अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दिया।
सरकार के प्रमुख नारों में सुशासन सर्वोच्च प्राथमिकता पर था। सार्वजनिक संस्थानों को अधिक पारदर्शी बनाना, सरकारी खर्च में मितव्ययिता लाना, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करना तथा कानून का समान रूप से पालन सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई।
सार्वजनिक खरीद प्रणाली में सुधार, अनियमितताओं की निगरानी, सरकारी व्यय पर नियंत्रण तथा डिजिटल माध्यम से सेवा-प्रवाह के विस्तार जैसे प्रयास प्रारम्भ किए गए हैं। इसके बावजूद आम नागरिकों को सरकारी कार्यालयों में सेवाएँ प्राप्त करने के लिए अभी भी अनावश्यक प्रक्रियाओं, विलंब और कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर, मंत्रियों के जम्बो निजी सचिवालयों की व्यवस्था ने सरकारी खर्च में मितव्ययिता के दावे पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
सुशासन की वास्तविक परीक्षा बड़े-बड़े भाषणों से नहीं, बल्कि व्यवहारिक परिणामों से होती है। यदि सरकार भ्रष्टाचार के मामलों में निष्पक्ष जाँच, राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त कानून का पालन और सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित कर पाती है, तभी उसके दावे विश्वसनीय सिद्ध होंगे।
सीमा शुल्क,राजस्व और व्यापार तथा अर्थव्यवस्था की चुनौतियाँ
सरकार ने आर्थिक गतिविधियों को गति देने, निवेश आकर्षित करने, उत्पादन बढ़ाने और निजी क्षेत्र का विश्वास जीतने की दिशा में नीतियाँ आगे बढ़ाई हैं। कुछ आर्थिक संकेतकों में सुधार के संकेत भी दिखाई दिए हैं। राजस्व संग्रह में वृद्धि, विदेशी मुद्रा भंडार की संतोषजनक स्थिति, पर्यटन क्षेत्र में क्रमिक सुधार तथा बैंकिंग क्षेत्र में तरलता की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर होने का सरकारी दावा है।
हालाँकि निजी क्षेत्र अभी भी निवेश को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिख रहा है। उद्योग-धंधे अपनी पूर्ण क्षमता से संचालित नहीं हो पा रहे हैं। निर्माण क्षेत्र सुस्त बना हुआ है, युवाओं का विदेश पलायन जारी है और कृषि उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो सकी है।
सरकार ने पूँजीगत व्यय बढ़ाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है, किन्तु उसके कार्यान्वयन की गति अभी भी चुनौती बनी हुई है। आर्थिक सुधार की वास्तविक सफलता उत्पादन, निर्यात, उद्योग, कृषि और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में ठोस परिणामों से ही मापी जाएगी।
राजस्व चोरी रोकने और अवैध आयात पर नियंत्रण के लिए सरकार ने सीमा शुल्क प्रणाली को सख्त बनाया है। इससे सरकारी आय में कुछ वृद्धि होने का दावा किया गया है। हालांकि सीमावर्ती क्षेत्रों के व्यापारियों और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि दैनिक उपयोग की वस्तुएँ लाने में कठिनाई बढ़ी है, व्यापार प्रभावित हुआ है तथा छोटे व्यवसायों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
राजस्व वृद्धि आवश्यक है, किन्तु व्यापार को सुगम बनाना और आम जनजीवन को सहज बनाए रखना भी सरकार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इसलिए नियंत्रण और व्यापारिक सुविधा के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
महँगाई और आम नागरिक का जीवन
सरकार का वास्तविक मूल्यांकन जनता अपने दैनिक जीवन के अनुभवों के आधार पर करती है। खाद्यान्न, सब्जियाँ, ईंधन, दवाइयाँ और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें अभी भी ऊँची बनी हुई हैं। सरकार ने बाजार अनुगमन और कालाबाज़ारी पर नियंत्रण के लिए अभियान चलाए हैं, लेकिन उनका व्यापक प्रभाव अभी तक स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दिया है।
महँगाई पर नियंत्रण, रोजगार सृजन, उत्पादन वृद्धि और लोगों की आय बढ़ाए बिना नागरिक आर्थिक सुधार का वास्तविक अनुभव नहीं कर पाएँगे। इसलिए आने वाले दिनों में सरकार को बाजार प्रबंधन को और अधिक प्रभावी बनाना होगा।
विकास निर्माण और आधारभूत संरचना
सरकार ने राष्ट्रीय गौरव की परियोजनाओं, सड़क, ऊर्जा, पेयजल, सिंचाई तथा शहरी आधारभूत संरचना से जुड़ी योजनाओं को गति देने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है। कुछ रुकी हुई परियोजनाएँ पुनः आगे बढ़ी हैं, लेकिन अनेक योजनाओं में बजट खर्च की धीमी गति, ठेका प्रबंधन की समस्याएँ और प्रशासनिक अवरोध अभी भी बने हुए हैं।
विकास की गति तेज़ करने के लिए केंद्र, प्रदेश और स्थानीय सरकारों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। समय पर बजट व्यय और परियोजनाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने पर विशेष ध्यान देना होगा।
विदेश नीति और सीमा का प्रश्न
सीमा संबंधी विषयों पर प्रधानमंत्री के बयानों के कारण सरकार के पहले सौ दिनों में नेपाल-भारत सीमा, कूटनीतिक अभिव्यक्ति और पड़ोसी देशों के साथ संबंध चर्चा का विषय बने रहे। राष्ट्रीय हित, कूटनीतिक संतुलन और सीमा संबंधी मामलों में सरकार को स्पष्ट, संयमित और दीर्घकालिक नीति अपनाने की आवश्यकता है।
नेपाल की विदेश नीति राष्ट्रीय हित, आर्थिक कूटनीति, निवेश, पर्यटन और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मजबूत करने की दिशा में केंद्रित होनी चाहिए। भावनात्मक वक्तव्यों की अपेक्षा संस्थागत और परिपक्व कूटनीतिक पहल दीर्घकाल में अधिक प्रभावकारी सिद्ध होती है।
संसदीय आचरण और विपक्ष की भूमिका
लोकतंत् में विपक्ष की भूमिका केवल सरकार की आलोचना करना नहीं, बल्कि रचनात्मक सुझाव देना भी है। पहले सौ दिनों के दौरान विपक्ष ने आर्थिक स्थिति, प्रशासनिक कमियों, महँगाई, भ्रष्टाचार तथा विभिन्न नीतिगत निर्णयों को लेकर सरकार से सवाल किए हैं। दूसरी ओर, सत्तापक्ष के कुछ सांसदों का अपरिपक्व और केवल प्रचार-प्रसार केंद्रित बचकाना आचरण भी देखने को मिला। हालांकि सभी सांसद ऐसे नहीं रहे; कुछ जनप्रतिनिधियों ने अपने जिम्मेदार संसदीय व्यवहार से नागरिकों का विश्वास भी अर्जित किया है।
राष्ट्रीय हित में सरकार और विपक्ष के बीच संवाद, समन्वय और सहयोग की आवश्यकता स्पष्ट रूप से महसूस की जा रही है। यदि दोनों पक्ष जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए संसदीय बहस को सार्थक बना सकें, तो लोकतंत्र और अधिक सशक्त होगा और सरकार संचालन में भी सहजता होगी ।
आगे की चुनौतियाँ और निष्कर्ष
अब सरकार की वास्तविक परीक्षा प्रारम्भ होती है। आने वाले समय में आर्थिक विकास को गति देना, निजी क्षेत्र का विश्वास बहाल करना, रोजगार के अवसर पैदा करना, कृषि और उद्योग का आधुनिकीकरण करना, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार लाना तथा सुशासन को व्यवहार में लागू करना सरकार की सबसे बड़ी चुनौतियाँ होंगी।
इसके साथ ही पूँजीगत व्यय बढ़ाना, परियोजनाओं को समय पर पूरा करना, नौकरशाही को अधिक जवाबदेह बनाना तथा सार्वजनिक सेवाओं में आधुनिक तकनीक के उपयोग का विस्तार करना भी अत्यंत आवश्यक होगा।
बालेन सरकार के पहले सौ दिन मिश्रित परिणामों के साथ पूरे हुए हैं। कुछ क्षेत्रों में सुधार के संकेत अवश्य दिखाई दिए हैं, लेकिन अनेक क्षेत्रों में आम नागरिक अभी भी प्रत्यक्ष परिवर्तन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सरकार की इच्छाशक्ति और घोषणाएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं, किन्तु उन्हें ठोस परिणामों में बदलने के लिए अधिक प्रभावी योजना और सशक्त क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
अब सरकार का मूल्यांकन केवल घोषणाओं या नारों के आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक सुधार, सुशासन, रोजगार, सेवा-प्रवाह, विकास निर्माण और नागरिकों के जीवन स्तर में आए वास्तविक परिवर्तन के आधार पर होगा। बड़े जनादेश और व्यापक जनसमर्थन के साथ सत्ता में आई इस सरकार के लिए लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं है।
यदि सरकार अपनी प्रारम्भिक प्रतिबद्धताओं को प्रभावी ढंग से व्यवहार में उतारने में सफल होती है, तो पहले सौ दिनों में दिखाई दी संभावनाएँ आने वाले वर्षों में ठोस उपलब्धियों में बदल सकती हैं। अन्यथा, जनता की ऊँची अपेक्षाएँ ही सरकार पर सबसे बड़ा दबाव बन जाएँगी।



