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मौत के आने से पहले मौत का तोहफा यही है जनता के लिये सौगात : डॉ श्वेता दीप्ति

Shweta Deepti डा. श्वेता दीप्ति
 

सम्पादकीय, हिमालिनी अंक अक्टूबर 2020 | महामारी का असली चेहरा तो अभी दिखा ही नहीं है और सरकार ने अपना चेहरा दिखा दिया । एक ओर मौत, बेरोजगारी, भूख का त्रास उस पर असंवेदनशील सरकार के द्वारा जारी किया गया फरमान । सरकार का निर्णय कि अब कोरोना जाँच या इलाज का खर्च आम नागरिक को स्वयं वहन करना होगा स्वयं में एक अनैतिक कदम है जिसकी सराहना तो कदापि नहीं की जा सकती है । एक ओर दशहरा भत्ता पर बवाल और दूसरी ओर मौत के आने से पहले मौत का तोहफा यही है नेपाली जनता के लिए महापर्व दशहरा का सौगात । अब जियो या मरो अपनी बला से ।

नए फैसले के साथ, अब केवल वे लोग जो कम से कम दो हजार रुपये का भुगतान कर सकते हैं, कोरोना का परीक्षण करवा सकेंगे । किन्तु क्या यह उनके लिए सम्भव है जो लाकडाउन की मार के बीच जीवनयापन की कोशिश कर रहे हैं ? उनके लिए यह दो हजार की राशि बहुत बड़ी है जो दो हजार रुपये कमाकर जीवन यापन करते हैं। एक ओर उनकी कोरोना महामारी के कारण आर्थिक स्थिति पहले ही खराब हो चुकी है ऐसे में अगर उन्हें पूरे परिवार का टेस्ट कराना पडा तो क्या यह उनके लिए सम्भव है ? इस स्थिति में उनके पास बस एक ही विकल्प है कि वो टेस्ट नहीं कराएँगे  और तब स्थिति की भयावहता का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है । कोरोना के सामुदायिक रूप में फैलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है ।

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जहाँ अस्पताल से डाक्टरों की टीम, सरकार से आक्सीजन और बेड बनाने की मांग कर रहे हैं, वहीं सरकार का यह अव्यवहारिक और अवैज्ञानिक निर्णय सामने आ गया है । इतना ही नहीं कोरोना संक्रमित के निधन के पश्चात परिवार जन के निधन की राह खोल दी गई है । अब तक कोरोना संक्रमित मरीज के निधन के बाद उनके शव व्यवस्थापन की जिम्मेदारी सेना की थी क्योंकि माना जाता रहा है कि शव को छूने से भी संक्रमण का खतरा है इसलिए शव व्यवस्थापन में पूरी सतर्कता और सामान की आवश्यकता है जो अब स्वयं मृतक के परिजनों को करना होगा जो किसी भी नजर से सही नहीं है ।

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सरकार का यह फैसला कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विपरीत है। क्योंकि वैश्विक स्तर पर यह सिद्ध हो चुका है कि कोरोना वायरस संक्रामक है, और संक्रामक रोग अधिनियम के अनुसार, सरकार को इसके परीक्षण और उपचार की जिम्मेदार लेनी होती है । यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में किया है। जिसमें कहा गया है कि केवल सरकारी ही नहीं बल्कि निजी पीसीआर परीक्षणों को भी निः शुल्क किया जाना चाहिए और उपचार की व्यवस्था की जानी चाहिए ।

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सामने त्योहार का मौसम है बस ईश्वर से यही प्रार्थना है कि सबकी रक्षा करें । अपनी सुरक्षा अपने हाथ, सतर्क रहें, सुरक्षित रहें ।

डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादक हिमालिनी

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