गृहमंत्री का इस्तीफा: गलत नियुक्ति का देर से सामने आया सच
हिमालिनी डेस्क, 22 अप्रैल, 026। निवेश और शेयर कारोबार से जुड़े विवाद लगातार बढ़ने के बाद आखिरकार गृहमंत्री सुघन गुरुंग को गृहमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से यह कहते हुए पद छोड़ा कि उनके खिलाफ उठे सवालों की निष्पक्ष जांच हो सके और पद पर रहते हुए किसी प्रकार का ‘कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ न दिखे।
लेकिन यह केवल एक मंत्री के इस्तीफे की कहानी नहीं है। असल सवाल यह है कि आखिर शुरुआत में ही इतनी संवेदनशील जिम्मेदारी ऐसे व्यक्ति को क्यों सौंपी गई, जिसके व्यावसायिक रिश्ते और निवेश को लेकर विवाद खड़े हो सकते थे।
सम्पत्ति शुद्धीकरण से जुड़े मामले में जांच के दायरे में आए व्यवसायी के साथ व्यावसायिक साझेदारी की जानकारी सार्वजनिक होने के बाद से ही गुरुङ पर सवाल उठने लगे थे। ऐसे में एक गृहमंत्री—जिसके हाथ में कानून-व्यवस्था और सुरक्षा तंत्र की जिम्मेदारी हो—उसके ऊपर इस तरह के संदेह उठना स्वयं सरकार की विश्वसनीयता पर गंभीर चोट माना जा रहा है।
इस्तीफा देते हुए गुरुङ ने कहा कि उनके लिए पद से बड़ा नैतिकता और जनविश्वास है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि राजनीति में नैतिकता केवल इस्तीफा देने के बाद याद करने की चीज नहीं है। नैतिकता का पहला परीक्षण तो तब होता है, जब किसी व्यक्ति को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाती है।
प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार पहले से ही सुशासन, पारदर्शिता और नई राजनीतिक संस्कृति का दावा करती रही है। लेकिन यदि उसी सरकार के मंत्री बार-बार निवेश, शेयर और व्यावसायिक हितों को लेकर विवादों में घिरते हैं, तो यह सरकार की राजनीतिक विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
आज सवाल केवल सुधन गुरुङ के इस्तीफे का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या सरकार अपने मंत्रिमंडल की योग्यता और पृष्ठभूमि की गंभीरता से समीक्षा करेगी या नहीं। क्योंकि यह भी सच्चाई है कि मंत्रिमंडल में अभी भी ऐसे कुछ चेहरे मौजूद हैं, जिनकी क्षमता और नीयत को लेकर जनता के बीच असंतोष और शंका दोनों मौजूद हैं।
यदि परिवर्तन और साफ राजनीति का दावा करने वाली (रास्वपा) वास्तव में जनता का भरोसा बनाए रखना चाहती है, तो उसे अब प्रतीकात्मक फैसलों से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे। केवल इस्तीफे से राजनीतिक जवाबदेही पूरी नहीं होती; इसके लिए पारदर्शी जांच, जिम्मेदार राजनीतिक निर्णय और सक्षम नेतृत्व की नियुक्ति जरूरी होती है।
अन्यथा, जो सरकार परिवर्तन और नई राजनीति का वादा लेकर सत्ता में आई थी, वही धीरे-धीरे पुराने राजनीतिक ढांचे और समझौतों की प्रतीक बनती दिखाई देगी। और तब जनता के मन में यह सवाल और भी तेज़ी से उठेगा—क्या सच में राजनीति बदली है, या केवल चेहरे बदले हैं?


