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चिन्तन का विषय यह है कि नीति बड़ी होती है या नेता ? : श्वेता दीप्ति

 

डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय हिमालिनी अंक जुलाई ०२५।

नेता कब नीति के अनुरूप आचरण करेंगे ?

 वर्तमान दौर पर निगाह डालें तो राजनीति में संवेदना और नैतिकता लगातार कम होती जा रही है । नैतिकता का शाब्दिक अर्थ है, नीति के अनुरूप आचरण । राजनीति में नैतिकता का अर्थ भी राज्य को नीति के अनुरूप संचालित करना है, परन्तु आज राजनीति में नीति की परिभाषा बदल चुकी है । राजनीति नीति से जुड़ी है । नीति के बिना राजनीति की कल्पना नहीं की जा सकती । इसी तरह नेताओं के बिना राजनीति की कल्पना नहीं की जा सकती । इस अर्थ में नेता, नीति और राजनीति एक साथ चलते हैं । राजनेता ही नीतियां बनाते हैं और नीतियों को लागू करते हैं ।

हम सभी जानते हैं कि राजनीति हर देश में सबसे ऊपर होती है । राजनीति देश का भविष्य तय करती है । राजनीति हर मोड़ पर हर व्यक्ति को छूती है । हर राजनीतिक दल के अपने आदर्श, सिद्धांत और नीतियां होनी चाहिए और होती भी हैं । क्या ऐसे आदर्श और सिद्धांत देश की जरूरतों, लोगों के दैनिक जीवन और लोगों की आजीविका से सीधे जुड़े हैं ? क्या ये आदर्श, सिद्धांत और नीतियां व्यवहार में भी लागू होती हैं ? ऐसी नीतियां कौन बनाता है ? राजनीतिक दलों की नीतियां कैसे बनती हैं ? ये सवाल महत्वपूर्ण हैं ।

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चिन्तन का विषय यह है कि नीति बड़ी होती है या नेता ? चूंकि राजनीतिक दल में नेता ही नीति बनाता है, इसलिए हम सोचेंगे कि नेता बड़ा होना चाहिए हालांकि, नेता को नीति का पालन करके या नीति के भीतर रहकर काम करना होता है, चूंकि नीति ही राजनीतिक दल की परिधि और सीमाएं निर्धारित करती है, इसलिए कोई भी नेता नीति से ऊपर नहीं होता ।
व्यवहार में नेपाल में हर राजनीतिक दल में नेता को सर्वोच्च मानने की परंपरा है । नेता की बातें अकाट्य होती हैं और उसके फैसले पार्टी के अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं तथा अपनी पार्टी पर थोपे जाते हैं । जो हम हर रोज देखते हैं ।
नेपाल में जनता ने तीनों तरह के शासन देखे और भोगे हैं, यानी पंचायत काल में तानाशाही, लोकतंत्र को अपना आदर्श, मूल्य और मानदंड मानने वाली पार्टियों का शासन, सरकारों और खुद को दुनिया का सबसे अच्छा कम्युनिस्ट कहने वालों का शासन या फिर सभी पार्टियों का शासन । और इसके बाद आज हम कहाँ हैं ?

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दुख की बात है कि आज भी नेपाल और अधिकांश नेपालियों की स्थिति में कोई खास बुनियादी अंतर नहीं आया है । अगर हम मानते हैं कि लोकतंत्र विकास और समृद्धि का आधार है या अर्थव्यवस्था को सुधारने का एकमात्र साधन और साधन है, तो पिछले तीन दशकों में नेपाल की अर्थव्यवस्था और नेपालियों के जीवन स्तर में काफी सुधार होना चाहिए था । परन्तु ऐसा नहीं हुआ है । ऐसा क्यों नहीं हुआ है ? तीन दशकों से बारी–बारी से शासन करने वाली सभी पार्टियों के नेताओं को इसका जवाब देना होगा । अगर कोई विचारधारा या सिद्धांत अपेक्षित विकास और समृद्धि के द्वार नहीं खोल सकता और आम लोगों के जीवन स्तर में आमूलचूल परिवर्तन नहीं कर सकता, तो पार्टी को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए ।

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कौन सी सरकार क्या नीतियां लेकर आई और किस सरकार ने कैसे काम किया, यह सभी के लिए चिंता का विषय है। अधिकांश सरकारी नीतियां और कार्यक्रम केवल लोकप्रियता के लिए, आर्थिक पक्ष और नेता की सनक के आधार पर, बिना शोध, तैयारी और चर्चा के घोषित किए जाते हैं । यही कारण है कि विकास की बात करें तो नेपाल अभी तक कोई ठोस उपलब्धि हासिल नहीं कर पाया है ।
आम लोगों की मुख्य चिंता यह है कि वे अपना दैनिक जीवन कैसे चलाएं । विचारधारा या सिद्धांत कोई भी हो, आम लोगों के लिए यह ज्यादा मायने नहीं रखता, अगर इससे उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव नहीं आए हैं । इसलिए राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के लिए जरूरी है कि वे अपनी विचारधारा के प्रचार–प्रसार पर नहीं, बल्कि ऐसी नीतियां और कार्यक्रम लाने पर ध्यान दें, जिनसे देश की समृद्धि और हर व्यक्ति के जीवन स्तर में सुधार हो और उन्हें ठोस रूप से लागू किया जाए ।

डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक, हिमालिनी ।
काठमांडू, नेपाल ।

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