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अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता लोकतन्त्र की प्राणवायु : डा.श्वेता दीप्ति

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हिमालिनी, सम्पादकीय, अंक मई 2019 |विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता लोकतन्त्र की प्राणवायु की भांति है । लोकतान्त्रिक शासन में इस स्वतन्त्रता का अतिशय महत्व है । यह एक स्थापित सत्य है कि प्रेस की मुख्य भूमिका विरोध की होती है । समाचारपत्र–पत्रिकायें जो कुछ घटित हुआ है मात्र यही नहीं बताते हैं, बल्कि जो कुछ गलत हो रहा है उसे भी सामने रखते हैं और सही क्या हो सकता है इसका इशारा भी करते हैंं । यही वजह है कि समाज के सभी अंग प्रेस को अपने–अपने अनुकूल न पाने के कारण उसकी स्वतन्त्रता को बाधित करने हेतु किसी भी स्तर तक, किसी भी प्रकार के हथकण्डे अपनाते रहे हैं । प्रेस की स्वतन्त्रता का सर्वाधिक हनन सरकार तथा प्रशासन द्वारा किया जाता है क्योंकि उनके पास सर्वाधिक कानून सम्मत शक्ति होती है । वर्तमान में सरकार के द्वारा लाए जा रहे विधेयक ने प्रेस स्वतंत्रता के सवाल पर संचारकर्मियों को उद्वेलित कर दिया है । कई सवाल उत्पन्न हो रहे हैं ।

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किसी भी तंत्र में प्रेस की स्वतन्त्रता बहुत व्यापक अर्थ रखती है । इसका अर्थ केवल समाचार संकलन व प्रकाशन तक ही सीमित नहीं है । अपितु सही समाचारों के प्रकाशन के लिए उचित वातावरण का निर्माण भी प्रेस की स्वतन्त्रता के अन्तर्गत आता है । किन्तु प्रश्न यह उठता है कि क्या यह स्वतंत्रता असीमित है ? अथवा क्या इसकी अपनी कुछ मर्यादाएं भी हैं ? वस्तुस्थिति तो यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को विचार और अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए और राज्य के द्वारा उसकी किसी प्रकार की विचारधारा अथवा भावों की अभिव्यक्ति पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए । किसी विचार का दमन करना या उसके प्रकाश पर रोक लगाना सत्य का दमन करना है, किन्तु यह नकारात्मक स्वतंत्रता है । अतः यह किसी सभ्य समाज में स्वीकार्य व व्यावहारिक नहीं हो सकी है । स्वतंत्रता सभी प्रकार के प्रतिबंधों का अभाव नहीं है अपितु अनुचित प्रतिबंधों के स्थान पर उचित प्रतिबंधों की व्यवस्था है ।

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वस्तुतः किसी भी देश या समाज के लिए प्रेस की स्वतंत्रता एक सकारात्मक स्वतंत्रता है । जो हमें समाज में संतुलित जीवन जीने की परिस्थितियां प्रदान करती है । प्रेस अगर कोई सामयिक विषय या मुद्दों को उठाता है तो प्रशासन या सम्बन्धित निकाय उसे सिद्ध या असिद्ध करता है क्योंकि, तब उसके पास जनता के समक्ष सच लाने की बाध्यता होती है । किन्तु अगर चरित्रहनन या छवि बिगाड़ने के नाम पर इस पर अंकुश लगाया जाता है तो यह निरंकुशता को ही जन्म देगी । अर्थात सर्वोच्च पद भयमुक्त हो जाएँगे । मूलतः प्रेस स्वतंत्रता का अभिप्राय ऐसे वातावरण और परिस्थितियों के निर्माण और उनकी विद्यमानता से है, जिससे समाज और जनता के समक्ष उसे देश के प्रति जागरूक, अधिकार के प्रति सचेत और देश के विकास के लिए चिंतन को विकसित करता है । ।

तटस्थ और संतुलित दृष्टि से तो स्वतंत्रता व्यक्ति के जीवन की वह अवस्था है, जिसमे मनुष्य के जीवन पर न्यूनतम प्रतिबंध लगाये जाएं और मनुष्य को अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए अधिकतम सुविधायें प्राप्त हों । नियंत्रण और अनुशासन से मुक्ति प्राप्त कर लेने को भी हम स्वतंत्रता नहीं कह सकते, क्योंकि इससे एक व्यक्ति या कोई एक वर्ग दूसरे की स्वतंत्रता की बलि देकर स्वतंत्रता का उपभोग करने लगेगा । हकीकत तो यह है कि स्वतत्रता का अभिप्राय कभी भी उच्छृंखलता नहीं हो सकता देश हित में संयम की अपेक्षा हर अंग से अपेक्षित है । आरोपित अनुशासन की अपेक्षा आत्म अनुशासन युक्त स्वतंत्रता की आवश्यकता है जो स्वयं अंकुश काम कर सकती है ।

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