जिन्दगी से हार न मानकर इससे लड़ने की जिद खुद में पैदा करें : डॉ.श्वेता दीप्ति
<pre>जिन्दगी से हारते हम : डॉ.श्वेता दीप्ति
सितम्बर २०२० अंक। महामारी का त्रास, रोज मौत के आँकड़े को गिनने की बेबसी और उसके बीच समाचारों में आत्महत्या की छपती हुई खबर मन को विचलित करती है । पिछले दिनों भक्तपुर की घटना ने मन को हिला दिया । पत्नी और बेटे की निर्ममता से हत्या और उनके क्षतविक्षत शव के साथ चौबीस घंटे से अधिक गुजारने के बाद खुद भी मौत को गले लगाना । वजह जो सामने आई वह थी अत्यधिक कर्ज और उसे न चुका पाने की बेबसी और उससे होता घर में कलह या मानसिक विचलन ।
ऐसी कितनी ही घटनाएँ रोज घटित हो रही हैं । किस कदर इंसान हार चुका है और आखिर हारे भी क्यों नहीं । कुछ तो सकारात्मक दिखे जो जीने का हौसला प्रदान करे । हम उम्मीद अपने जन–प्रतिनिधि से करते हैं परन्तु अफसोस कि जनता के हाथ इस मामले में खाली हैं । जो भी हो, यह तो तय है कि महामारी के इस दौर में सरकार अपनी जनता को सुरक्षात्मक तसल्ली देने में असफल रही है । बेरोजगारी के दौर में जहाँ भूखों मरने की नौबत है वहाँ ब्याज–दर पर सरकारी रूप से कोई रियायत नहीं दी गई और न ही भूखे गरीबों को यह आश्वासन सरकार दे पाई कि वह उनके लिए कुछ उचित कदम उठाएगी । विदेशों से लौटते लोग, जो यहाँ सब कुछ गिरवी रख कर गए थे, खाली हाथ वापस आ रहे हैं और देश में न तो उद्योग है और न ही रोजगार । कितनी विवशता है जनता के समक्ष ऐसे में टूटता मनोबल मौत को अपनाने के लिए बाध्य हो रहा है ।
पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष ५,७५४ लोगों ने आत्महत्या की और इस लॉकडाउन की अवधि में दो हजार से अधिक लोगों ने निराशा में तो कभी सामाजिक अवहेलना के कारण मौत को गले लगा लिया है । कोरोना से मरने वाले से अधिक लोग त्रासदी का शिकार हो रहे हैं और सरकार खुले मंच से यह घोषणा कर रही है कि महामारी नहीं आती तो अब तक सारी परियोजनाएँ तैयार हो चुकी होती । सरकार पहले जिन्दगी बचा लीजिए फिर विकास के सपने भी दिखा दीजिएगा ।
मौत के इस दौर में भी नेताओं के सपने साकार हो रहे हैं और जनता अपने ही द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को चुपचाप निहार रही है । काश कि राष्ट्रवाद भूखों का निवाला भी बन पाता तो शायद इतनी बेबसी की मौत नहीं होती । हम भूल जाते हैं कि राष्ट्रवाद का दावा करने वाले इन प्रतिनिधियों के लिए वह दावा महज एक सीढ़ी है सफलता प्राप्त करने की और जनता सिर्फ उस सीढ़ी को थामने का जरिया मात्र । जनता ही जनार्दन है, आइए हम अपना मनोबल बढ़ाएँ और जिन्दगी से हार न मानकर इससे लड़ने की जिद खुद में पैदा करें ।सम्पादकीय</pre>

