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कहर कोरोना का, जो कहीँ दूर सा लगता था : डा.करुणा वन्त

 
प्रार्थना

कहर कोरोना का, जो कहीँ दूर सा लगता था
दबे पाँव न जाने कब, करीब वो आ गया
यत्न हमारे छल, वो चुपके से तुम्हें छू गया
अधुरी हमारी बातोँ मेँ,पूर्ण विराम लगा गया
उजाड़ घर की चौखट पे
आवाक् हम सबको छोड़ गया 
जीने की तुम्हारी ख्वाहिश को
निर्दयी यूँ ही दबोच गया
निष्प्राण तुम्हारी काया को अन्तिम बार
आलिङ्गन मे बाँधने से बँचित कर गया
हृदय मेरा झुल्सा
शीतल ना होने वाला इक ताप बो गया

जानता हुँ,
हैरान आँखो से,दूर–दूर तक तुमने हमेँ ढुँढा होगा
आवाज बिना की चीख से, कई बार पुकारा होगा
पास ना पाकर हमेँ, खुद को भी तुमने कोसा होगा
इसी वेदना मेँ ही तुमने, दम अपना तोड़ा होगा
भर जाता है हृदय मेरा
तुम्हारे ना होने के एहसास से
स्मृति तुम्हारी मन मेँ सँजो
लडूँगा मैं, इस विरान दिन रात से
प्रार्थना मेँ मेरे, तुम्हारे नाम का जाप है
इस कहरका शीघ्र अन्त्य हो
दोहराता हूँ मैँ, अब हर साँस मेँ
वक्त नही चाहिए मुझे, भूलाने को तुम्हेँ
याद ताजा तुम्हारी, शायद भर दे उर्जा मुझमेँ
साथ तुम्हारा बस इतना सा था
कोशिश हमारी तो पूरी थी
नहीँ है सबकुछ इन्सान के वश मेँ
है सिर्फ तो प्रार्थना अपनी
डा.करुणा वन्त, काठमाडौं
 

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