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विकास की गति पर अस्थिरता का साया : श्वेता दीप्ति

 

डॉ श्वेता दीप्ति, अंक जुलाई २०२४ (सम्पादकीय) हिमालिनी । नेपाल का अगर सबसे बड़ा दुर्भाग्य कुछ है तो वह यहाँ की अस्थिर सरकार । अस्थिरता विकास की हर संभावना को लील रहा है । सत्ता से बाहर कोई रहना नहीं चाहता । हर किसी को सत्ता की मलाई चाहिए । यही वजह है कि सभी दल अपनी–अपनी रोटी सेंकने की फिराक में लगे रहते हैं । वर्तमान में कांग्रेस सत्ता से बाहर है । सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी उसे जो धक्का मिला है, उससे उबरना उसके लिए मुश्किल हो रहा है । इसलिए एक बार फिर से राजनीति के गलियारे में यह चर्चा जोर–शोर से है कि, नेपाली कांग्रेस ने सत्ता में वापसी के लिए दोहरी बातचीत शुरू कर दी है । प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहाल ‘प्रचंड’ द्वारा फागुन २१ गते को सत्ता समीकरण बदलने के बाद विपक्ष में बैठी कांग्रेस एक बार फिर से सत्ता में वापसी की कोशिश करती नजर आ रही है ।

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स्रोत की मानें तो सत्ता में वापसी के लिए कांग्रेस सत्तारूढ़ माओवादी केन्द्र और सत्तारूढ़ पार्टी नेकपा एमाले दोनों के साथ बातचीत कर रही है । माना जा रहा है कि फिलहाल माओवादी और और एमाले के साथ विभिन्न स्तरों पर बातचीत हो रही है, लेकिन बातचीत को औपचारिक रूप नहीं दिया गया है । काँग्रेस अध्यक्ष देउबा को पुराने गठबंधन को पुनर्जीवित करने में महारथ हासिल है । इसी क्रम में हाल के दिनों में माओवादी केन्द्र के उप महासचिव जनार्दन शर्मा और कांग्रेस संसदीय दल के मुख्य सचेतक रमेश लेखक के बीच बातचीत हुई है परन्तु कुछ निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है ।
कांग्रेस के एक उच्च सूत्र का दावा है कि कांग्रेस नेता ज्ञानेंद्र कार्की समेत कुछ नेता एमाले नेताओं के साथ बातचीत कर रहे हैं । हालांकि, कांग्रेस की प्राथमिकता पुराने गठबंधन को पुनर्जीवित करने की है । सुप्रीम कोर्ट में लंबित उपेन्द्र यादव के नेतृत्व वाले जसपा–नेपाल विभाजन मामले पर कांग्रेस की पैनी नजर है । कांग्रेस का मानना है कि अगर अशोक राई द्वारा जसपा विभाजन को मान्यता नहीं दी गई तो राष्ट्रीय राजनीति एक नई राह पकड़ेगी ।

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अनुमान किया जा रहा है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने उपेन्द्र के पक्ष में फैसला दिया तो सरकार पलट जायेगी । कांग्रेस का मानना है कि माधव नेपाल और उपेन्द्र यादव उस जगह पहुंचेंगे जहां वे पुराने गठबंधन को पुनर्जीवित करना चाहते हैं । कांग्रेस के ८७, माओवादी के ३२, उपेन्द्र के १२ और माधव नेपाल के १० सांसद १४१ हो जाते हैं तो एकबार फिर प्रचंड पुरानी राह पर ही लौटेंगे ।
इस अर्थ में हम यह मानें कि प्रधानमंत्री का ध्यान लगातार अपनी कुर्सी को बचाने में लगा हुआ है । किन्तु २०८४ तक जानें कितने झटके लगने अभी बाकी हैं । यह अस्थिरता देश के लिए निःसन्देह घातक है । सत्ता में शामिल हर घटक, हर बड़ा चेहरा, किसी ना किसी आरोप में संलग्न है । उनकी अपनी कोशिश है कि वो बचे रहें और इसके लिए उनके पास पद और पावर का होना आवश्यक है । यह सबसे बड़ी वजह है कि कई चेहरे स्वयं को बचाने के लिए लगातार गठबन्धन में अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखना चाहते हैं । अपने फायदे के लिए कब कौन गठबन्धन में शामिल हो जाएगा या फिर कब कौन अपना हाथ खींच लेगा यह कहना कठिन है किन्तु देश और देश के विकास के लिए यह परिस्थिति निःसन्देह चिन्ताजनक है ।

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