अतीत का शोक नहीं, वर्तमान पर दृष्टि हो : श्वेता दीप्ति
डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय, हिमालिनी नवम्बर २०२३ अंक,
अतीत का शोक नहीं, वर्तमान पर दृष्टि हो
न ही कश्चित् विजानाति किं कस्य श्वो भविष्यति ।
अतः श्वः करणीयानि कुर्यादद्यैव बुद्धिमान् ।।
अर्थात् कल क्या होगा यह कोई नहीं जानता है, इसलिए कल के करने योग्य कार्य को आज कर लेने वाला ही बुद्धिमान है । किन्तु ऐसा होता नहीं है । अगर ऐसा होता तो विनाश की संभावना ही नहीं होती । हम कहते हैं कि प्रकृति ने कहर बरपाया है । परन्तु प्रकृति तो अपनी चाल से ही संचालित है, हम नादानी कर बैठते हैं । बावजूद इसके यह भी सच है कि समय के प्रवाह के आगे हम कुछ कर नहीं सकते । बढ़ती जनसंख्या, आधुनिकता का मोह, विकास की असीम चाह और धरती पर बढ़ता बोझ, बस यही तो कारक हैं तबाही के । प्रकति अपनी चाल चलती है और हम उसके निशाने पर आ जाते हैं ।

वैज्ञानिक अध्ययनों के मुताबिकÞ, पश्चिमी नेपाल की सतह के नीचे ५०० वर्षों से भूकंपीय ऊर्जा जमा हो रही है । विशेषज्ञों का कहना है कि यह शक्ति इतनी अधिक है कि इससे रिक्टर स्केल पर आठ या उससे भी अधिक तीव्रता वाला भूकंप आ सकता है । भूकंप निगरानी और अनुसंधान केंद्र के आंकड़ों से पता चलता है कि इस साल १ जनवरी से नेपाल में ४.० और उससे अधिक तीव्रता के १० भूकंप आ चुके हैं । इनमें से १३ भूकंप रिएक्टर स्केल ५ और ६ के बीच थी, जबकि तीन की तीव्रता ६.० से ऊपर रिकॉर्ड की गई थी । भारतीय और यूरेशिया की टेक्टॉनिक प्लेटों में लगातार टक्कर हो रही है, जिससे बहुत अधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है । नेपाल इन दोनों प्लेटों की सीमा पर है, जो भूकंप के मामले में अतिसक्रिय इलाकों में आता है । इसलिए नेपाल में भूंकप आना सामान्य बात है । हम प्रकृति के विरुद्ध नहीं जा सकते । इसकी अपनी तय गति है जिसे कोई विज्ञान नहीं रोक सकता है । हमरे वश में अगर कुछ है तो वह है सतर्कता अपनाना ।
तीन नवंबर को ६.४ की तीव्रता से आये भूकंप ने नेपाल में हजारों घरों, प्रतिष्ठानों होटलों सहित अन्य संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया है । भूकंप से जाजरकोट जिले में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है । यहां पर बने होटल और मकान सब मलबे में बदल गए हैं । बड़ी संख्या में जाजरकोट में लोग बेघर हो गए हैं । भूकंप का केंद्र जाजरकोट में जमीन के नीचे १० किलोमीटर की गहराई में था और तीव्रता ६.४ दर्ज की गई थी । इतना ही नहीं ३६ घंटे के अंदर नेपाल में फिर से भूकंप आया । पर इस बार अधिक क्षति नहीं हुई । किन्तु पहले भूंकप के बाद का मंजर बेहद भयावह है । कई इलाकों में दूर–दूर तक मलबा ही मलबा दिख रह रहा ।
अब अगर निगाहें कहीं टिकी हैं तो वह है सरकार की नीति । २०१५ के महा विनाशकारी भूकम्प में देश विदेश से मिली राहत की राशि और सामग्री के साथ जो बेईमानी हुई थी वह दुहराने की आवश्यकता नहीं है । गोदामों में अनाज सड़ गए थे और नेपाल भारत की सीमा पर राहत सामग्री से भरे ट्रकों की कतार महीनों सीमा सुरक्षा तथा टैक्स की नीतियों के कारण खडेÞ रह गए थे । उम्मीद करें कि इस बार ऐसा नहीं हो । राहत की आवश्यकता तत्काल होती है । महीनों बाद तो पीडि़त मुश्किलों के बीच एक बार फिर से संभल कर जीना सीख ही जाते हैं ।
नेपाल के दुर्गम क्षेत्र की जीवनशैली ऐसे ही बहुत दुरुह है । प्राकृतिक संरचना ऐसी है कि हर वर्ष कठिनाई का सामना करना पड़ता है । परन्तु सरकार की निगाहें वहाँ तक नहीं जाती । हाँ जब अनर्थ हो जाता है तो दिखावे के लिए उनकी तत्परता सामने आती है । परन्तु कहते हैं न कि ः
गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत् ।
वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः ।।
बीते हुए समय का शोक नहीं करना चाहिए और भविष्य के लिए परेशान नहीं होना चाहिए, बुद्धिमान तो वर्तमान में ही कार्य करते हैं । इस नीतिश्लोक पर अनुशरण करते हुए वर्तमान में आगे बढ़ें तो वह समस्त विश्व के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो सकता है ।

