लोक आस्था का महापर्व छठ : श्वेता दीप्ति
प्रकृति का संचारक सूर्य हमारी जीवन्त उपासना का केन्द्र है । इसी मान्यता को स्थापित करता है महापर्व छठ
डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय, हिमालिनी अंक नोवेम्बर 2021। वैदिक युग से भगवान सूर्य की उपासना का उल्लेख मिलता है । ऋग्वेद में सूर्य को स्थावर जंगम की आत्मा कहा जाता है । सूर्यात्मा जगत स्तस्थुषश्च ऋग्वेद १÷११५ वैदिक युग से अब तक सूर्य को जीवन स्वास्थ्य एवं शक्ति के देवता के रूप में मान्यता है । छान्दोग्य उपनिषद में सूर्य को ब्रह्म कहा गया है । आदित्यों ब्रह्मेती ।
पुराणों में द्वादश आदित्यों, सूर्य की अनेक कथाएँ प्रसिद्ध हैं, जिनमें उनका स्थान व महत्व वर्णित है । धारणा है, सूर्य संबधी कथाओं को सुनकर पाप एवं दुर्गति से मुक्ति प्राप्त होती है । एवं मनुष्य प्रकृति का संचारक सूर्य हमारी जीवन्त उपासना का केन्द्र है । इसी मान्यता को स्थापित करता है महापर्व छठका अभ्युत्थान होता है । हमारे ऋषियों ने उदय होते हुए सूर्य को ज्ञान रूप ईश्वर स्वीकारते हुए सूर्योपासना का निर्देश दिया है । सूर्य हमारी उर्जा का केन्द्र है ।
प्रकृति का संचारक सूर्य हमारी जीवन्त उपासना का केन्द्र है । इसी मान्यता को स्थापित करता है महापर्व छठ । सूर्य सभी तरह की ऊर्जा का स्रोत है, इसीलिए उसका स्तुति गान किया गया है, लेकिन उसे कभी परमेश्वर का दर्जा नहीं दिया गया । इसके अलावा वेदों में पांच तत्वों अग्नि, वायु, गगन, जल और धरती के महत्व और कार्य को कई तरह से दर्शाया गया है । धरती को तो माता की संज्ञा दी गई है । इस तरह मानव जीवन में प्रकृति और देवताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है ।
वे सभी ब्रह्मस्वरूप माने गए हैं, लेकिन ब्रह्म नहीं । लोक में सूर्य ऊर्जा का अक्षय स्त्रोत है । मूलतः प्रकृति पूजा की संस्कृति वाले इस देश में, सूर्य की पूजा किसी भी परम्परा से बहुत–बहुत पुरानी है । यह वैदिक काल से है । लेकिन शास्त्रीयता और पांडित्य को लोक अपनी शर्तो पर स्वीकार करता है और उसका मानवीकरण भी करता आया है । लोक मूलतः हमारा कृषि आधारित समाज ही है । छठ शुद्ध रूप से प्रकृति की पूजा का पर्व है । प्रकृति के प्रति कृतज्ञता दिखाने का अवसर, लेकिन किसी कर्मकांड की जरूरत नहीं है इस पूजा में । सूर्य की पूजा का मौका (जिन्हें एकमात्र ऐसा भगवान माना जाता है जो दिखते हैं) जलाशयों की महत्ता समझने–समझाने का त्योहार है । यह दुनिया का इकलौता अवसर है, जिसमें डूबते सूर्य को भी नमन किया जाता है । यह परंपरा इसे दूसरे पर्वों से अलग करती है । इससे समाज का यह दायित्व भी दिखता है कि जिस सूर्य ने हमें दिन भर तेज दिया, रोशनी दी, उसके निस्तेज होने पर भी हम उसे भूलते नहीं हैं ।
लोक उसे ही स्वीकार करता है जो उसके बीच का होता है, इसलिए हमने अपनी आस्था का भी मानवीकरण किया है । क्योंकि तब वह हमारे जैसा होता है हममें से होता है, यही सगुण भक्ति का स्वरूप है । शायद इसीलिए लोक ने सूर्य की शक्तियों और उसकी ऊर्जा का मानवीकरण छठ मैया के रूप में कर दिया हो । धर्म में तर्क के लिए जगह नहीं होती इसलिए छठ वह महापर्व है जिसे हम तर्क, आस्था और विश्वास की गहराई से स्वीकार करते हैं ।
छठ से पहले रौशनी का त्योहार दीपावली का हम स्वागत करते हैं । माँ लक्ष्मी की आराधना के साथ सभी की सुख समृद्धि की कामना करते हैं । ‘हिमालिनी’ जन–कल्याण की कामना के साथ अपने पाठक, विज्ञापनदाता और समस्त जन को अशेष शुभकामना व्यक्त करती है ।

सम्पादक, हिमालिनी ।

