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महिलाओं को मिले संवैधानिक अधिकार- नीति एक तरफ और नियति दूसरी तरफ :श्वेता दीप्ति

 

 

इस बार अन्तर्राष्ट्रीय नारी दिवस का थीम है, ‘एक स्थायी कल के लिए आज लैंगिक समानता जरूरी’ ।

डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय, हिमालिनी अंक मार्च ।इस बात में कोई शक नहीं एक महिला किसी से कम नहीं है । ऐसा कोई काम नहीं है जो आज की महिलाएं न कर पाएं । मगर आज भी कुछ लोगो की पिछड़ी सोच के कारण महिलाओं को कम आँका जाता है । महिलाएं समाज को सभ्य बनाने से लेकर देश के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं । आज महिलाओं ने खुद को हर क्षेत्र में साबित किया है । इसी उत्साह और जजबे को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में हर साल मनाया जाता है। इस दिन विश्व स्तर पर महिलाओं को उनके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों के बारे में बताया जाता है । इस दिन महिलाओं को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करने, उनका आत्मविश्वास जगाने एवं समाज में उत्कृष्ट कार्य करने वाली महिलाओं को सम्मानित कर उनका मनोबल बढ़ाया जाता है । आज बात करें नेपाल की महिलाओं को मिले संवैधानिक अधिकारों के विषय में ।

नेपाल के संविधान २०७२ ने महिलाओं को कई अधिकार प्रदान किए हैं । विशेष रूप से, संविधान के मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद ३८ के तहत, प्रत्येक महिला को लैंगिक भेदभाव के बिना समान वंशीय अधिकार, सुरक्षित मातृत्व और प्रजनन स्वास्थ्य सम्बन्धी अधिकार, महिला के विरुद्ध धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परम्परा, प्रचलन या किसी भी अन्य आधार में शारीरिक, मानसिक, यौनजन्य, मनोवैज्ञानिक या किसी भी प्रकार का हिंसाजन्य कार्य या शोषण न हो, और यदि ऐसा कार्य किया जाता है, तो यह कानून के अनुसार दंडनीय होगा और पीडि़त को कानून के अनुसार मुआवजा पाने का अधिकार होगा ।

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इतना ही नहीं राज्य के सभी निकायों में महिला को समानुपातिक समावेशी सिद्धान्त के आधार में सहभागी कराया जाएगा, महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा में सकारात्मक आधार पर विशेष अवसर प्रदान कराया जाएगा, तथा सम्पत्ति तथा पारिवारिक मामले में दम्पति को समानअधिकार की भी व्यवस्था है । संविधान के अनुच्छेद १८ में कहा गया है कि सभी नागरिक कानून के समक्ष समान होंगे और उनके साथ लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। इसी तरह अनुच्छेद २९ में कहा गया है कि किसी को भी बेचना, या गुलाम बनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है । शारीरिक, मानसिक, यौन, मनोवैज्ञानिक या किसी अन्य प्रकार की हिंसा या शोषण की अनुमति नहीं दी जाएगी ।

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किन्तु यथार्थ की भूमि कुछ और है । नीति एक तरफ और नियति दूसरी तरफ । वास्तविकता में आज भी राजनीति, सामाजिक गतिविधियों, सिविल सेवा, पुलिस और सेना में महिलाओं की भागीदारी कम है । आंकड़ों पर नजर डालें तो महिलाओं की स्थिति आज भी दयनीय है । हालांकि आँकड़े के हिसाब से महिलाएँ पुरुषों से अधिक हैं , बावजूद इसके वह हर क्षेत्र में पीछे हैं । वर्तमान में महिलाओं की साक्षरता दर ७७.४ प्रतिशत है । आधी से अधिक आबादी होने के बावजूद विधानमंडल–संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व असंतोषजनक है । जो हैं उनकी भूमिका भी नाममात्र की है । यह असक्षमता महिलाओं की भी है और व्यवस्था की भी है । अर्थव्यवस्था में महिलाओं की गिनती नहीं होती है । भूमि का स्वामित्व उनके पास बहुत कम है । गृहिणी की भूमिका का कोई अर्थ नहीं है । सामाजिक अवस्था में आज भी बलात्कार, डायन, दहेज की शिकार महिलाओं की संख्या में कोई कमी नहीं हुई है बल्कि बढ़ती ही जा रही है । इस कटु वास्तविकता से हम अनभिज्ञ नहीं हैं बावजूद इसके किसी भी सार्थक कदम का परिचालन सरकार, समाज या परिवार के द्वारा नहीं हो रहा है । सुधार का आँकड़ा इतना नहीं है कि हम यह कहें कि देश की आधी से आबादी तुष्ट या खुश है । इस बार अन्तर्राष्ट्रीय नारी दिवस का थीम है, ‘एक स्थायी कल के लिए आज लैंगिक समानता जरूरी’ ।

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आइए इसे यथार्थ में बदलने की कोशिश करें और देश, समाज एवं परिवार में महिलाओं की स्थिति को मजबूती प्रदान करें । जिएँ और जीने दें, देवी की दरकार नहीं है, इंसान मान लें तो उन्हें साँसें मिल जाएँगी । वो उन्मुक्त आकाश मिल जाएगा जहाँ उनके सपने भी परवाज भर सकेंगे । उन्हें सृष्टि की सच्चाई पर यकीन आ जाएगा जहाँ यह कहा गया है कि स्त्री ही सृष्टि है ।

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