हम मानव से पशु कब बन गये पता ही ना चला : डा. श्वेता दीप्ति

सम्पादकीय, हिमालिनी अंक अगस्त २०१८ | सदियों लगा हमें आदिम आदिवासी जीवन को त्याग कर सभ्य होने में, पर क्या हम इसे संभाल पा रहे हैं ? प्रकृति का विनाश कर के सभ्य कहलाने वाली हमारी पीढ़ी, अपनी नैतिकता और मानवता का भी विनाश करती जा रही है । हरे भरे जंगलों में रहने वाली वस्त्रविहीन हमारी संस्कृति आज कंकरीट के जंगलों में वस्त्रविहीन आत्मा को लेकर जी रही है । शरीर ढके हुए हैं पर हमारी आत्मा नग्न है । क्योंकि, सभ्यता का अर्थ आवरण को ढकना नहीं अपने अन्दर संवेदनाओं को जिन्दा रखना है । किन्तु मानव सभ्यता के विकास में हम मानव से पशु कब बन गये पता ही ना चला । संवेदनहीन समाज में इंसान एक मशीन बन कर रह गया है, जो जीने की आपाधापी में नैतिक मूल्यों की ही बलि चढ़ा रहा है और खुद को जिन्दा बता रहा है । बलात्कार की रोज एक ऐसी घटना हमारी निगाहो से गुजरती है जो क्षणिक ही सही हमें सिहराती जरुर है, पर वह घटना भी अन्य घटनाओं की तरह सिर्फ एक समाचार बन कर हमारे लिए रह जाता है । जबकि भयानक सच यह है कि बलात्कार और बलात्कारी तलवार की वह नोक है जो हर घर की, हर बेटियों पर लटकी हुई है । खौफजदा हैं हम, पर मौन हैं । क्योंकि यह दर्द सिर्फ भोगने वाले परिवार का बन कर रह जाता है । जिस दिन यह दर्द सबका हो जाएगा कोई ना कोई हल जरुर निकलेगा ।
देश ने जब सर्वोच्च और गरिमामय पद पर एक नारी को स्थान दिया था तो समस्त नारी जाति ने गौरव का अनुभव किया था । किन्तु यह पद सिर्फ पद बन कर रह गया । हर रोज नारी हैवानियत की शिकार हो रही है, किन्तु यह पद मूक दर्शक बना हुआ है, संवेदनहीन तटस्थ ।
जहाँ तक देश की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों का सवाल है, तो यहाँ सब कुछ यथावत है । सत्ता को टिकाए रहने के लिए मंत्रालयों का विघटन कर, प्रसाद वितरण किया जा रहा है । न्यायालय राजनीतिक गलियारों के कदमों पर पड़ी है । डा केसी के साथ कागजी समझौते विगत की ही तरह कार्यान्वयन की प्रतीक्षा में है और आम जनता अपने घरों में मंहगाई के दानव से जूझती हुई सरकार को कर देकर सामथ्र्यवान बना रही है । जय जनता जनार्दन ।
११वां विश्व हिंदी सम्मेलन भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा मारीशस सरकार के सहयोग से १८-२० अगस्त २०१८ को मारीशस में सम्पन्न हुआ है । ११वें विश्व हिंदी सम्मेलन को मारीशस में आयोजित करने का निर्णय सितंबर २०१५ में भारत के भोपाल शहर में आयोजित १०वें विश्व हिंदी सम्मेलन में लिया गया था । सम्मेलन का मुख्य विषय “हिंदी विश्व और भारतीय संस्कृति“ है । हिन्दी की यह विश्व यात्रा जारी रहे और सिर्फ सम्मेलनों की औपचारिकता में न सिमट कर सही मायनों में विश्व पटल के साथ ही अपनी धरती, अपने ही लोगों के बीच उनकी जुबान की भाषा, आदर और सम्मान की भाषा बने ।

