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जीवन का उद्देश्य है “सार्थकता” यह तभी मिलेगा जब हम सुकर्म करेंगे : श्वेता दीप्ति

 

‘बड़े भाग मानुष तन पावा’

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ।।

सम्पादकीय, हिमालिनी  अंक फरवरी 2020,अर्थात् कोई भी काम कड़ी मेहनत से ही पूरा होता है, सिर्फ सोचने भर से नहींं । कभी भी सोते हुए शेर के मुंह में हिरण खुद नहीं आ जाता । यानि कर्म ही सर्वोपरि है । बिना कर्म के फल की इच्छा बेअर्थ है । एक कटु सत्य यह भी है कि जब भी आप कोई नई पहल करते हैं या नया कदम उठाते हैं तो जहाँ सराहना मिलती है वहीं उसकी आलोचना करने वाले भी कम नहीं होते । किन्तु आलोचना के डर से कर्म से विमुक्त नहीं हुआ जा सकता है । गीता में भी यही कहा गया है कि ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ।।’ अर्थात् तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं । इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो ।।

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किन्तु अक्सर यह होता है कि हम यह सोचकर बढ़े हुए कदम खुद पीछे कर लेते हैं कि लोग क्या कहेंगे, समाज क्या कहेगा । हम यह नहीं सोचते कि कहने वाले उन्हीं के लिए अच्छा या बुरा कहते हैं जो कार्यरत होते हैं । निष्क्रिय व्यक्ति या निष्क्रियता के लिए कुछ नहीं कहा जाता है । बहुत पुरानी एक कहावत है लीक लीक तीनों चले कायर, कुटिल, कपूत । लीक छोड़ तीनों चले शायर, सिंह सपूत ।

बात पते की है, बस इसका सदुपयोग करने की आवश्यकता है । वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति कर्मशील होता है क्योंकि शारीरिक क्रिया कर्म के अन्तर्गत ही आता है । परन्तु जब हम यह कहते हैं कि ‘हम यह काम कर रहे हैं’ तो वह कर्म होता है, जो कभी तो ‘संचित कर्म’ होता है अर्थात पूर्व जन्म के आधार पर, कभी ‘प्रारब्ध कर्म’ होता है अर्थात संचित कर्म के फलस्वरूप जो हमें प्राप्त होता है और तीसरा जो सबसे महत्तवपूर्ण है—वह है ‘क्रियमाण कर्म’ जिसका तात्पर्य वर्तमान में किए जाने वाले कर्म से है । वही निर्धारित करता है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं । यह पूरी तरह हम पर निर्भर है, इसे प्रारब्ध नहीं रोक सकता हाँ भाग्य का साथ अंशतः अवश्य मिलता है, तभी हम कहते हैं कि मेहनत के साथ–साथ भाग्य का साथ भी चाहिए ।

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किन्तु सिर्फ भाग्य के सहारे कुछ हासिल नहीं होता । तुलसीदास ने भी कहा है, ‘बड़े भाग मानुष तन पावा । सुर दुर्लभ सद् ग्रन्थन्हि गावा ।।’ भाग्य से यह मनुष्य जन्म मिलता है जो कि देवताओं को भी दुर्लभ है । इस मनुष्य जीवन को सार्थक कर सकें, यहीं इस जीवन का उद्देश्य है और सार्थकता तभी मिलेगा जब हम सुकर्म करें । यही मोक्ष की प्राप्ति में सहायक बनता है । कहने का तात्पर्य यह है कि हर नई कोशिश, हर नई पहल पर बाधाएँ आएँगी किन्तु उससे जूझना और स्वयं को स्थापित करना ही हमारी जिद होनी चाहिए और लक्ष्य तक पहुँचने का जुनून भी क्योंकि, सफलता प्राप्ति का यही मूलमंत्र है जिसे अपने जीवन में सकारात्मक रूप से उतारना ही मानव–जीवन को सार्थक कर सकता है ।

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