विकास की होड़ में प्राकृतिक संपदा के साथ खिलवाड़ : श्वेता दीप्ति
तिब्बत में आया भूकम्प चीन के कारण तो नहीं ?
डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय हिमालिनी अंक जनवरी 025 । प्राकृतिक आपदा हमेशा प्रकृति की वजह से नहीं होता है यह तो तय हो चुका है । विकास करने की होड़ में विश्व इस कदर प्राकृतिक संपदा के साथ खिलवाड़ कर रहा है कि हर रोज उसका खामियाजा मानव जाति भुगत रही है । भूकंप को कुदरत का कहर यानी नेचुरल डिजास्टर कहा जाता है, लेकिन तिब्बत में आए भूकंप का कारण विशेषज्ञ चीन को मान रहे हैं । पहाड़ों के लगातार विस्तार करने पर अगर कोई अड़ंगा लगाता है तो इससे एक बड़ी आपदा आने का खतरा बन जाता है । इसीलिए कई बड़े देश प्रकृति के ज्यादा विपरीत नहीं जाते हैं । लेकिन, चीन अपने विकास का ढोल पीटने के लिए इन क्षेत्रों को भी नहीं छोड़ रहा है ।
तिब्बत में आए भूकम्प को भारत समेत ५ देशों ने महसूस किया जिसमें नेपाल भी शामिल है । हालांकि नेपाल, भारत तथा अन्य देशों में जानमाल की हानि नहीं हुई है किन्तु तिब्बत तबाह हो गया । तिब्बत में तबाही मचाने वाले भूकंप पर चीन ने कहा कि ये १० किमी की गहराई पर आया और इसकी तीव्रता ६.८ दर्ज की गई । लेकिन इसी बीच, यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे ने रिक्टर पैमाने पर भूकंप की तीव्रता ७.१ बताई । प्राकृतिक आपदा की ताकत के बारे में ६.८ तीव्रता का भूकंप ‘मजबूत’ माना जाता है । इस आधार पर इस भूकम्प की भयावहता का अंदाजा लगा सकते हैं ।
चीन तिब्बत में त्सांगपो नदी पर दुनिया का ‘सबसे बड़ा बांध’ बनाने की योजना बना रहा है । जो कि भूगर्भीय रूप से अत्यधिक संवेदनशील है । चीन पहले ही इस क्षेत्र में छह बड़े डैम बना चुका है, जिनमें से कई भूकंप संभावित इलाकों में स्थित हैं । इन डैम परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर खुदाई और निर्माण कार्य किया जाता है, जिससे हिमालयी क्षेत्र की भंगुर भूगर्भीय संरचना और कमजोर हो जाती है ।
इस क्षेत्र की भूगर्भीय बनावट और इस पर बने बुनियादी ढांचे के कारण तिब्बती क्षेत्र में इस तरह की आपदाओं का खतरा बना रहता है । तिब्बत और हिमालयी क्षेत्र भूगर्भीय रूप से सक्रिय हैं, क्योंकि यह क्षेत्र अभी भी भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों के टकराव से बन रहा है । इस टकराव के चलते हिमालय हर साल बढ़ रहा है । ऐसे क्षेत्र में भारी डैम निर्माण प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूस्खलन और भूकंप की संभावनाओं को बढ़ा देता है । परेचू झील में हुआ भूस्खलन इस खतरे का प्रमुख उदाहरण है । भूस्खलन के कारण नदी पर एक आर्टिफिशियल डैम बना, जिससे झील का पानी विशाल आकार में जमा हो गया । बाद में जब यह झील टूटी, तो इसके पानी ने तबाही मचा दी ।
तिब्बत में १९५० से अब तक ६ या उससे अधिक तीव्रता वाले २१ भूकंप आ चुके हैं । इनमें १९५० का असम–तिब्बत भूकंप, १९९७ का मानी भूकंप और २००८ का डमजुंग भूकंप प्रमुख हैं । इसके बावजूद चीन का डैम निर्माण जारी रखना न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए नेपाल, भारत के लिए भी खतरा बन रहा है । डैम निर्माण क्लाइमेट एक्सचेंज को भी बढ़ावा देते हैं । डैम के पानी में मिथेन गैस बनाने वाले माइक्रोब्स पनपते हैं । इसके अलावा, यह नदियों के प्रवाह को भी बाधित करता है । तिब्बत जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र में यह प्रभाव और भी विनाशकारी हो सकता है ।
तिब्बत का भूकंप का केंद्र माउंट एवरेस्ट से लगभग ८० किलोमीटर (५० मील) उत्तर में था, जो दुनिया का सबसे ऊंचा पर्वत है । १९५० से अब तक ल्हासा ब्लॉक में ६ या उससे अधिक तीव्रता के २१ भूकंप आ चुके हैं, जिनमें से सबसे बड़ा भूकंप २०१७ में मेनलिंग में आया ६.९ तीव्रता का भूकंप था । २०१५ में नेपाल की राजधानी काठमांडू के पास ७.८ तीव्रता का भूकंप आया था, जिसमें देश के अब तक के सबसे भयानक भूकंप में लगभग ९,००० लोग मारे गए थे और हजÞारों लोग घायल हुए थे । मृतकों में माउंट एवरेस्ट बेस कैंप में हिमस्खलन की चपेट में आने से कम से कम १८ लोग मारे गए थे ।
मेनलिंग तिब्बत की यारलुंग जांगबो नदी के निचले इलाकों में स्थित है, जहां चीन दुनिया का सबसे बड़ा जलविद्युत बांध बनाने की योजना बना रहा है । यह परियोजना भविष्य में खतरनाक साबित हो सकती है जिस पर ध्यान देना आवश्यक है ।

सम्पादक, हिमालिनी

