संघर्ष जीवन का तप है और अध्यात्म उसकी दिव्य ज्योति : बिमल सर्राफ

बिमल सर्राफ, रक्सौल पूर्वी चंपारण । मनुष्य का जीवन केवल सांसों का क्रम नहीं, बल्कि आत्मा की निरंतर चलने वाली साधना है। जन्म से लेकर अंतिम श्वास तक प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के संघर्ष से गुजरता है। कोई आर्थिक कठिनाइयों से जूझता है, कोई पारिवारिक समस्याओं से, कोई सामाजिक उपेक्षा से, तो कोई मानसिक अशांति से। यदि गहराई से देखा जाए तो संघर्ष ही जीवन का स्वाभाविक स्वरूप है। जिस जीवन में संघर्ष नहीं, उसमें न अनुभव है, न परिपक्वता और न ही आत्मविकास।
आज का युग विज्ञान, तकनीक और भौतिक समृद्धि का युग है। मनुष्य ने आकाश की ऊँचाइयों को छुआ है, समुद्र की गहराइयों को नापा है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक का निर्माण कर लिया है। लेकिन एक प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है—क्या मनुष्य ने स्वयं को जान लिया है? क्या उसने अपने मन की अशांति, भय, ईर्ष्या, असंतोष और अकेलेपन पर विजय प्राप्त कर ली है? यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो इसका अर्थ है कि बाहरी प्रगति के साथ-साथ आंतरिक विकास की भी आवश्यकता है। यही आंतरिक विकास अध्यात्म है।
आज अधिकांश लोग सफलता को धन, पद, प्रतिष्ठा और भौतिक सुविधाओं से मापते हैं। किंतु इतिहास साक्षी है कि इन सबके होते हुए भी अनेक लोग भीतर से टूटे हुए, असंतुष्ट और अशांत रहे। दूसरी ओर ऐसे अनेक महापुरुष हुए जिनके पास भौतिक साधन सीमित थे, फिर भी वे आत्मिक रूप से समृद्ध थे। इसका कारण केवल एक था—उन्होंने संघर्ष को स्वीकार किया और अध्यात्म को जीवन का आधार बनाया।
संघर्ष कभी भी मनुष्य का शत्रु नहीं होता। वह तो एक कठोर शिक्षक है, जो हमें हमारी वास्तविक क्षमता से परिचित कराता है। जब जीवन में सब कुछ अनुकूल होता है, तब व्यक्ति अपने भीतर छिपी शक्ति को पहचान नहीं पाता। लेकिन विपरीत परिस्थितियाँ उसके साहस, धैर्य, विवेक और विश्वास की परीक्षा लेती हैं। यही कारण है कि महान व्यक्तित्व सुख-सुविधाओं की गोद में नहीं, बल्कि संघर्षों की भट्ठी में तैयार होते हैं।
प्रकृति का प्रत्येक दृश्य हमें यही संदेश देता है। बीज मिट्टी का अंधकार सहकर ही वृक्ष बनता है। नदी पर्वतों से टकराकर ही अपना मार्ग बनाती है। बादलों के गर्जन और वर्षा के बाद ही धरती हरियाली से भरती है। स्वर्ण अग्नि में तपकर कुंदन बनता है और हीरा अनगिनत वर्षों तक धरती के दबाव को सहकर ही चमकता है। जब प्रकृति का प्रत्येक श्रेष्ठ रूप संघर्ष से निखरता है, तो मनुष्य भी संघर्ष के बिना महान कैसे बन सकता है?
दुर्भाग्य से आज का समाज संघर्ष से बचने की मानसिकता विकसित कर रहा है। छोटी-सी असफलता भी अनेक लोगों को निराशा और अवसाद की ओर ले जाती है। इसका मुख्य कारण यह है कि हमने आत्मबल की अपेक्षा बाहरी साधनों पर अधिक भरोसा करना सीख लिया है। जैसे ही परिस्थितियाँ बदलती हैं, मनुष्य का आत्मविश्वास डगमगाने लगता है। ऐसे समय में अध्यात्म ही वह शक्ति है, जो मनुष्य को भीतर से संभालती है।
यह समझना आवश्यक है कि अध्यात्म का अर्थ संसार का त्याग करना नहीं है। सच्चा अध्यात्म जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जीवन को सही दृष्टि से जीने की कला है। यह कर्म से विमुख नहीं करता, बल्कि कर्म को और अधिक पवित्र बनाता है। यह मनुष्य को आलसी नहीं, बल्कि उत्तरदायी बनाता है। अध्यात्म हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, हमारा कर्तव्य, हमारा चरित्र और हमारी सत्यनिष्ठा कभी नहीं बदलनी चाहिए।
जब मनुष्य अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वर की उपासना समझकर करता है, तब उसका कार्य साधारण नहीं रहता, बल्कि साधना बन जाता है। यही कारण है कि भारतीय दर्शन में कर्मयोग को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। निष्काम कर्म, समभाव और ईश्वर में अटूट विश्वास ही वह शक्ति है, जो संघर्ष को अवसर में बदल देती है।
आज परिवारों में बढ़ती दूरियाँ, समाज में बढ़ती कटुता, युवाओं में बढ़ता तनाव, प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ और नैतिक मूल्यों का क्षरण हमें यह संकेत दे रहा है कि केवल आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं है। यदि मनुष्य के भीतर करुणा, संयम, सेवा, क्षमा, सत्य और संतोष का विकास नहीं होगा, तो समाज की बाहरी चमक भी स्थायी सुख नहीं दे पाएगी। अध्यात्म इन्हीं मानवीय मूल्यों को पुनर्जीवित करने का माध्यम है।
महात्मा बुद्ध ने दुःख को जीवन का सत्य माना, लेकिन उसके समाधान का मार्ग भी बताया। स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को निर्भय होकर संघर्ष करने का संदेश दिया। महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा को अध्यात्म का व्यवहारिक स्वरूप बनाया। इन सभी महापुरुषों के जीवन का सार यही था कि बाहरी परिस्थितियाँ चाहे जितनी कठिन हों, यदि मनुष्य का अंतर्मन जागृत है तो कोई भी शक्ति उसे पराजित नहीं कर सकती।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों को केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि धैर्य भी सिखाएँ; केवल सफलता नहीं, बल्कि संस्कार भी दें; केवल अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्य भी समझाएँ; केवल आधुनिकता नहीं, बल्कि आध्यात्मिकता का भी परिचय कराएँ। क्योंकि चरित्रहीन सफलता अंततः विनाश का कारण बनती है, जबकि संस्कारयुक्त संघर्ष स्थायी सफलता का आधार बनता है।
हमें प्रतिदिन कुछ समय आत्मचिंतन, प्रार्थना, ध्यान, सत्साहित्य के अध्ययन और सेवा के कार्यों के लिए निकालना चाहिए। जब मनुष्य स्वयं को जानने का प्रयास करता है, तब उसे यह अनुभव होता है कि वास्तविक शांति बाहर नहीं, उसके अपने अंतर्मन में विद्यमान है। यही अनुभव अध्यात्म की पहली सीढ़ी है।
जीवन में कठिनाइयाँ आएँगी, लोग आलोचना करेंगे, परिस्थितियाँ बदलेंगी और समय अनेक परीक्षाएँ लेगा। किंतु यदि हमारा विश्वास अडिग है, हमारे कर्म पवित्र हैं और हमारा मन अध्यात्म के प्रकाश से आलोकित है, तो कोई भी संघर्ष हमें पराजित नहीं कर सकता। संघर्ष तब बोझ नहीं रहता, बल्कि आत्मनिर्माण का अवसर बन जाता है।
अंततः यही सत्य है कि संघर्ष जीवन की अग्निपरीक्षा है और अध्यात्म उसका अमृत है। संघर्ष मनुष्य को मजबूत बनाता है, जबकि अध्यात्म उसे महान बनाता है। जो व्यक्ति इन दोनों का संतुलन स्थापित कर लेता है, वही जीवन की वास्तविक सफलता, शांति और आनंद का अधिकारी बनता है। संसार में सबसे बड़ी विजय दूसरों पर नहीं, बल्कि स्वयं पर विजय प्राप्त करना है। यही सच्चा अध्यात्म है, यही जीवन का परम संघर्ष है और यही मनुष्य होने का सर्वोच्च सौभाग्य है।


