कैसी पुनर्स्थापना, कैसा पुनर्निर्माण ? राकेश मिश्रा ने नेपाल की विकास नीतियों पर उठाए गंभीर सवाल
जनकपुरधाम, २ सितंबर। राकेश मिश्रा ने अपने हालिया वक्तव्य में नेपाल में आपदा के बाद राहत कार्यों में दिख रहे बचकानेपन और जल्दबाजी में डोनर कॉन्फ्रेंस या पुनर्निर्माण की तरफ भागने की प्रवृत्ति पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने वर्तमान वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले और राष्ट्रीय योजना आयोग (NPC) की पुरानी नीतियों पर सवाल खड़े करते हुए ‘पुनर्निर्माण से पहले पुनरावलोकन’ की मांग की है।
राकेश मिश्रा के वक्तव्य के मुख्य बिंदु:
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राहत और पुनर्निर्माण में जल्दबाजी: काठमांडू-केंद्रित और विदेशी सहायता पर निर्भर रहने वाले कुछ नेता और विशेषज्ञ बिना जरूरत और प्राथमिकता तय किए पुनर्निर्माण के लिए अति-उत्साहित हैं। मीडिया ने भी इस जल्दबाजी पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है।
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रसुवागढ़ी की भौगोलिक संवेदनशीलता: रसुवागढ़ी नेपाल-तिब्बत का पुराना व्यापारिक मार्ग जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह आधुनिक ट्रेड कॉरिडोर, हाइड्रोपावर, ट्रांसमिशन लाइन, रेलवे और भारी बस्तियों के लिए उपयुक्त है। 2018 में टिमुरे और रसुवागढ़ी हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में हुए भूस्खलन और मौतों से यह पहले ही साबित हो चुका था कि यह क्षेत्र कितना जोखिम भरा है।
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योजनाकारों (प्लानर्स) पर सीधा सवाल: 2014-2018 के महत्वपूर्ण दौर में जब स्वर्णिम वाग्ले NPC के सदस्य और उपाध्यक्ष थे, तब बुनियादी ढांचे की योजना बनाते समय केवल ‘आर्थिक लाभ’ और ‘भू-राजनीतिक कनेक्टिविटी’ को देखा गया। उस दौरान संचयी आपदा जोखिम और ‘भौगोलिक वहन क्षमता’ (Geological carrying capacity) को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया।
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चीन का रणनीतिक हित और नेपाल की चूक: तातोपानी नाका कमजोर होने के बाद चीन ने केरुंग की तरफ अपना इन्फ्रास्ट्रक्चर बढ़ाया और रसुवागढ़ी को वैकल्पिक मार्ग के रूप में तेजी से विकसित किया गया। चीन ने अपना हित देखा जो कि स्वाभाविक है, लेकिन नेपाल ने अपने भूगोल और नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी।
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भविष्य के लिए चेतावनी: पुरानी टूटी हुई संरचनाओं को ज्यों का त्यों दोबारा खड़ा कर देना पुनर्निर्माण नहीं है। इसके लिए एक स्वतंत्र भूवैज्ञानिक, जलवैज्ञानिक और आपदा-जोखिम मूल्यांकन (Review) होना चाहिए। यह तय होना चाहिए कि कहाँ निर्माण बिल्कुल नहीं करना है और किन बस्तियों का पुनर्वास करना है।
विकास के नाम पर हिमालय के साथ ज़िद करने का समय अब खत्म हो चुका है। अब पहाड़ों की क्षमता को समझकर ही विकास की रूपरेखा तय की जानी चाहिए, अन्यथा आज का पुनर्निर्माण कल की नई और भीषण आपदा का ब्लूप्रिंट मात्र बनकर रह जाएगा।


