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दीवार और बाड़ (लघुकथा) : विनोदकुमार विमल

 

विनोदकुमार विमल, 2 अगस्त, काठमांडू । रमेश और रहीम आमने – सामने के घरों में रहते थे । उनके बीच एक पुरानी ‘चौतरी’ (पत्थर का चबूतरा) थी, जहाँ दोनों परिवारों के बच्चे साथ खेलते थे और त्योहारों के समय दोनों परिवार वहाँ बैठकर एक – दूसरे के साथ अपनी खुशियाँ और दुख बाँटते थे । बरसों से वे सिर्फ़ पड़ोसी ही नहीं, बल्कि एक परिवार की तरह थे ।

एक दिन शहर में सांप्रदायिक तनाव फैल गया । गुस्से और अविश्वास की हवा गाँव तक भी पहुँच गई । बाहर से आ रही अफ़वाहों को सुनकर रमेश और रहीम एक – दूसरे पर शक करने लगे । उन्होंने अपने बच्चों को एक साथ खेलने से रोक दिया ।
अगले ही दिन, रमेश ने अपने आँगन के सामने ईंटों की एक ऊँची दीवार बनानी शुरू कर दी । गुस्से में आकर रहीम ने भी अपनी तरफ़ दीवार बनानी शुरू कर दी । दो दिनों के भीतर ही, वह पुरानी चौपाल दो हिस्सों में बँट गई और उनके बीच एक भद्दी दीवार खड़ी हो गई । बरसों की दोस्ती की गर्माहट अचानक खत्म हो गई और वह रेगिस्तान की तरह बंजर हो गई ।

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कुछ हफ़्तों बाद, गाँव में ज़बरदस्त बाढ़ आ गई । रात के समय पानी का बहाव इतना तेज़ हो गया कि रमेश के घर का एक हिस्सा ढहने लगा । रमेश और उसका परिवार अपनी जान बचाने के लिए चिल्लाने लगे, लेकिन एक ऊँची दीवार ने रास्ता रोक दिया, जिससे किसी का भी अंदर आना नामुमकिन हो गया ।

तभी रहीम ने दीवार के दूसरी तरफ से किसी के चिल्लाने की आवाज़ सुनी । बिना एक पल की भी देरी किए, उसने एक बड़ा हथौड़ा उठाया और उस दीवार को गिराना शुरू कर दिया जिसे उसने कुछ ही समय पहले अपने हाथों से बनाया था । हाथों में छाले पड़ जाने के बावजूद वह रुका नहीं । जैसे ही दीवार गिरी, रहीम और उसके बेटों ने रमेश के परिवार को सुरक्षित अपने घर में पहुँचाया ।

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सुबह तक बाढ़ का पानी कुछ कम हो गया था । पछतावे के आँसू बहाते हुए, रमेश ने रहीम का हाथ पकड़ा और कहा, “मुझे माफ़ कर दो, रहीम; मैंने अविश्वास की दीवार खड़ी की थी, लेकिन तुमने इंसानियत की भावना को बनाए रखा ।”

रहीम ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “रमेश भाई, दीवार भले ही घरों को अलग कर दे, लेकिन वह एक ही धरती पर रहने वाले लोगों के दिलों या उनके खून के रंग को अलग नहीं कर सकती ।”

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उस दिन से उनके बीच की दीवार हमेशा के लिए खत्म हो गई और ‘चौतरी’ फिर से वैसी ही हो गई, जैसी पहले हुआ करती थी ।

विनोदकुमार विमल

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