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योग: हमें आत्म–नियंत्रण और अनुशासन सिखाता है : श्वेता दीप्ति

 

डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय हिमलिनी अंक जून 025 । हर साल २१ जून को पूरी दुनिया में योग दिवस मनाया जाता है । जिसका उद्देश्य लोगों को योग के महत्व के प्रति जागरूक करना है । योग का मतलब सिर्फ शारीरिक व्यायाम ही नहीं है बल्कि आंतरिक रूप से भी अपने आप को मजबूत करना है ।

‘योगः कर्मसु कौशलम्’ यह श्लोकांश योगेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीमुख से उद्गीरित श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के पचासवें श्लोक से उद्धृत है । श्लोक इस प्रकार है –
“बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ।।”

श्लोक के उत्तरार्ध पर यदि गौर करें तो दो बातें स्पष्ट होती हैं । पहली योग की परिभाषा एवं दूसरी योग हेतु प्रभु का स्पष्ट निर्देश । उनका उपदेश है कि ‘योगाय’ अर्थात् योग के लिए अथवा योग में, ‘युज्यस्व’ अर्थात् लग जाओ । कहने का तात्पर्य है कि ‘योग में प्रवृत्त हो जाओ’ यानि कि ‘योग करो’ ।

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इसी तरह भगवद गीता में कहा गया है ‘समत्वं योग उच्यते’ जिसका अर्थ है समभाव ही योग है । यानी सभी स्थितियों में संतुलन और शांति बनाए रखना ही योग का सार है । वास्तव में योग जब जीवन में उतरता है, तो जीव पर सुख–दुख अपना नकारात्मक प्रभाव नहीं डाल पाते । इसलिए कहा गया है कि योग करने का नहीं, बल्कि जीने का नाम है । हमारे ऋषियों ने जीवन को धैर्य और संयम युक्त बनाने के लिए योग को प्रमुख माध्यम बनाया था । वर्तमान समय में संपूर्ण मानवता की रक्षा के लिये धैर्य, संयम और करुणा जैसे दिव्य आभूषणों की ही आवश्यकता है, जो केवल योगमय जीवन पद्धति में निहित हैं ।

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वर्तमान समय में पृथ्वी पर बढ़ते प्रदूषण, प्रदूषित होते वायु, जल और बढ़ते वैश्विक तापमान की समस्याओं का समाधान केवल प्रकृतिमय जीवन पद्धति और सतत एवं सुरक्षित विकास में निहित है । यह संदेश योग के माध्यम से जीवन में आता है । प्रभु श्रीराम, श्रीकृष्ण, योगी शिव, भगवान महावीर, भगवान बुद्ध, गुरु नानक देव सभी ने प्रकृति संरक्षण का दिव्य संदेश दिया । बताया कि योग को आत्मसात कर ही हम प्रकृतिमय जीवन जी सकते हैं । योग असीम ऊर्जा और उत्साह का संचार कर हमारी व्यवहारकुशलता व कार्यक्षमता को बढ़ाता है । इसीलिए गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहते हैं, ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ ।
योग का उद्देश्य हमारे जीवन का सम्पूर्ण विकास करना है, इसे ऐसे कह सकते है कि जीवन का सर्वांगीण विकास करना । सर्वांगीण विकास से तात्पर्य यहां शारीरिक, मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक व सामाजिक विकास से है । योग पुरातन काल से अभ्यास में चला आ रहा है अतः हम ये कह सकते हैं कि योग जीवन जीने की कला है । भावनात्मक स्वास्थ्य के संदर्भ में, योग आत्म–स्वीकृति और आत्म–साक्षात्कार को प्रोत्साहित करता है । यह हमारे भीतर सकारात्मक भावनाओं को जागृत करता है और नकारात्मकता को दूर करने में मदद करता है । योग के माध्यम से हम अपने आंतरिक शांति और खुशी को अनुभव कर सकते हैं, जो हमारे समग्र जीवन की गुणवत्ता को सुधारता है । समाज के संदर्भ में, योग एकजुटता और समरसता को बढ़ावा देता है । यह हमें आत्म–नियंत्रण और अनुशासन सिखाता है, जो सामाजिक व्यवहार में सुधार लाने में सहायक है । योग अपनाएँ और स्वस्थ रहें ।

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डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक
हिमालिनी

 

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