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कूटनीतिक दलदल में  प्रधानमंत्री बालेन्द्र साह : अजयकुमार झा

 

अजयकुमार झा, ज्लेश्वर, 24 मई । नेपाल भौगोलिक दृष्टि से भले ही एक छोटा राष्ट्र हो, किन्तु उसकी सामरिक स्थिति उसे विश्व राजनीति का अत्यन्त महत्वपूर्ण केन्द्र बनाती है। उत्तर में चीन और दक्षिण, पूर्व तथा पश्चिम में भारत से घिरा नेपाल सदैव दो महाशक्तियों के बीच संतुलन साधने की चुनौती से जूझता रहा है। इक्कीसवीं सदी में अमेरिका और यूरोपीय शक्तियों की बढ़ती सक्रियता ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। ऐसे समय में यदि नेपाल की राजनीति में कोई नया, जनआकर्षक और परंपरागत दलों से भिन्न नेतृत्व उभरता है, तो अंतरराष्ट्रीय शक्तियाँ स्वाभाविक रूप से उसकी ओर आकर्षित होती हैं। इसी संदर्भ में नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री बालेन साह की राजनीति और उनकी विदेश नीति को लेकर व्यापक बहस चल रही है। एक ओर उन्हें युवा, तकनीकी सोच वाला और भ्रष्टाचार विरोधी नेता माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर आलोचकों का मत है कि वे भारत, चीन, अमेरिका और यूरोपीय शक्तियों के बीच चल रहे भू-राजनीतिक संघर्ष के दलदल में धीरे-धीरे फँसते जा रहे हैं।

नेपाल का इतिहास यह प्रमाणित करता है कि यहाँ की आंतरिक राजनीति कभी भी विदेशी प्रभावों से पूर्णतः मुक्त नहीं रही। 1950 की भारत-नेपाल संधि से लेकर राजतंत्र के पतन, माओवादी आंदोलन, संविधान निर्माण और संघीय व्यवस्था तक, प्रत्येक चरण में बाहरी शक्तियों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका रही है। भारत नेपाल को अपनी सांस्कृतिक, धार्मिक और सुरक्षा परिधि का हिस्सा मानता है। चीन नेपाल को तिब्बत की सुरक्षा और दक्षिण एशिया में अपनी रणनीतिक पहुँच के रूप में देखता है। अमेरिका लोकतंत्र, मानवाधिकार और इंडो-पैसिफिक रणनीति के माध्यम से नेपाल में अपनी उपस्थिति बढ़ाना चाहता है, जबकि यूरोपीय संघ सामाजिक न्याय, जलवायु परिवर्तन और नागरिक अधिकारों के मुद्दों के माध्यम से प्रभाव स्थापित करते आ रहा है। ऐसी स्थिति में नेपाल का कोई भी प्रधानमंत्री केवल घरेलू राजनीति में सीमित होकर सफल नहीं हो सकता, बल्कि वह अनिवार्य रूप से वैश्विक शक्ति-संतुलन को निर्विवादित रखने में अपनी कूटनीतिक योजना और निर्णय के द्वारा राष्ट्रीय अखंडता और संप्रभुता को सशक्त बनाने में सफल होता है।

प्रधान मंत्री वालेंद्र साह का उदय परंपरागत नेपाली राजनीति के विरुद्ध जनाक्रोश का परिणाम है। उन्होंने स्वयं को “सिस्टम विरोधी” और “नए नेपाल” के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर युवा वर्ग, शहरी मध्यम वर्ग और सोशल मीडिया का भरपूर प्रयोग कर उन्हेंने असाधारण लोकप्रियता हासिल की। किन्तु यही लोकप्रियता विदेशी शक्तियों के लिए भी रुचि का विषय बन गई। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसे नेताओं को विशेष महत्व दिया जाता है जो पारंपरिक दलों से अलग हों और जिनकी वैचारिक स्थिति अभी स्थिर न हुई हो। क्योंकि ऐसे नेतृत्व को अपने लाभ के लिए प्रभावित करना अपेक्षाकृत सरल माना जाता है। यहीं से बालेन साह के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रारंभ होती है। या तो वे नेपाल की स्वायत्त राष्ट्रनीति विकसित कर राष्ट्रीय स्थायित्व को बनाए रख पाएँगे या विभिन्न शक्तियों के दबाव में उलझकर दम तोड़ देंगे।

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बालेंद्र साह की सरकार और भारत के बीच “मनमुटाव” को केवल व्यक्तिगत संबंध या किसी एक घटना से नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे नेपाल की आंतरिक राजनीति, राष्ट्रवाद, भू-राजनीति, आर्थिक निर्भरता और जनभावनाओं का जटिल मिश्रण है। वास्तव में यह पूर्ण शत्रुता नहीं, बल्कि “सहयोग और अविश्वास” का मिश्रित संबंध है। नेपाल की राजनीति में लंबे समय से “भारत से दूरी” को राष्ट्रवाद का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया जाता रहा है। जब भी कोई नया नेता उभरता है, वह स्वयं को “स्वाभिमानी” सिद्ध करने के लिए भारत के प्रति कठोर भाषा या स्वतंत्र नीति का संकेत देता है। बालेंद्र साह भी युवा राष्ट्रवादी छवि के साथ उभरे हैं। उनके समर्थकों का एक वर्ग मानता है कि नेपाल को भारत के प्रभाव से अधिक स्वतंत्र होना चाहिए। यही कारण है कि कई बार उनकी नीतियों या बयानों को भारत के प्रति संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।

नेपाल और भारत के बीच कालापानी, लिपुलेक और लिम्पियाधुरा जैसे सीमा विवाद लंबे समय से तनाव का कारण रहे हैं। नेपाल में यह धारणा मजबूत है कि भारत ने नेपाली भूमि पर अतिक्रमण किया है। जब भी नेपाल का नेतृत्व इन मुद्दों को उठाता है, भारत इसे संवेदनशील सुरक्षा प्रश्न के रूप में देखता है। दूसरी ओर यदि नेपाली नेतृत्व चुप रहता है, तो उस पर “राष्ट्रहित बेचने” का आरोप लगता है। इसलिए कोई भी नेपाली सरकार इस प्रश्न से बच नहीं सकती।

ध्यान रहे! नेपाल और भारत के बीच का संबंध केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक और पारिवारिक है। लाखों नेपाली नागरिक भारत में कार्यरत हैं। नेपाल का अधिकांश व्यापार भारत पर निर्भर है। किन्तु सीमा विवाद, 2015 की नाकाबंदी, मधेश राजनीति और जल संसाधनों के प्रश्नों ने दोनों देशों के बीच अविश्वास की गहरी खाई पैदा कर दिया है। बालेन साह की सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह भारत के साथ सहयोग बनाए रखते हुए नेपाली राष्ट्रवाद को सम्मानित और राष्ट्रवादी को भी संतुष्ट करे। यदि वे भारत के अत्यधिक निकट दिखाई देते हैं तो उन पर “भारतीय प्रभाव” का आरोप लगेगा, और यदि वे दूरी बनाते हैं तो आर्थिक एवं राजनीतिक संकट की आशंका उत्पन्न होगी। यही द्वंद्व उन्हें लगातार द्विविधाग्रस्त बनाए रखेगा। जिससे सरकार के कर्तव्य और निष्ठा के प्रति सवाल पैदा होंगे। सरकार की तूफानी गति को जकड़न अनुभव होगा। मूलभूत राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर वैदेशिक दबाव और षडयंत्रों का गंभीरता, परन्तु विवेकपूर्ण ढंग से निर्णय लेने होंगे। नेपाल में सरकार को गिराने का खेल कोई नई बात नहीं है।

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इधर चीन नेपाल को अपनी बेल्ट एंड रोड परियोजना (BRI) का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। चीन नेपाल में सड़क, रेल, ऊर्जा और डिजिटल संरचना के माध्यम से अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है। चीन की प्राथमिक चिंता तिब्बत है। वह नेपाल की भूमि का उपयोग किसी भी “तिब्बती विरोधी गतिविधि” के लिए नहीं होने देना चाहता। इसके बदले वह नेपाल को निवेश, अवसंरचना और वैकल्पिक व्यापार मार्ग देने का आश्वासन देता है।बालेन साह यदि चीन के साथ अत्यधिक निकटता बढ़ाते हैं, तो भारत और पश्चिमी देशों की शंकाएँ बढ़ती हैं। दूसरी ओर यदि वे चीन से दूरी बनाते हैं, तो नेपाल एक महत्वपूर्ण आर्थिक अवसर खो सकता है। यही संतुलन उनके लिए कूटनीतिक दलदल बनता जा रहा है।

दूर बैठे अमेरिका नेपाल को इंडो-पैसिफिक रणनीति के एक संभावित साझेदार के रूप में देखता है। MCC समझौते के समय नेपाल में जिस प्रकार तीखी बहस हुई, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि नेपाल अब केवल भारत-चीन प्रतिस्पर्धा का ही नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संघर्ष का भी क्षेत्र बन चुका है। अमेरिका लोकतंत्र, पारदर्शिता और विकास सहायता के माध्यम से प्रभाव बढ़ाते आ रहा है। वहीं यूरोपीय देश मानवाधिकार, समावेशिता और जलवायु एजेंडा के जरिए नेपाल की नीतियों को प्रभावित करते हैं।

आलोचकों का आरोप है कि नेपाल की राजनीतिक नेतृत्व-श्रेणी पश्चिमी सहायता और अंतरराष्ट्रीय वैधता प्राप्त करने के लिए कई बार राष्ट्रीय हितों से समझौता करती रही है। यदि बालेन साह भी इसी प्रवृत्ति में बहते हैं, तो उनकी “स्वतंत्र राष्ट्रवादी” छवि कमजोर पड़ सकती है। बालेन साह की राजनीति का एक बड़ा आधार डिजिटल जनसमर्थन है। लेकिन विदेश नीति केवल जनभावना से नहीं चलती; इसके लिए गहरी संस्थागत समझ, ऐतिहासिक अनुभव और संतुलित कूटनीति आवश्यक होती है। कई विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल में नई पीढ़ी का नेतृत्व प्रशासनिक सुधार तो कर सकता है, परंतु अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन की जटिलताओं से निपटना अत्यंत कठिन कार्य है। चीन, भारत, अमेरिका और यूरोप की नीतियाँ केवल मित्रता पर आधारित नहीं होतीं; वे दीर्घकालिक रणनीतिक हितों से संचालित होती हैं। यदि नेपाल का नेतृत्व भावनात्मक राष्ट्रवाद, तात्कालिक लोकप्रियता या सोशल मीडिया की प्रतिक्रियाओं के आधार पर विदेश नीति चलाएगा, तो वह शीघ्र ही वैश्विक शक्तियों के दबाव में फँस सकता है।

नेपाल के मधेश क्षेत्र के लोगों के भारत से सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंध हैं। नेपाली राजनीति में यह विषय अत्यंत संवेदनशील है। कुछ राष्ट्रवादी समूह मधेशी राजनीति को “भारतीय प्रभाव” से जोड़कर देखते हैं, जबकि मधेशी दल समान अधिकार और प्रतिनिधित्व की बात करते हैं। बालेन सरकार को इन दोनों ध्रुवों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। यही कारण है कि कई बार भारत और नेपाल के संबंध घरेलू राजनीतिक विवादों से भी प्रभावित होते हैं। इसी तरह नेपाल की अर्थव्यवस्था आज भी काफी हद तक भारत पर निर्भर है—व्यापार, पेट्रोलियम, रोजगार, परिवहन और बंदरगाह सुविधा तक। किन्तु राजनीतिक रूप से नेपाल अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखना चाहता है। यही द्वंद्व सबसे बड़ा तनाव पैदा करता है। नेपाल भारत से सहयोग भी चाहता है और भारत पर अत्यधिक निर्भर भी नहीं दिखना चाहता। लोगों के नजर में भारत विरोधी नेपाली राष्ट्रीयता का संवाहक भी बना रहना चाहता है। जबकि नेपाल में सोशल मीडिया आधारित राष्ट्रवाद बहुत तेजी से बढ़ा है। भारत विरोधी भावनाएँ कई बार राजनीतिक लोकप्रियता का माध्यम बन जाती हैं। बालेंद्र साह की लोकप्रियता का एक बड़ा आधार युवा डिजिटल वर्ग है, जहाँ भावनात्मक राष्ट्रवाद अधिक प्रभावी है। यही कारण है कि कूटनीतिक विषय भी जनउत्तेजना का रूप ग्रहण कर लिया है।

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नेपाल को आज सबसे अधिक आवश्यकता है—“संतुलित और स्वायत्त राष्ट्रनीति” की। न तो भारतीयकरण, न अंध-चीन समर्थक दृष्टिकोण, और न ही पश्चिमी सहायता पर शरणागत निर्भरता; बल्कि बहुध्रुवीय संतुलन ही नेपाल की स्थिरता का आधार बन सकता है। बालेन साह यदि वास्तव में ऐतिहासिक नेता बनना चाहते हैं, तो उन्हें केवल लोकप्रियता नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय दृष्टि विकसित करनी होगी। उन्हें यह समझना होगा कि नेपाल की शक्ति उसकी स्वतंत्र पहचान, सांस्कृतिक सभ्यता और संतुलित कूटनीति में निहित है।

वालेंद्र साह आज एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ हर निर्णय का अंतरराष्ट्रीय प्रभाव पड़ता है। भारत, चीन, अमेरिका और यूरोप—सभी नेपाल को अपने-अपने दृष्टिकोण से देख रहे हैं। यदि नेपाल का नेतृत्व विवेक, संतुलन और राष्ट्रीय आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़ता है, तो यह स्थिति अवसर बन सकती है। लेकिन यदि वह बाहरी शक्तियों के प्रभाव, तात्कालिक लोकप्रियता और वैचारिक अस्थिरता में उलझ जाता है, तो वही स्थिति कूटनीतिक दलदल सिद्ध होगी।

ध्यातव्य है कि नेपाल और भारत ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से इतने गहरे जुड़े हैं कि पूर्ण दूरी संभव नहीं है। इसलिए दोनों देशों को भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के बजाय परिपक्व कूटनीति, पारस्परिक सम्मान और संतुलित सहयोग की आवश्यकता है। नेपाल का भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि उसका प्रधानमंत्री किस देश के निकट है, बल्कि इस पर निर्भर करेगा कि वह नेपाल को कितना आत्मनिर्भर, संतुलित और स्वाभिमानी राष्ट्र बनाने में सक्षम साबित होते हैं।

अजयकुमार झा, जलेश्वर

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