नहीं रहे राजेन्द्र विमल, साहित्य जगत ने एक महान विभूति को खो दिया
सुप्रसिद्ध साहित्यकार, विद्वान तथा मैथिली विकास कोष के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद विमल जी का बीती रात निधन हाे गया है ।
स्वास्थ्य अवस्था अचानक बिगड़ने के कारण उन्हें जनकपुर प्रादेशिक अस्पताल ले जाया गया। शुरुआत में डा. कुलदीप पंडित ने उनकी जाँच की और उन्हें प्रादेशिक अस्पताल ले जाने की सलाह दी। उनकी सलाह के अनुसार उन्हें अस्पताल ले जाया गया। जहाँ उनका निधन हो गया ।
कथा लेखन में लंबे समय से सक्रिय डॉ. राजेन्द्र विमल को मधेश भूमि की सुरुचिपूर्ण कथाओं के माध्यम से नेपाली आख्यान साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए ‘मधुपर्क सम्मान २०७६’ से सम्मानित किया गया था ।
डॉ. राजेन्द्र विमल का जन्म 26 मार्च 1947 को देवीचोक, जनकपुर-10 में हुआ था। उन्होंने नेपाली, हिंदी और मैथिली विषयों में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। इसके अतिरिक्त उन्होंने भाषाविज्ञान में पीएचडी की।
डॉ. विमल ने वि.सं. 2029 साल से लगातार त्रिभुवन विश्वविद्यालय में नेपाली विषय का अध्यापन किया। अध्यापन के साथ-साथ वे साहित्य-सृजन और भाषा-संस्कृति के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे।
साहित्यिक यात्रा एवं कृतियाँ
डॉ. विमल की साहित्यिक यात्रा अत्यंत कम उम्र में शुरू हुई। 12 वर्ष की आयु में उनकी पहली लघुकथा ‘आर्यावर्त’ हिंदी दैनिक में प्रकाशित हुई। 15 वर्ष की उम्र में ‘आर्यावर्त’ में प्रकाशित उनकी कहानी ‘कचनार के पेड़’ काफी लोकप्रिय हुई। इसी वर्ष उनकी मैथिली कहानी ‘मुईल बच्चा’ मैथिली मासिक पत्रिका ‘मिथिला मिहीर’ में प्रकाशित हुई।
एसएलसी परीक्षा के बाद मिले अवकाश के दौरान उन्होंने ‘चान अहाँ उदास छी’ नामक उपन्यास लिखा। वर्ष 1966 के बाद उन्होंने गोरखापत्र, पंचवाणी, बैदेही आदि पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेखन करना शुरू किया।
उनका प्रमुख कहानी-संग्रह ‘राजेन्द्र विमलका कथाहरू’ है। इस संग्रह की कहानी ‘बंधनबाट मुक्ति’ को वि.सं. २०७३ के पाठ्यक्रम के अनुसार कक्षा 9 की अनिवार्य नेपाली विषय की पाठ्यपुस्तक में शामिल किया गया। उनकी रचना ‘नवनीत नेपाल परिचय’ (वि.सं. 2044) भी प्रकाशित हुई। इसी प्रकार उनकी चर्चित कहानी ‘लंका दहन’ को स्नातक स्तर के अनिवार्य नेपाली विषय के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया।
उनका साहित्यिक लेखन केवल कथा-साहित्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नेपाली, मैथिली और हिंदी भाषा-साहित्य के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु के रूप में भी देखा जाता है। मधेश और मिथिला की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना, वहाँ के जनजीवन और मानवीय संवेदनाओं को उन्होंने अपनी रचनाओं में प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया।
पुरस्कार एवं सम्मान
डॉ. राजेन्द्र विमल को मिथिला क्षेत्र में चार दशकों से अधिक समय तक मैथिली भाषी विद्यार्थियों को नेपाली भाषा में शिक्षित करने के महत्वपूर्ण कार्य तथा नेपाली भाषा-साहित्य को अनेक ग्रंथों के माध्यम से समृद्ध करने के लिए वि.सं. 2066 का जगदम्बाश्री पुरस्कार प्रदान किया गया।
इसके अतिरिक्त, नेपाली आख्यान साहित्य में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें ‘मधुपर्क सम्मान २०७६’ से भी सम्मानित किया गया।
डॉ. राजेन्द्र विमल का व्यक्तित्व साहित्यकार, भाषाविद्, शिक्षक और सांस्कृतिक चिंतक के रूप में बहुआयामी रहा। नेपाली, मैथिली और हिंदी—तीनों भाषायी परंपराओं के बीच उनका साहित्यिक योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
भाषा, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उनका अमूल्य योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। उनके निधन से साहित्य जगत ने एक महान विभूति को खो दिया है।

