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भाषण से चलता यह देश कब तक खड़ा रह पाएगा ?: श्वेता दीप्ति

 

  सियासत का असली चेहरा नजर आता है
लहू में डूबा अब ये चाँद नजर आता है ।

विश्व जहाँ एक बार फिर से जीने की राह तलाश रहा है । घरों में कैद हम जीवन की संभावना तलाश रहे हैं । वहीं आज जिन्दगी और मौत के बीच बेहाल नेपाली जनता सड़कों पर उतर आई है । बालुवाटार ही नहीं पूरा देश खुद–ब–खुद सड़कों पर है । न उन्हें महामारी का डर है और न ही गिरफ्तारी का । सच तो यह है कि देश की बीमार सरकारी तंत्र से दो–दो हाथ करने के लिए जनता लाचार हो गई है । महामारी से बचने के लिए दवा नहीं, सही व्यवस्था नहीं, सिर्फ भाषण है ।

भाषण से चलता हुआ यह देश न जाने कब तक खड़ा रह पाएगा ? इसे न तो देश की परवाह है, न जनता की, बस स्वार्थ की राजनीति में पद और पावर की पहचान रह गई है । आश्चर्य तो इस बात का है कि यहाँ मौत का भी सौदा होता आया है । विनाशकारी भूकम्प में भी जनता ने इसे भोगा और आज वैश्विक महामारी में भी यह देश भ्रष्टाचार का उदाहरण बन रहा है । रेमिट्यान्स से चलने वाला देश रेमिट्यान्स देने वालों के प्रति भी सहृदय नहीं हो पाया है । महँगे टिकट को खरीदने वाले ही देश का दर्शन कर पा रहे हैं, वो भी महीनों बाद सरकार ने इनकी सुध ली है । बाकी श्रमिक वर्ग आज भी विदेशों में भूखे मरने की स्थिति में हैं । उनकी परवाह सरकार को है ही नहीं । क्वरेन्टाइन के नाम पर होने वाली दुर्दशा सब देख रहे हैं ।

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वहाँ रह रहे लोगों को खाना घर से मिल रहा है । मामूली जाँच के साथ उन्हें घर भेजा जा रहा है । सरकार नमक, हल्दी का घोल पिलाकर इलाज की सलाह दे रही है । केन्द्रीय सरकार और स्थानीय सरकार सभी असफल नजर आ रहे हैं । सचमुच यह देश ईश्वर के भरोसे ही चल रहा है । एक नीतिविहीन सरकार और निरीह जनता, जिसका विरोध सिर्फ एक शोर बनकर थम जा रहा है । नक्कारखाने में तूती की आवाज भला कौन सुनता है ?

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जनता को बहलाने के लिए एक शगूफा यहाँ की हर सरकार के पास हमेशा रहा है । आज भी यह तुरुप का पत्ता फेका जा चुका है । जनता को एक काम मिल चुका है और वो इससे अपना मनोरंजन हमेशा की तरह कर रही है । खैर उम्मीद है कि यह तुरुप का पत्ता इस बार खेल को किसी निर्णायक मकाम तक पहुँचा दे । किन्तु यह भी सच है कि रास्ता आसान नहीं है क्योंकि अभी तो प्रमाण खोजना बाकी है । इसलिए हर बार की तरह यह खेल कहीं फिर शगूफा ही न बन कर रह जाए । खैर, जिन्दगी उम्मीद पर टिकी हुई है ।

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लेकिन सच तो यह है कि–
सियासत का असली चेहरा नजर आता है
लहू में डूबा अब ये चाँद नजर आता है ।

(संपादकीय, हिमालिनी)

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