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रास्वपा के महाधिवेशन प्रस्तावों पर हृदेश त्रिपाठी का तीखा हमला

 

हिमालिनी डेस्क, काठमांडू, 25 जून। राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) के प्रथम राष्ट्रीय महाधिवेशन में प्रस्तुत विभिन्न राजनीतिक प्रस्तावों को लेकर पूर्व मंत्री हृदेश त्रिपाठी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर टिप्पणी करते हुए कहा कि, “अंततः बिल्ली ने म्याऊँ कर ही दिया, आखिर बिल्ली ही ठहरी।” इस टिप्पणी के माध्यम से उन्होंने रास्वपा की वैचारिक दिशा पर सवाल उठाए।

त्रिपाठी ने महाधिवेशन में प्रस्तुत तीन प्रमुख प्रस्तावों की आलोचना की।

सबसे पहले उन्होंने प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी प्रधानमंत्री की व्यवस्था के प्रस्ताव पर आपत्ति जताई। उनका कहना है कि इससे अत्यधिक केंद्रीकृत शासन व्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा और देश में तानाशाही प्रवृत्ति विकसित होने का खतरा बढ़ सकता है। उनके अनुसार नेपाल विविधताओं और बहुलवाद वाला समाज है, जिसने दशकों तक निरंकुश शासन का अनुभव किया है। ऐसे में यह प्रस्ताव देश के लिए घातक साबित हो सकता है।

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दूसरे, उन्होंने संघीय व्यवस्था और प्रांतों को समाप्त करने के प्रस्ताव को एकात्मक तथा सांप्रदायिक सोच से प्रेरित बताया। त्रिपाठी का तर्क है कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों से प्रांतों को वंचित कर उन्हें अधिकारहीन और संसाधनविहीन बनाया गया, जिसके कारण उनकी प्रभावशीलता कम हुई। अब उसी स्थिति का हवाला देकर प्रांतों को अनावश्यक बताना एक सुनियोजित दुष्प्रचार है। उन्होंने कहा कि रास्वपा की यह सोच उनके लिए नई नहीं है, क्योंकि ऐसे विचारों का सामना वे पहले भी कर चुके हैं।

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तीसरे प्रस्ताव पर टिप्पणी करते हुए त्रिपाठी ने स्थानीय तहों के पुनर्गठन और संख्या घटाने के विचार पर भी प्रश्न उठाया। उनका कहना है कि वर्तमान स्थानीय सरकारें पहले से ही कर्मचारियों की कमी, बढ़ते बेरुजु (अनियमित व्यय) और कमजोर सेवा प्रवाह जैसी समस्याओं से जूझ रही हैं। ऐसे में स्थानीय निकायों का आकार बढ़ाने की कल्पना करने के बजाय सरकार को माध्यमिक शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की गिरती स्थिति पर ध्यान देना चाहिए।

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रास्वपा के महाधिवेशन में प्रस्तुत इन प्रस्तावों को लेकर राजनीतिक बहस तेज होने लगी है। विभिन्न राजनीतिक दलों और विश्लेषकों की ओर से इन पर समर्थन और विरोध दोनों तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं।

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