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रसुवा बाढ़ पर प्रधानमंत्री बालेन शाह का संसद में जवाब: पूर्व चेतावनी, शवों की पहचान और विदेशी मदद पर दी सफाई

 

17 भाद्र, काठमांडू।

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने रसुवा की विनाशकारी भोटेकोशी बाढ़ को लेकर संसद में उठे सवालों का जवाब दिया। प्रतिनिधि सभा में सरकार की ओर से बाढ़ राहत और बचाव कार्यों की जानकारी देते हुए उन्होंने तीन प्रमुख मुद्दों—पूर्व चेतावनी, शवों के वैज्ञानिक प्रबंधन और विदेशी बचाव सहायता में देरी—पर विस्तार से अपनी बात रखी।

10 भाद्र को नेपाल-चीन सीमा के पास भोटेकोशी नदी में आई भीषण बाढ़ ने रसुवा, नुवाकोट, धादिङ, गोरखा और चितवन समेत त्रिशूली नदी तटीय क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई थी।

रसुवा बाढ़ की समय रहते चेतावनी क्यों नहीं मिली?

संसद और आम जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल यह था कि इतनी बड़ी बाढ़ की पूर्व सूचना समय पर क्यों नहीं मिली।

प्रधानमंत्री बालेन शाह ने जवाब देते हुए कहा कि यह मानव सभ्यता द्वारा देखी गई सबसे असाधारण प्राकृतिक घटनाओं में से एक थी और यह सामान्य पूर्वानुमान की सीमा से बाहर थी।

उन्होंने कहा कि जैसे ही बाढ़ आने की जानकारी मिली, सुरक्षा बलों को स्थानीय लोगों को सतर्क करने के लिए तुरंत भेजा गया था और यह तथ्य सार्वजनिक रूप से भी उपलब्ध है।

हालांकि संसद में यह सवाल भी उठा कि क्या चीन ने नेपाल को पहले से बाढ़ की सूचना दी थी और क्या नेपाल ने आगे भारत को इसकी जानकारी दी थी। इस सवाल पर प्रधानमंत्री शाह ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया।

बाढ़ का अब तक का आधिकारिक आंकड़ा

प्रधानमंत्री के संसद में दिए गए विवरण के अनुसार बुधवार दोपहर तक:

  • 1,114 लोगों के शव बरामद किए जा चुके हैं।

  • 3,916 लोग अब भी लापता हैं।

  • 292 लोग घायल हुए हैं।

  • प्रभावित क्षेत्रों से 12 हजार से अधिक लोगों का सुरक्षित उद्धार किया गया है।

शुरुआत से ही यह बहस रही कि यदि समय पर पूर्व चेतावनी मिल जाती तो जान-माल का नुकसान काफी कम हो सकता था।

 शवों का प्रबंधन कितना संवेदनशील है?

बाढ़ में मारे गए लोगों के शव अलग-अलग स्थानों पर बहकर पहुंचने के कारण उनके अंतिम संस्कार और पहचान को लेकर कई सवाल उठे।

प्रधानमंत्री शाह ने कहा कि बाढ़ का पानी और भारी मात्रा में आए मलबे के कारण शव विभिन्न जिलों तक पहुंच गए। इसलिए सरकार ने जिन शवों की तत्काल पहचान नहीं हो सकी, उनका वैज्ञानिक तरीके से अभिलेखीकरण कर सुरक्षित रखा है।

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सरकार ने चितवन, गोरखा और काठमांडू में ऐसे शवों का सुरक्षित प्रबंधन किया है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि:

  • जिन शवों की पहचान नहीं हो सकी है, उनका डीएनए नमूना सुरक्षित रखा गया है।

  • शवों को कानूनी और वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत दफनाया गया है।

  • भविष्य में डीएनए मिलान होने पर शव संबंधित परिवारों को सौंप दिए जाएंगे।

  • इसके बाद परिवार अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार अंतिम संस्कार कर सकेंगे।

प्रधानमंत्री ने लोगों से इस विषय में अफवाहों और भ्रम से बचने की अपील भी की।

 विदेशी बचाव दल बुलाने में देरी क्यों हुई?

बाढ़ के बाद जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे मजदूरों को निकालने के लिए विदेशी विशेषज्ञों और तकनीकी टीमों को अनुमति देने में लगभग पांच दिन लगने पर सरकार की आलोचना हुई।

इस पर प्रधानमंत्री शाह ने कहा कि सरकार ने विदेशी सहायता लेने में कोई आनाकानी नहीं की।

उनके अनुसार, आपदा की शुरुआत से ही नेपाल ने आवश्यकतानुसार विभिन्न देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से समन्वय शुरू कर दिया था तथा सहायता लेने की प्रशासनिक प्रक्रियाओं को भी सरल बनाया गया।

किन देशों और संस्थाओं ने मदद की?

प्रधानमंत्री के अनुसार नेपाल को तकनीकी, राहत और बचाव सहायता देने वाले देशों में शामिल हैं:

  • भारत

  • चीन

  • अमेरिका

  • जापान

  • दक्षिण कोरिया

  • ऑस्ट्रेलिया

  • यूनाइटेड किंगडम

  • संयुक्त अरब अमीरात

  • क़तर

  • सिंगापुर

  • स्विट्जरलैंड

  • पाकिस्तान

  • श्रीलंका

  • बांग्लादेश

इसके अलावा एशियाई विकास बैंक (ADB), विश्व बैंक, यूरोपीय संघ (EU) और संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय विकास साझेदारों ने भी नेपाल को राहत एवं तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराया है।

रसुवा की भोटेकोशी बाढ़ पर संसद में उठे सवालों का जवाब देते हुए नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने सुरंगों में बचाव अभियान में देरी, केंद्र-प्रदेश-स्थानीय सरकारों के समन्वय और सर्वदलीय आपदा तंत्र की मांग पर अपनी स्थिति स्पष्ट की। हालांकि कई मुद्दों पर विपक्ष और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की शिकायतें बरकरार रहीं।

 सुरंगों में खोज और बचाव में देरी क्यों हुई?

भोटेकोशी बाढ़ के बाद जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों में बड़ी संख्या में मजदूर फंस गए। विदेशी तकनीकी सहायता लेने में देरी और सुरंगों में बचाव अभियान धीमा होने पर सरकार को लगातार आलोचना का सामना करना पड़ा। निजी क्षेत्र ने भी आरोप लगाया कि उसने बचाव की अनुमति मांगी, लेकिन समय पर अनुमति नहीं मिली।

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नेपाल विद्युत प्राधिकरण के अनुसार करीब एक हजार लोग विभिन्न सुरंगों में फंसे हुए हैं।

प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में कहा कि घटना के तुरंत बाद ही खोज और बचाव अभियान शुरू कर दिया गया था।

उन्होंने कहा कि जहां-जहां घायल मिले और जहां हेलीकॉप्टर पहुंच सके, वहां तत्काल बचाव अभियान तेज किया गया। प्रभावित जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों में नेपाली सेना के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की टीम लगातार खोज और बचाव अभियान चला रही है।

पहले केवल नेपाली सुरक्षा बलों पर भरोसा

प्रधानमंत्री के अनुसार शुरुआत में सरकार ने अपनी आंतरिक क्षमता पर भरोसा किया था। नेपाली सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल को पर्याप्त क्षमता वाला मानते हुए सरकार ने बचाव अभियान की पूरी जिम्मेदारी नेपाली सेना के एकल नेतृत्व में शुरू की।

प्रारंभिक चरण में निजी कंपनियों और विदेशी तकनीकी विशेषज्ञों को उपकरणों सहित स्वतंत्र रूप से प्रभावित क्षेत्रों में काम करने की अनुमति नहीं दी गई। विदेश मंत्रालय और संबंधित निकायों ने भी शुरुआती दिनों में विदेशी बचाव दल भेजने के बजाय आर्थिक सहायता और राहत सामग्री को प्राथमिकता दी।

बाद में बदली रणनीति

लेकिन सुरंगों में जमा भारी मलबा, कीचड़ और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण केवल नेपाली टीमों के लिए बचाव कार्य पर्याप्त नहीं रहा। इसके अलावा कई विदेशी नागरिक भी लापता थे, जिससे विभिन्न देशों के दूतावासों का कूटनीतिक दबाव बढ़ा।

इसके बाद सरकार ने अपनी शुरुआती नीति बदलते हुए विदेशी तकनीकी विशेषज्ञों और बचाव टीमों को अनुमति दी। अब नेपाली सेना के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के साथ संयुक्त बचाव अभियान जारी है।

तीनों स्तर की सरकारों के बीच समन्वय कहां था?

बाढ़ के बाद लगातार आरोप लगते रहे कि संघीय, प्रांतीय और स्थानीय सरकारों के बीच प्रभावी समन्वय नहीं था। राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने राहत वितरण, क्षति आकलन और पुनर्वास में समन्वय की कमी की शिकायत की।

प्रधानमंत्री बालेन शाह ने इन आरोपों को खारिज किया।

उन्होंने संसद में कहा कि आपदा की शुरुआत से ही केंद्र सरकार का प्रदेश सरकार, स्थानीय सरकारों और जनप्रतिनिधियों के साथ लगातार संवाद बना हुआ था।

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उन्होंने याद दिलाया कि प्रभावित क्षेत्र के दौरे के दौरान बागमती प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनकी टीम के साथ विस्तृत बैठक हुई थी। इसके बाद राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण ने सभी पक्षों के साथ जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा करने का निर्णय लिया।

सर्वदलीय आपदा तंत्र पर प्रधानमंत्री मौन

बाढ़ के बाद सभी दलों ने मिलकर आपदा प्रबंधन के लिए एक उच्चस्तरीय सर्वदलीय तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा था।

11 भाद्र को हुई सर्वदलीय बैठक में रास्वपा, नेपाली कांग्रेस, एमाले, नेकपा, राप्रपा, जसपा, जनमत पार्टी और अन्य दलों के शीर्ष नेता शामिल हुए थे। बैठक में 10 सूत्रीय संकल्प पारित किया गया।

उसके दसवें बिंदु में दीर्घकालीन पुनर्निर्माण, जलवायु अनुकूलन, राष्ट्रीय आपदा नीति में सुधार और सरकार के कामकाज की निगरानी के लिए एक उच्चस्तरीय सर्वदलीय संसदीय समिति बनाने पर सहमति जताई गई थी।

इस समिति का उद्देश्य केवल राहत और बचाव तक सीमित न रहकर:

  • पुनर्निर्माण,

  • आपदा पूर्व तैयारी,

  • जोखिम न्यूनीकरण,

  • जलवायु अनुकूलन,

  • और दीर्घकालीन नीति सुधार में राष्ट्रीय सहमति बनाना था।

अब तक नहीं बन सका तंत्र

रास्वपा के मुख्य सचेतक कबिन्द्र बुर्लाकोटी ने कहा कि इस तंत्र का उद्देश्य सभी राजनीतिक दलों को राहत, बचाव और पुनर्निर्माण में साझेदार बनाना था, ताकि कोई एक दल हावी न हो और सरकार को सामूहिक सहयोग मिल सके।

लेकिन अब तक यह सर्वदलीय तंत्र गठित नहीं हो पाया है। मंगलवार को हुई सर्वदलीय बैठक में भी इस पर चर्चा हुई, नेताओं ने सरकार के साथ समन्वय का भरोसा दिया, लेकिन समिति गठन पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।

विपक्ष और कुछ राजनीतिक दलों का आरोप है कि सरकार स्वयं सर्वदलीय तंत्र बनाकर आगे बढ़ने के प्रति इच्छुक नहीं दिख रही है। इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में कोई टिप्पणी नहीं की।

प्रधानमंत्री बालेन शाह ने कहा कि यह एक अभूतपूर्व प्राकृतिक आपदा थी और सरकार उपलब्ध सभी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग करते हुए राहत, बचाव और पुनर्वास कार्यों में लगी हुई है। साथ ही उन्होंने भरोसा दिलाया कि लापता लोगों की खोज, शवों की पहचान और प्रभावित परिवारों को राहत देने का अभियान लगातार जारी रहेगा।

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