पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में बढ़ता जनाक्रोश: दमन, नाकेबंदी और मानवीय संकट के बीच संघर्ष
अनिल तिवारी । पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में इन दिनों व्यापक जनआक्रोश और राजनीतिक अस्थिरता देखने को मिल रही है। संयुक्त आवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) के नेतृत्व में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों ने पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पाकिस्तान सरकार लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने के लिए न केवल बल प्रयोग कर रही है, बल्कि आम नागरिकों को भोजन, दवाइयों और ईंधन जैसी बुनियादी आवश्यकताओं से भी वंचित कर रही है। इससे पूरे क्षेत्र में एक गंभीर मानवीय संकट उत्पन्न हो गया है।
मुजफ्फराबाद, रावलकोट और अन्य प्रमुख शहरों में सड़कों पर हजारों लोग उतर आए हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान सरकार वर्षों से स्थानीय जनता की राजनीतिक इच्छाओं की अनदेखी करती रही है और अब जब लोग अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं, तो उन्हें आतंकवादी करार देकर दबाने का प्रयास किया जा रहा है। विरोध-प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों में अब तक 58 से अधिक लोगों के मारे जाने की खबरें सामने आई हैं।
स्थानीय नागरिकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सुरक्षा बलों ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर सीधे गोलीबारी की। कई प्रत्यक्षदर्शियों ने दावा किया है कि मारे गए युवाओं के शवों को भी सुरक्षा एजेंसियां अपने साथ ले गईं। इससे लोगों में और अधिक आक्रोश फैल गया है। एक स्थानीय निवासी के अनुसार, “निहत्थे नागरिकों को गोलियां मारकर मौत के घाट उतारा जा रहा है और उनके शवों तक को परिवारों को नहीं सौंपा जा रहा।”
वर्तमान संकट की जड़ पीओके विधानसभा की उन 12 सीटों को लेकर है, जो जम्मू-कश्मीर से आए शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं। स्थानीय संगठनों का आरोप है कि इस्लामाबाद इन सीटों का उपयोग क्षेत्रीय राजनीति को नियंत्रित करने और अपनी पसंद की सरकारें बनाने के लिए करता है। उनका कहना है कि इन सीटों के माध्यम से स्थानीय जनमत को कमजोर किया जाता है और वास्तविक लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित किया जाता है।
स्थिति तब और अधिक तनावपूर्ण हो गई जब पाकिस्तान सरकार ने संयुक्त आवामी एक्शन कमेटी को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया। इसके बाद संगठन के नेताओं और समर्थकों के खिलाफ व्यापक कार्रवाई शुरू की गई। अनेक लोगों को गिरफ्तार किया गया, कई स्थानों पर छापेमारी हुई और विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए सुरक्षा बलों की भारी तैनाती की गई। आलोचकों का कहना है कि आतंकवाद का आरोप लगाकर सरकार राजनीतिक असहमति को दबाने की कोशिश कर रही है।
विरोध प्रदर्शनों के कारण पूरे क्षेत्र में जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। सड़कें बंद हैं, सार्वजनिक परिवहन ठप है और व्यापारिक गतिविधियां लगभग रुक चुकी हैं। हालांकि स्थानीय लोगों का आरोप है कि स्थिति केवल प्रदर्शनों के कारण नहीं बिगड़ी है, बल्कि पाकिस्तानी प्रशासन ने जानबूझकर खाद्य सामग्री, ईंधन और चिकित्सा आपूर्ति की आवाजाही को सीमित कर दिया है। परिणामस्वरूप अस्पतालों में दवाइयों की कमी होने लगी है, पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लग रही हैं और बाजारों में आवश्यक वस्तुओं का अभाव देखने को मिल रहा है।
पाकिस्तानी अधिकारियों ने इन आरोपों से इनकार किया है। उनका कहना है कि सुरक्षा कारणों और विरोध प्रदर्शनों के चलते यातायात प्रभावित हुआ है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला पर असर पड़ा है। लेकिन स्थानीय नागरिकों और विपक्षी दलों का दावा है कि यह एक सुनियोजित रणनीति है, जिसका उद्देश्य आंदोलनकारियों पर दबाव बनाना और उन्हें झुकने के लिए मजबूर करना है।
इस बीच, जेएएसी ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। संगठन ने संयुक्त राष्ट्र, एमनेस्टी इंटरनेशनल, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों, वैश्विक मीडिया संस्थानों और विदेशों में रह रहे कश्मीरी समुदाय से हस्तक्षेप की अपील की है। उनका कहना है कि पीओके में जो कुछ हो रहा है, उसे दुनिया के सामने लाना आवश्यक है ताकि मानवाधिकार उल्लंघनों पर अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि पीओके में चल रहा यह आंदोलन केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह स्थानीय लोगों की पहचान, अधिकारों और आत्मसम्मान से भी जुड़ा हुआ है। यदि पाकिस्तान सरकार संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बजाय दमनकारी उपायों को प्राथमिकता देती रही, तो क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ सकती है।
आज पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां जनता अपने अधिकारों और राजनीतिक सम्मान की लड़ाई लड़ रही है। दूसरी ओर, सरकार सुरक्षा और नियंत्रण के नाम पर कठोर कदम उठा रही है। इस संघर्ष का परिणाम चाहे जो भी हो, लेकिन इतना स्पष्ट है कि पीओके में उत्पन्न यह संकट केवल एक स्थानीय राजनीतिक विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह मानवाधिकार, लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़ा एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनता जा रहा है।

