नेपाल संसद में भोटेकोशी बाढ़ पर सरकार घिरी, सांसदों की ‘डिजास्टर टूरिज्म’ पर भी उठा सवाल
2 weeks ago
काठमांडू।
नेपाल-चीन सीमा पर भोटेकोशी-ल्हेन्दे में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद राहत, बचाव और सरकार की भूमिका को लेकर नेपाल की संसद में तीखी बहस हुई। विपक्षी दलों के साथ-साथ सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं ने भी सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए और कुछ मंत्रियों तथा सांसदों पर बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत से ज्यादा “फोटो सेशन” और “डिजास्टर टूरिज्म” करने का आरोप लगाया।
भाद्र 10 (27 अगस्त) की सुबह आई इस भीषण बाढ़ से रसुवा, नुवाकोट, धादिङ, गोरखा और तनहुँ जिलों की 15 स्थानीय निकायों में भारी जन-धन की क्षति हुई है। एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी कई लोग लापता हैं और सुरंगों में फंसे लोगों के बचाव अभियान को लेकर जनाक्रोश बढ़ रहा है।
प्रधानमंत्री ने संसद में दी राहत और बचाव कार्यों की जानकारी
बुधवार को प्रतिनिधि सभा की बैठक में प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने सरकार की ओर से खोज, बचाव और राहत कार्यों का विस्तृत ब्यौरा पेश किया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार शुरुआत से ही बागमती प्रदेश सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ लगातार समन्वय में काम कर रही है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा कर राहत और बचाव अभियान चलाया जा रहा है।
प्रचंड का हमला—“सरकार सोशल मीडिया पर दिखी, मैदान में नहीं”
पूर्व प्रधानमंत्री और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के संयोजक पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’ ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सरकार सोशल मीडिया पर तो सक्रिय दिखाई दी, लेकिन पीड़ितों के बचाव और राहत वितरण में उसकी उपस्थिति नहीं दिखी।
प्रचंड ने प्रधानमंत्री को चेतावनी देते हुए कहा कि आपदा के समय सभी उपलब्ध सहयोग स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि समय किसी का इंतजार नहीं करता।
उन्होंने प्रधानमंत्री की कार्यशैली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि वे संसद में आते हैं और किसी सांसद की ओर देखे बिना चले जाते हैं। उनका आरोप था कि प्रधानमंत्री न विपक्ष को विश्वास में ले सके और न ही अपनी ही पार्टी के सांसदों को।
विपक्ष का आरोप—“फेसबुक पर ज्यादा काम, मैदान में कम”
मुख्य विपक्ष के नेता भीष्मराज आङ्देम्बे ने कहा कि संविधान में तीन स्तर की सरकार की व्यवस्था होने के बावजूद संघीय सरकार ने स्थानीय और प्रांतीय सरकारों के साथ प्रभावी समन्वय नहीं किया।
उन्होंने कहा कि कोविड महामारी के दौरान स्थानीय सरकारों ने बेहतर काम किया था, लेकिन इस बार सरकार समानांतर पार्टी संरचनाओं और मंत्रियों के निजी नेटवर्क तक सीमित रही।
आङ्देम्बे ने आरोप लगाया कि यह प्रचार का समय नहीं बल्कि लोगों की जान बचाने का समय है। उनके अनुसार मंत्री सुरंग के बाहर मिट्टी हटाकर तस्वीरें खिंचवाने में व्यस्त रहे, जबकि विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय तकनीकी सहायता लेने में देरी होती रही।
रवि लामिछाने ने नेताओं को दिया “डिजास्टर टूरिज्म” रोकने का आदेश
सरकार और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के कुछ सांसदों की गतिविधियों की सोशल मीडिया पर आलोचना होने के बाद पार्टी अध्यक्ष रवि लामिछाने ने सख्त निर्देश जारी किए।
उन्होंने बागमती प्रदेश के मुख्यमंत्री और प्रभावित स्थानीय निकायों के प्रमुखों से बातचीत के बाद पार्टी की वर्चुअल केंद्रीय समिति की बैठक बुलाई और कहा कि नेता और सांसद बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में केवल फोटो खिंचवाने या सेल्फी लेने न जाएं।
लामिछाने ने कहा कि आपदा प्रभावित इलाकों में जाकर सुरक्षाकर्मियों और स्थानीय लोगों पर अतिरिक्त बोझ डालने वाली गतिविधियां बंद होनी चाहिए। उन्होंने सभी अनावश्यक नेताओं और सांसदों को तुरंत वापस लौटने का निर्देश दिया।
पार्टी ने माना, कुछ गतिविधियां शर्मनाक थीं
रास्वपा संसदीय दल के नेता गणेश पराजुली ने कहा कि सरकार को अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए नागरिकों की सुरक्षा के लिए और गंभीरता से काम करना चाहिए।
उन्होंने सुझाव दिया कि आवश्यकता पड़ने पर विश्वविद्यालयों, निजी क्षेत्र, नागरिक समाज और मित्र देशों के विशेषज्ञों तथा आधुनिक तकनीक का तत्काल उपयोग किया जाए।
पार्टी की मुख्य सचेतक क्रान्तिशिखा धिताल ने बताया कि अध्यक्ष के निर्देश के बाद अधिकांश सांसद प्रभावित क्षेत्रों से लौट चुके हैं और अब केवल स्थानीय सांसद तथा आवश्यक तकनीकी टीमें ही राहत और बचाव कार्य में लगी हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल हुए सांसदों के वीडियो
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचे कुछ सांसदों के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए हैं।
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रास्वपा सांसद ज्वाला संग्रौला का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें दलदली कीचड़ में चलने में कठिनाई होने पर उन्हें अन्य लोग सहारा देकर आगे ले जाते दिखाई देते हैं।
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धादिङ-1 से सांसद आशिका तामाङ का वीडियो भी चर्चा में रहा, जिसमें वे राहत वितरण में देरी को लेकर एक वार्ड अध्यक्ष को फटकार लगाती नजर आती हैं।
इन घटनाओं के बाद सांसदों की भूमिका और आपदा प्रबंधन में राजनीतिक हस्तक्षेप पर व्यापक बहस छिड़ गई।
मंत्री भी सवालों के घेरे में
भौतिक अवसंरचना मंत्री सुनिल लम्साल ने भी सवाल उठाया कि आपदा के समय स्थानीय निकाय, पालिकाएं, प्रदेश सरकार, जिला प्रशासन और राष्ट्रीय आपदा प्राधिकरण स्वतः सक्रिय क्यों नहीं हुए।
वहीं गृह मंत्री सुधन गुरुङ की कार्यशैली को लेकर भी आलोचना हुई कि आपदा प्रबंधन में आवश्यक नीति, योजना और समन्वय समय पर प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो सके।
स्थानीय सरकारों का बचाव
क्रान्तिशिखा धिताल ने सोशल मीडिया पर लिखा कि काठमांडू में बैठकर स्थानीय सरकारों पर निष्क्रियता का आरोप लगाना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि स्थानीय निकाय स्वयं भी इस आपदा के पीड़ित हैं—उनके अपने शहर, घर और संसाधन बाढ़ में तबाह हुए हैं। ऐसे में उनसे पूरी क्षमता के साथ तत्काल निर्णय लेने और सभी को संभालने की अपेक्षा करना न्यायसंगत नहीं है।
राजनीतिक संदेश
भोटेकोशी बाढ़ पर संसद की बहस ने राहत और बचाव कार्यों से आगे बढ़कर नेपाल में आपदा प्रबंधन, केंद्र-प्रदेश समन्वय और नेताओं की जमीनी भूमिका पर गंभीर राजनीतिक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। विपक्ष सरकार पर प्रचार में अधिक और राहत कार्य में कम सक्रिय रहने का आरोप लगा रहा है, जबकि सत्तारूढ़ दल के भीतर भी आत्ममंथन और सुधार की मांग तेज हो गई है।


