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सरकार की विफलता और अंतरिम सरकार का इतिहास : श्वेता दीप्ति

डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय हिमालिनी अंक दिसम्बर।

नेपाल में अंतरिम सरकार का इतिहास लम्बी अवधि का रहा है । साल १९९६ से २००६ तक नेपाल गृह–युद्ध और राजशाही बनाम लोकतंत्र संघर्ष से गुजरता रहा । साल २००६ में व्यापक जनांदोलन हुआ जिसके चलते राजा ज्ञानेन्द्र को सत्ता जनता को सौंपनी पड़ी । साल २००७ में अंतरिम संविधान लागू हुआ । इसमें तय था कि संविधान सभा का चुनाव होगा और वही नया संविधान बनाएगी । साल २००८ में चुनाव हुए और संविधान सभा ने कार्य शुरू किया । लेकिन राजनीतिक दलों के बीच असहमति–संघीय ढांचा, धर्मनिरपेक्षता, जातीय प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों के चलते प्रक्रिया लंबी हो गई ।

एक बार फिर संविधान सभा की मियाद खत्म हुई, नई सभा चुनी गई, लेकिन समयसीमा फिर पार हो गई । इस अवधि में कई अंतरिम सरकारें बनीं, माओवादी नेता प्रचंड, फिर माधव कुमार नेपाल, झलनाथ खनाल और बाबूराम भट्टराई आदि ने देश का नेतृत्व किया ।

साल २०१५ में विनाशकारी भूकंप के दौरान राजनीतिक दलों ने अंततः सहमति बनाई । २० सितंबर २०१५ को नया संविधान लागू हुआ । इस प्रकार नेपाल में लगभग नौ वर्षों तक अंतरिम सरकार और संविधान व्यवस्था चली, जो विश्व में असामान्य रूप से सबसे लंबी अवधि तक रही ।
वर्तमान में जेनजी आन्दोलन के बाद सुशीला कार्की ने देश का नेतृत्व संभाला है । जिस समय कार्की को प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी मिली, वह समय देश के लिए बहुत ही संवेदनशील था । ऐसे में प्रधानमंत्री के लिए एक अन्तरिम सरकार के रूप में देश की अवस्था को संभालना निश्चय ही चुनौतीपूर्ण था । किन्तु जनता की उम्मीदें उनसे जुड़ी हुई थीं । परन्तु इन तीन महीनों में जिस तरह उनके उठाए गए कदम और निर्णय पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं और उनके लिए गए निर्णय को सर्वोच्च अदालत के द्वारा रोका जा रहा है या रद्द किया जा रहा है, वह अत्यन्त ही निराशाजनक है और प्रधानमंत्री की कार्यशैली पर भी प्रश्नचिह्न लग रहा है और यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि प्रधानमंत्री की कार्यशैली बदले की भावना से ओतप्रोत है ।

प्रधानमंत्री द्वारा लिए गए विभिन्न देश के राजदूतों का वापस बुलाने का निर्णय भूमिसम्बन्धी आयोग खारिज करने का निर्णय, नेपाल विद्युत् प्राधिकरण के कार्यकारी निर्देशक हितेन्द्रदेव शाक्य को हटाने का निर्णय इन सभी पर सर्वोच्च अदालत ने रोक लगाया है । विश्लेषकों का मानना है कि एक अंतरिम सरकार को ऐसे किसी भी निर्णय को लेने का अधिकार नहीं है । अंतरिम सरकार का पहला और महत्त्वपूर्ण कार्य जल्द से जल्द निर्वाचन कराना है । वैसे निर्वाचन समय पर कराने के लिए प्रधानमंत्री पूरी कोशिश कर रही हैं । परन्तु तैयारी में अभी भी कमी नजर आ रही है ।

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लेकिन अपने इस तीन महीने के कार्यकाल में सरकार ने जो भी निर्णय लेने की कोशिश की है उस पर सवाल उठते आ रहे हैं और सरकार की विफलता भी नजर आ रही है । सरकार ने विभिन्न संवैधानिक आयोग के पदाधिकारी नियुक्त करने के उद्देश्य से संवैधानिक परिषद् सम्बन्धी अध्यादेश जारी करने की कोशिश की परन्तु राष्ट्रपति द्वारा उसे रोक दिया गया । संवैधानिक परिषद् सम्बन्धी अध्यादेश में सरकार संसदीय सुनवाई के बिना संवैधानिक आयोग के पदाधिकारी नियुक्त करना और नियुक्ति के बाद प्रतिनिधिसभा के निर्वाचन पश्चात् सुनवाई करने का प्रावधान होने के कारण राष्ट्रपति कार्यालय ने इसे रोक दिया है । संविधान द्वारा निश्चित किए गए गणपूरक संख्या को अध्यादेश से संशोधन नहीं किया जा सकता है । किन्तु, प्रधानमन्त्री कार्की नेतृत्व के सरकार ने ऐसा करने की कोशिश की । सरकार ने सामान्य बहुमत के आधार में संवैधानिक आयोग के पदाधिकारी नियुक्ति का प्रावधान लाने की कोशिश की थी किन्तु यह भी नहीं हो सका । ये सारी परिस्थितियाँ प्रधानमंत्री की नैतिकता पर भी सवाल उठा रहे हैं । देश बहुत ही नाजुक दौर से गुजर रहा है । आगे भी किसी क्रांतिकारी परिवर्तन की संभावना नजर नहीं आ रही परन्तु एक आशाजनक परिणाम का उम्मीद नेपाल की जनता अवश्य कर रही है ।

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डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक, हिमालिनी ।
काठमांडू, नेपाल ।

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