सत्ताधारी हर नेता का बयान नेपाल–भारत के सम्बन्धों में खाई ही पैदा कर रही है : श्वेता दीप्ति
देश प्राकृतिक आपदा, वैश्विक महामारी के साथ अदूरदर्शिता का भी शिकार हो रहा है ।
डा. श्वेता दीप्ति (सम्पादकीय-हिमालिनी) अंक जुलाई 2020 । राजनीतिक उथल–पुथल के बीच यह देश कुछ अजीब से हालात से गुजर रहा है । शीर्ष की अक्षमता कई विषयों पर साफ नजर आ रही है पर सभी लाचार हैं । देश का मजाक बाहर नहीं बल्कि देश में भी मजे से उड़ाया जा रहा है । यूँ तो हमारे प्रधानमंत्री मुहावरों और बेतुके वक्तव्यों के लिए शुरु से ही प्रसिद्ध रहे हैं । पर पहले ये वक्तव्य देश के भीतर तक ही सीमित था, पर आजकल तो उनका वक्तव्य अन्तर्राष्ट्रीय हो गया है ।

सम्पादक, हिमालिनी । पूर्व अध्यक्ष- केन्द्रीय हिंदी विभाग, त्रिविवि ।
देश में आपके मुहावरों से मनोरंजन होता है, पर विदेश में यह क्षमता और विद्वता की कसौटी पर कसा जा रहा है कि बोलने वाला किस मानसिकता का है । कभी कोरोना जैसी महामारी से छुटकारा के लिए अटपटा बयान, तो कभी यह कहना कि भारत से आया हुआ कोरोना ज्यादा खतरनाक है, कभी भारत के राष्ट्रचिन्ह पर व्यंग्य, कभी खुद को हटाए जाने की माँग पर खुलेआम भारत पर आरोप, कुर्सी बचाने के लिए बिना किसी विमर्श के अदूरदर्शिता के साथ नए नक्शे को पास कर के प्रमाण जुटाने की कवायद और अब जाकर भानु जयंती के अवसर पर यह भाषण देना कि भारत का अयोध्या नकली है, सीता भारत में ब्याही नहीं गई और राम भारत के हैं ही नहीं । इन सारे वक्तव्यों और कार्यशैली में क्या एक दूरदर्शी, सक्षम, बौद्धिक व्यक्तित्व की छाप नजर आती है ?
देश के शीर्ष पद पर आसीन व्यक्ति की भाषा क्या इतनी हल्की होनी चाहिए ? आखिर इन सबकी वजह क्या है । एक ओर जहाँ भारतीय मीडिया कोई मौका नहीं छोड़ रही है नेपाल के समाचारों को चीरफाड़ करने में वहीं एक बार फिर अयोध्या के विषय पर यह कहना कि भारत ने नेपाल का साँस्कृतिक दोहन किया है फिर से उन्हें चर्चा में ला दिया है ।
ये ठीक है कि नेपाल ने भारतीय मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिसे सही कह सकते हैं, पर यह भी सच है कि हम नहीं देख रहे परन्तु उसी मीडिया को पूरा विश्व देखता है, ऐसे में अगर भारत सरकार किसी आपत्तिजनक प्रसारित सामग्री हटा भी दे तो, हमारे प्रधानमंत्री के जो रोज अजूबे बयान आ रहे हैं, उनका क्या किया जाय ? ये तो बस वैसी बात हुई कि आप कुछ भी बोलें और जब उसे भारतीय मीडिया उछाले तो आप नेपाली जनता की सहानुभूति बटोर लें क्योंकि ये तो वो जनता है जो राष्ट्रवाद के नाम पर आपके पीछे चल ही देगी चाहे मसला कुछ भी हो । बहरहाल सत्ताधारी हर नेता का बयान नेपाल–भारत के सम्बन्धों में खाई ही पैदा कर रही है ।
यह या तो सोची समझी नीति के तहत हो रहा है, या जनता का ध्यान खास मुद्दों से हटाने के लिए किया जा रहा है क्योंकि, यह सर्वविदित है कि यहाँ का खास तबका भारत के मसले पर विरोध में ही खड़ा रहता है,जनता भावुक होती है पर सत्ता व्यवहारिक नीति से चलती है ऐसे में क्या सरकार की विदेश नीति सफल कही जा सकती है ? बहरहाल तो सिर्फ यह कहा जा सकता है कि, देश प्राकृतिक आपदा, वैश्विक महामारी के साथ अदूरदर्शिता का भी शिकार हो रहा है ।

