काल का क्रुर कुचक्र या मानवजनित भूल ?: श्वेता दीप्ति
डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय हिमालिनी अंक फरवरी । १५ जनवरी की सुबह नेपाल के लिए काला दिन साबित हुआ । काठमान्डू एयरपोर्ट से पोखरा के लिए रवाना हुए यति एयरलाइंस के दुर्घटनाग्रस्त होने के साथ ही देश ही नहीं विदेश में भी लोग सन्नाटे में रह गए । सभी सकते में थे, दस सेकेंड और मौत की तस्वीरें दिल दहलाने के लिए काफी थीं । नेपाल में पिछले कई सालों में हवाई दुर्घटना की वजह से सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी हैं । पिछले ७० सालों में ९६ हवाई दुर्घटनाएं हुई हैं । यह आँकड़ा मन विचलित करता है । ९५ फीसदी दुर्घटना में तकनीकी खराबी को कारण बताया जाता है, लेकिन वह तकनीकी खराबी क्या है इसका खुलासा कभी नहीं हो पाता । १९४६ से आज तक नेपाल में हुए विमान हादसों में अब तक ८०० से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है । ७ मई १९४६ को पहला विमान हादसा ब्रिटेन के रॉयल फोर्स का हुआ था जिसमें १४ सैनिकों की जान चली गई थी ।
नेपाल विमान उड़ाने के मामले में दुनिया के सबसे मुश्किल देशों में से एक माना जाता है । यह अपनी खÞूबसूरती के साथ–साथ दुनिया के सबसे खÞतरनाक एयरपोर्ट्स के लिए भी जाना जाता है । यहाँ कई ऐसे एयरपोर्ट्स हैं जहां लैंडिंग के दौरान यात्रियों की सांसे थम जाती हैं । अत्यधिक उंचाई पर स्थित होने की वजह से इन्हें बेहद खÞतरनाक माना जाता है । नेपाल के लुकला एयरपोर्ट (तेंजिंग हिलेरी एयरपोर्ट) को दुनिया का सबसे खÞतरनाक एयरपोर्ट माना जाता है । इसके रनवे के आसपास ६०० मीटर की गहरी खाई है ।
विश्लेषक नेपाल में विमान हादसे के कई कारणों की चर्चा करते हैं । यहाँ की भौगोलिक स्थिति और यहाँ का बदलता हुआ मौसम कारण बनता है, जिसकी वजह से अनुभवी पायलटों को भी विमान उड़ाने में परेशानी होती है । नेपाल की नागरिक उड्डयन प्राधिकरण की २०१९ की एयर सिक्योरिटी रिपोर्ट के मुताबिकÞ, नेपाल में मौसम पैटर्न की विविधता विमान संचालन के लिए सबसे बड़ी चुनौती में से एक है । मौसम की स्थिति खÞराब होने पर नेपाल के एयरपोर्ट्स से उड़ान भरना और लैंडिंग करना बेहद खÞतरनाक साबित होता है । अधिकांश पायलटों का कहना है कि खड़ी और संकरी हवाई पट्टी होने के कारण यहां विमान को नेविगेट करना बेहद मुश्किल होता है । यहां छोटे विमानों की लैंडिंग तो हो जाती है, लेकिन बड़े जेटलाइनर्स की लैंडिंग बेहद खÞतरनाक हो जाती है । हालांकि, नेपाल में अब तक जितने भी बड़े विमान हादसे हुये हैं वो छोटे विमान ही थे । इसके अलावा अधिकतर एयरपोर्ट्स पर रनवे की लंबाई कम होना भी हादसे का प्रमुख कारण बन रहा है । रनवे के एक तरफÞ पहाड़ और दूसरी तरफÞ खाई होने की वजह से लैंडिंग और टेक ऑफÞ में खÞासी दिक्कÞतें होती हैं । इसी के चलते इन क्षेत्रों में केवल अनुभवी और उच्च योग्यता वाले पायलटों को उड़ान की अनुमति दी जाती है । इसके अलावों नए विमानों के लिए बुनियादी ढांचे की भी कमी है ।
इन कारणों के अतिरिक्त विमान हादसों की सबसे बड़ी वजह इस्तेमाल हो रहे पुराने विमानों को बताया जा रहा है । देश में आज भी ४३ साल पुराने ‘स्टोल विमान’ उड़ाए जा रहे हैं । इन विमानों में मौसम बताने वाले आधुनिक रडार नहीं होते हैं । तकनीक के अभाव में स्टोल विमानों को नेपाल जैसी जगह पर उड़ना खÞतरनाक हो सकता है । इन विमानों में मौसम का सटीक पूर्वानुमान लगाने और आधुनिक उपकरणों का अभाव है । इसलिए देश को इस विषय पर आवश्यक संज्ञान लेने की आवश्यकता है । ताकि मौत के इन आँकड़ों में और संख्या न जुड़े ।
साल २०१३ में यूरोपीय संघ ने सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए नेपाल की सभी एयरलाइनों को अपने हवाई क्षेत्र में उड़ान भरने पर प्रतिबंध लगा दिया था । इसके अलावा यूरोपीय कमीशन ने भी नेपाली एयरलाइंस पर २८ देशों की उड़ान भरने पर प्रतिबंध लगाया था । एक रिपोर्ट के मुताबिकÞ, नेपाल सरकार की विफÞलता के कारण देश के विमान यूरोपीय संघ की ब्लैकलिस्ट से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं ।
२०२३ का पहला महीना देश ही नहीं विदेशों के लिए भी अच्छा नहीं रहा । देश में विमान दुर्घटना और फिर तुर्की और सीरिया में हुए महाविनाश ने सभी को झकझोर दिया है । तबाही की यह तस्वीर इंसानी भूल को भी बताती है । काश कि हम इन तस्वीरों को बदल सकते । सभी दिवंगत आत्मा को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि ।

