सुख से अधिक दुख की छाप ही नजर आती है : श्वेता दीप्ति
डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय, हिमालिनी अंक ऑक्टोबर 024 ।
समय से सीखना आज की आवश्यकता
वर्तमान समय में अगर हम आधुनिक परिवेश के परिप्रेक्ष्य में मानव जीवन के विषय में मंथन करें तो यह स्पष्ट पता चलता है कि आज के समय में मनुष्य का जीवन अत्यन्त जटिल हो गया है । मानव उस दोराहे पर खड़ा है, जहाँ उसे जीवन की सभी सुख सुविधाएँ भी चाहिए और सुकून भी चाहिए । सुख तो हासिल हो रहा है किन्तु सुकून नहीं मिल रहा । आधुनिकता की दौड़ में हम आगे रहना चाहते हैं और इसके लिए कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार भी हैं । किन्तु मनुष्य की इसी चाहत ने सृष्टि को विनाश की कगार पर खड़ा कर दिया है । यह सिर्फ किसी एक देश या क्षेत्र की बात नहीं है । सम्पूर्ण विश्व इस बात से जूझ रहा है । सृष्टि विनाशकारी हो रही है और अनेक देश युद्ध के जरिए मानव जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं । कहीं भी नजर डालिए सुख से अधिक दुख की छाप ही अधिक नजर आती है ।
किन्तु इसी विषम परिस्थिति में हम जीने के लिए कुछ बहाना भी ढूंढ लेते हैं । यह बहाना हमें हमारी संस्कृति और परम्पराएँ देती हैं । वैसे तो एक सच्चाई यह भी है कि जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करते–करते मनुष्य अपनी संस्कृति को भी भूलता जा रहा है । बावजूद इसके कुछ लोग हैं जो संघर्षमय संसार की कटु स्मृतियों को क्षण–भर के लिए विस्मृत कर त्योहार मनाते हैं । ये त्योहार हमारे जीवन में बदलाव लाते हैं । ये हमें हमारी संस्कृति से जोड़ते हैं । परिवर्तनशीलता मानव का सहज स्वभाव है उसी में एक आकर्षण होता है । त्योहार जीवन में नवीनता लाते हैं । आज यदि हम इस तथ्य पर विचार करें तो पाते हैं कि त्योहारों के प्रति मनुष्य का वह उल्लास आज कम हो गया है । उसका कारण है आज मनुष्य मन से प्रसन्न नहीं है । इसके कई कारण हैं । त्योहार परिजनों से होता है और जब यही आपके करीब नहीं होते तो त्योहारों का कोई अर्थ नहीं रह जाता है । बच्चों की दूरी, मंहगाई और प्रकृति प्रदत्त दुख ने हमारे अंदर के उत्साह को कम कर दिया है ।
देश में कई हिस्से और परिवार ऐसे हैं जो बाढ़ और भूस्खलन में अपनों के खोने के दर्द और बरबादी से जूझ रहे हैं । छत नहीं, भोजन नहीं, अपने नहीं ऐसे में किसी भी त्योहार का क्या महत्त्व रह जाता है ? ऐसे में त्योहार के उमंग का फीका होना स्वाभाविक है । सरकार की योजनाओं का कभी भी द्रुत गति से कार्यान्वयन नहीं हुआ है । बैठकों और विचार विमर्श में उलझी सरकार अपनी मंथर गति में ही आगे बढ़ रही है ।
एक सर्वेक्षण के आधार पर दुनिया में नेपाल जलवायु परिवर्तन के खतरे के मामले में चौथे स्थान पर, भूकंप के खतरे के मामले में ११वें, बहु–आपदा जोखिम के मामले में २०वें, बाढ़ और भूस्खलन के मामले में ३०वें और सड़क दुर्घटनाओं के मामले में ५०वें स्थान पर है । किन्तु आपदा प्रबंधन में राज्य की दीर्घकालिक सोच और तैयारियों की कमी के कारण सैकड़ों नेपालियों को असमय अपनी जान गंवानी पड़ती है । सरकार के नीति और नियम सभी भगवान भरोसे हैं । विपदा अनायास ही आती है, परन्तु इससे निबटने की तैयारी पहले से होनी चाहिए । अगर आज ऐसा हुआ होता तो शायद विध्वंश का आँकड़ा कुछ कम होता ।
किन्तु निराशा के क्षण में भी आशा की ज्योति जलाए रखनी पड़ती है । ये महीना त्योहारों का है । माँ कल्याणी विश्व कल्याण करें, लक्ष्मी का आशीर्वाद मिले और सूर्य हम सबको उर्जा प्रदान करे । दुर्गापूजा, दीपावली और महापर्व छठ की अनेक मंगलकामनाएं ।

सम्पादक, हिमालिनी

