नारी तू नारायणी : डा श्वेता दीप्ति

शक्ति की पूजन का पवित्र महीना आश्विन, जब सारा हिन्दू समाज माँ दुर्गा की आराधना के लिए तत्पर रहता है । ऐसे में हम अपने समाज को ही लेकर कई सवालों के घेरे में बंध जाते हैं । जिनके संस्कारों में नारी की पूजा करने की बात कही जाती है, वहीं नारी की अवहेलना, उपेक्षा और शोषण के किस्से आज आम सी बातें हो गई हैं । यह सदियों से चल रहा है और इसी के प्रतिरोध में स्त्री ने यह ठानी कि वह खुद को स्थापित करेंगी । किन्तु आज विडम्बना यह कि नारी ने ही अपने आपको तमाशा बना रखा है । लज्जा, शील, धैर्य, शालीनता यह सारे शब्द आज शब्दकोश की शोभा बढ़ा रहे हैं । नारी सशक्तिकरण के नाम पर जो फूहड़ता, अश्लीलता और निरकुंशता आज हमारे समक्ष है वह निःसन्देह चिन्ताजनक है । हमने सशक्तिकरण की बात इसलिए की थी कि, हमें हमारी पहचान मिले, हमारे अस्तित्व को आधार मिले । हमारी क्षमता को पहचाना जाए ।
हम घर की दीवारों के बाहर भी अपना स्थान कायम करें । किन्तु आज जो दिख रहा है उसने नारी जाति को शर्मशार ही किया है । अद्र्धनग्न शरीर, पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण, पुरुषों के साथ कदम मिला कर चलने की होड़ में स्वयं को दाँव पर लगा देना और बाद में नारी होने का दम भर कर पुरुषों को कानून के सीखचों के पीछे पहुँचा कर दम्भ भरना, यह सब हर जगह दिखने को मिल रहा है । क्या है यह ? हम किस दिशा में जा रहे हैं ? क्या इसी पहचान की अपेक्षा थी हमें ? हमने कहा हमें देवी नहीं, इंसान रहने दो । किन्तु आज ना तो हम देवी बनने की अवस्था में हैं और ना ही एक सभ्य समाज का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता रख रहे हैं । हमारी मान्यताएँ, हमारे मूल्य सभी खोखली चकाचौंध पर हमने निछावर कर दिया है । त्योहार तमाशा बन गया, आस्था और व्रत के नाम पर भजन नहीं टिकटॉक में हमारा मन रमता है, क्या यही हमारी संस्कृति है ? हम जो परोस रहे हैं, वही हमारी पीढ़ी हमसे ले रही है । बहुत कुछ अच्छे रूप में बदला, जिसे हमने पाया और जिसने हमें बाहर की दुनिया से परिचित करवाया । किन्तु उससे अधिक हम खो चुके हैं । रिश्तों की परिभाषा, परिवार की अवधारणा, मूल्यों का अवमूल्यन, संस्कृति का ¥हास, यह सब आज समाप्त हो रहा है । बहुत आवश्यक है कि हम चिन्तन करें । धर्म (आचार संहिता) की स्थापना भले ही आचार्यों ने की, पर उसे संभाले रखना और बच्चों में उसके संस्कारों का सिंचन करना, इन सबका श्रेय नारी को जाता है ।
“नारी अस्य समाजस्य कुशलवास्तुकारा अस्ति” अर्थात्, नारी समाज की आदर्श शिल्पकार होती है । यानि हम में समाज को गढ़ने की क्षमता है । हम उसे परिष्कृत रूप दे सकते हैं किन्तु अगर हमारा व्यक्तित्व ही अनगढ़ हो जाए, तो हम किसी का आकार क्या निर्माण करेंगे ? चिन्तन करें, मनन करें और प्रण करें, ‘हमें मान बनना है, अपमान नहीं’ ।
वैश्विक परिदृश्य पूरी तरह से अस्त–व्यस्त है । युद्ध, अकाल, बाढ़, बीमारी प्राृतिक आपदाओं से जूझ रहा है । ऐसे में माँ कल्याणी से विश्व कल्याण की प्रार्थना है —
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोखिलस्य ।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ।।
बड़ा दशहरा की अनेक शुभकामनाएँ ।
– सम्पादकीय (हिमालिनी, सितम्बर २०२२)

