प्रकृति का प्रहार और दक्षिण एशिया के भविष्य पर मंडराता जल संकट! : डॉ.श्वेता दीप्ति
डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी आवरण, अंक सितंबर। भाद्र १० गते की सुबह नेपाल के इतिहास में लंबे समय तक दर्ज रहेगी । रसुवा जिले की भोटेकोशी घाटी में लोग रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त थे । आसमान में कहीं भारी बारिश नहीं थी, लेकिन कुछ ही क्षणों में नदी का रंग बदल गया । शांत बहती भोटेकोशी देखते–ही–देखते उफनते जलराक्षस में बदल गई । विशाल चट्टानें, पेड़, मिट्टी और पानी का अनियंत्रित सैलाब पुलों, घरों, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं को निगलता हुआ त्रिशूली की ओर बढ़ गया ।
भीषण बाढ़ ने पूरे देश को झकझोर दिया है । बिना लगातार बारिश के अचानक आई इस प्रलयंकारी बाढ़ ने पुल, सड़कें, जलविद्युत परियोजनाएँ, बस्तियाँ और मानव जीवन सब कुछ अपने साथ बहा दिया । कई लोग लापता हुए, हजारों परिवार विस्थापित हुए और नेपाल–चीन सीमा से लेकर त्रिशूली घाटी तक तबाही का मंजर दिखाई दिया ।
लोगों को समझने का भी समय नहीं मिला कि आखिर यह बाढ़ आई कहाँ से । जिन इलाकों में बारिश तक नहीं हुई थी, वहाँ इतनी विनाशकारी बाढ़ कैसे आ सकती है ? यही प्रश्न आज नेपाल ही नहीं, पूरे हिमालयी क्षेत्र के सामने खड़ा है ।
प्रारंभिक उपग्रह चित्रों और भू–वैज्ञानिक विश्लेषणों ने संकेत दिया कि तिब्बत में स्थित ल्हेंदे नदी पर हिमस्खलन और मलबे ने नदी का प्रवाह रोक दिया था । कुछ समय तक पानी जमा रहा और फिर प्राकृतिक अवरोध टूटते ही लाखों घनमीटर पानी नेपाल की ओर उमड़ पड़ा । यही था रसुवा की महाप्रलय का प्रारंभ ।
जब प्रकृति चेतावनी देती है
रसुवा की बाढ़ हमें बताती है कि हिमालय अब पहले जैसा नहीं रहा । सदियों से जमी बर्फ तेजी से पिघल रही है । ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं और उनके सामने नई–नई झीलें बन रही हैं । वैज्ञानिक इन्हें ग्लेशियल लेक आउटबस्र्ट फ्लड का सबसे बड़ा कारण मानते हैं ।
हिमालय को दुनिया का तीसरा ध्रुव कहा जाता है । एशिया की दस बड़ी नदियाँ यहीं से निकलती हैं । यही पर्वत भारत, नेपाल, चीन, भूटान और बांग्लादेश की करोड़ों आबादी के लिए जल का सबसे बड़ा स्रोत है । लेकिन जलवायु परिवर्तन ने इस पूरे क्षेत्र का संतुलन बदल दिया है ।
आज हिमालय में बर्फ पहले से तेजी से पिघल रही है । गर्मियों में बनने वाली झीलें बड़ी होती जा रही हैं । भूकंप, हिमस्खलन या चट्टानों के गिरने से यदि इनमें से कोई झील टूटती है, तो नीचे बसे शहरों और गांवों के पास बचने का समय लगभग नहीं होता । रसुवा की त्रासदी इसी बदलते हिमालय की पहली नहीं, बल्कि सबसे गंभीर चेतावनियों में से एक है ।
भोटेकोशी से उठता एक बड़ा सवाल
रसुवा की बाढ़ के बाद एक प्रश्न अचानक अंतरराष्ट्रीय चर्चा में आ गया–यदि प्राकृतिक अवरोध टूटने से इतनी तबाही हो सकती है, तो मानव निर्मित विशाल बांधों का क्या होगा ?
यह प्रश्न सीधे चीन की उस महत्वाकांक्षी परियोजना तक पहुँचता है, जो तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाई जा रही है ।
चीन का ‘सुपर डैम’ ः ऊर्जा या रणनीति ?
चीन ने दिसंबर २०२४ में यारलुंग त्सांगपो (मेडोग) हाइड्रोपावर परियोजना को मंजूरी दी । लगभग ६० गीगावाट क्षमता वाली यह परियोजना दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना मानी जा रही है ।
यह बांध तिब्बत के उस क्षेत्र में प्रस्तावित है जहाँ ब्रह्मपुत्र नदी एक विशाल मोड़ लेकर भारत के अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है । यही इलाका भूगर्भीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और दुनिया की सबसे गहरी नदी घाटियों में से एक है ।
चीन का तर्क स्पष्ट है–कोयले पर निर्भरता घटानी है और स्वच्छ ऊर्जा बढ़ानी है । लेकिन पड़ोसी देशों की चिंता भी उतनी ही स्पष्ट है–इतनी विशाल नदी पर नियंत्रण का अधिकार एक देश के हाथ में केंद्रित हो जाएगा ।
ब्रह्मपुत्र ः केवल नदी नहीं, करोड़ों लोगों की जीवनरेखा
तिब्बत में इसे यारलुंग त्सांगपो, अरुणाचल प्रदेश में सियांग, असम में ब्रह्मपुत्र और बांग्लादेश में जमुना कहा जाता है । यह नदी लगभग तीन हजार किलोमीटर की यात्रा करती है और दक्षिण एशिया की सबसे समृद्ध नदी प्रणालियों में से एक है । इसकी घाटी में करोड़ों लोग रहते हैं । खेती, मत्स्य पालन, पेयजल, जैव विविधता और संस्कृति–सब कुछ इसी नदी से जुड़ा है ।
यही कारण है कि ब्रह्मपुत्र पर बनने वाला कोई भी विशाल बांध केवल चीन की परियोजना नहीं रह जाता; उसका प्रभाव पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ सकता है ।
पानी पर नियंत्रण
यदि विशाल जलाशय बनता है तो नदी के प्रवाह को नियंत्रित करने की क्षमता भी बढ़ेगी । मानसून में अचानक अधिक पानी छोड़े जाने या सूखे के समय पानी रोके जाने की आशंका भारत और बांग्लादेश समय–समय पर व्यक्त करते रहे हैं ।
हालाँकि चीन का कहना है कि परियोजना मुख्यतः बिजली उत्पादन के लिए है, फिर भी सीमा–पार नदियों पर पारदर्शिता की कमी चिंता को बढ़ाती है ।
भूकंप का खतरा
पूरा पूर्वी हिमालय भूकंपीय दृष्टि से अत्यंत सक्रिय क्षेत्र है । यहाँ सक्रिय फॉल्ट लाइनें मौजूद हैं । बड़े भूकंप, भूस्खलन और हिमस्खलन सामान्य भूगर्भीय घटनाएँ हैं ।
ऐसे क्षेत्र में विश्व की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना का निर्माण वैज्ञानिकों के बीच बहस का विषय बना हुआ है ।
जलवायु परिवर्तन
जलवायु परिवर्तन हिमालय में चरम घटनाओं की आवृत्ति बढ़ा रहा है । यदि भविष्य में बड़े हिमस्खलन, ग्लेशियर टूटने या अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाएँ बढ़ती हैं तो बड़े बांधों की सुरक्षा और संचालन और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा ।
क्या रसुवा जैसी महाप्रलय ब्रह्मपुत्र में भी संभव है ?
इस प्रश्न का उत्तर भावनाओं से नहीं, विज्ञान से देना होगा । रसुवा की घटना प्राकृतिक झील के टूटने से हुई । मेडोग परियोजना इंजीनियरिंग मानकों के साथ निर्मित मानव निर्मित बांध होगी । इसलिए दोनों स्थितियाँ समान नहीं हैं । लेकिन रसुवा ने यह अवश्य दिखाया कि हिमालय में अचानक आने वाली जल आपदाएँ वास्तविक हैं । यदि किसी बड़े बांध के ऊपर या आसपास ऐसी चरम प्राकृतिक घटना घटती है तो उसके प्रभाव का दायरा बहुत व्यापक हो सकता है । यही संभावना वैज्ञानिक अध्ययन का विषय है ।
सबसे अधिक खतरा किन क्षेत्रों को ?
यदि ब्रह्मपुत्र घाटी में कभी असाधारण जलप्रवाह उत्पन्न होता है तो सबसे पहले इसका प्रभाव अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों–गेलिंग, टुटिंग और यिंगक्योंग–पर पड़ सकता है ।
इसके बाद सियांग नदी असम में प्रवेश करती है और दिबांग तथा लोहित से मिलकर ब्रह्मपुत्र बन जाती है । धेमाजी, लखीमपुर, डिब्रुगढ़, माजुली, जोरहाट, सोनितपुर और गुवाहाटी जैसे निचले क्षेत्र पहले से ही हर वर्ष बाढ़ झेलते हैं । ऐसी स्थिति में अतिरिक्त जलप्रवाह विनाश को कई गुना बढ़ा सकता है । अंततः इसका असर बांग्लादेश के विशाल डेल्टा तक पहुँच सकता है ।
नेपाल के लिए सबसे बड़ा सबक
रसुवा की बाढ़ ने नेपाल को कई कठोर सबक दिए हैं । पहला–हिमालयी आपदाएँ अब केवल मानसून तक सीमित नहीं हैं । दूसरा–जलविद्युत परियोजनाओं की योजना बनाते समय केवल नदी नहीं, पूरे जलग्रहण क्षेत्र का वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक है । तीसरा–ऊपरी क्षेत्रों की रियल–टाइम निगरानी और समय पर चेतावनी प्रणाली अब विलासिता नहीं, आवश्यकता है । चौथा–सीमा–पार नदियों पर डेटा साझा किए बिना भविष्य की आपदाओं का सामना करना कठिन होगा ।
क्या समाधान केवल तकनीक है ?
नहीं । हिमालय की नदियाँ किसी एक देश की नहीं हैं । चीन, नेपाल, भारत और बांग्लादेश–चारों देशों का भविष्य इन जलधाराओं से जुड़ा है । इसलिए समाधान भी साझा होना चाहिए । ग्लेशियरों की संयुक्त निगरानी । उपग्रह डेटा का आदान–प्रदान । सीमा–पार बाढ़ चेतावनी प्रणाली । जलविद्युत परियोजनाओं की पारदर्शिता । जलवायु परिवर्तन पर क्षेत्रीय सहयोग । यही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है ।
रसुवा की महाप्रलय केवल एक जिले की त्रासदी नहीं थी; उसने हिमालय के बदलते भूगोल और जलवायु का भयावह चेहरा सामने ला दिया । यह घटना बताती है कि आने वाले वर्षों में हिमालयी क्षेत्र में जल आपदाएँ अधिक तीव्र, अधिक अचानक और अधिक विनाशकारी हो सकती हैं ।
चीन का सुपर डैम ऊर्जा विकास की महत्वाकांक्षा का प्रतीक है, लेकिन उसके साथ जुड़े पर्यावरणीय, भूकंपीय और भू–राजनीतिक प्रश्न भी उतने ही बड़े हैं । यह कहना सही नहीं होगा कि यह बांध निश्चित रूप से महाप्रलय लाएगा, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी विशाल जल परियोजना के प्रभाव सीमाओं से कहीं आगे तक जाते हैं ।
रसुवा हमें चेतावनी देता है–हिमालय को केवल संसाधन नहीं, जीवनरेखा समझना होगा । क्योंकि यदि हिमालय असंतुलित हुआ, तो उसकी गूँज केवल नेपाल में नहीं, पूरे दक्षिण एशिया में सुनाई देगी । रसुवा में भोटेकोशी नदी का अचानक उग्र हो उठना केवल एक प्राकृतिक आपदा की खबर नहीं है; यह मनुष्य और प्रकृति के बीच बिगड़ते संबंध पर एक गंभीर चेतावनी भी है । नदी वही है, पहाड़ वही हैं, घाटियाँ वही हैं–लेकिन प्रकृति का संतुलन जिस तेजी से बदल रहा है, उसने इन परिचित भू–दृश्यों को अचानक भयावह बना दिया है ।
प्रकृति पर प्रहार का उत्तर प्रकृति ही देती है रसुवा की बाढ़ हमें डराने नहीं, जगाने आई है । हमें यह समझना होगा कि पहाड़ केवल पत्थर नहीं हैं, नदियाँ केवल पानी नहीं हैं और जंगल केवल लकड़ी नहीं हैं । ये सब मिलकर एक ऐसा जीवंत पारिस्थितिक तंत्र बनाते हैं, जिसके संतुलन पर मानव जीवन टिका है ।
जलवायु परिवर्तन ने हिमालयी क्षेत्र को विशेष रूप से संवेदनशील बना दिया है । हिमनदों और हिमतालों में परिवर्तन, अनियमित वर्षा, तापमान में वृद्धि और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाएँ हिमालयी समाज के लिए बढ़ता हुआ खतरा हैं । विशेषज्ञों ने पहले भी रसुवा की ल्हेन्दे–भोटेकोशी बाढ़ के संदर्भ में भारी वर्षा के बजाय हिमताल टूटने या बर्फ÷मलबे के अचानक बहाव जैसी संभावनाओं की जांच की आवश्यकता बताई थी ।
हमने यदि पहाड़ काटे, नदियों के किनारे कब्जाए, जंगल घटाए और प्रकृति की चेतावनियों को अनदेखा किया, तो आपदा को केवल ‘प्राकृतिक’ कह देना हमारे अपराध को छोटा नहीं कर देगा ।
आवश्यकता इस बात की है कि नदी किनारे निर्माण की सीमाएँ तय हों । हिमतालों और ग्लेशियरों की निरंतर निगरानी हो । भूकंपीय और भूगर्भीय संवेदनशीलता को विकास योजनाओं का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए । जलविद्युत परियोजनाओं के लिए केवल आर्थिक व्यवहार्यता नहीं, बल्कि दीर्घकालीन पर्यावरणीय और आपदा जोखिम मूल्यांकन भी अनिवार्य हो ।
स्थानीय समुदायों को पूर्व चेतावनी प्रणाली से जोड़ा जाए । और सबसे महत्वपूर्ण–नदियों के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र को अतिक्रमण से मुक्त रखा जाए । प्रकृति को जीतने का दावा करने वाला मनुष्य अंततः उसी प्रकृति पर निर्भर है । प्रकृति पर प्रहार अंततः मनुष्य के अपने अस्तित्व पर प्रहार है ।

सम्पादक
हिमालिनी


