भारत-नेपाल संबंधों में मधेस: पीएम बालेन्द्र शाह के दौरे से पहले एक अहम लेकिन अनदेखा मुद्दा
राकेश मिश्रा के स्टेटस से, काठमांडू, 7 ऑक्टोबर । नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की आगामी भारत यात्रा की तैयारियां जोरों पर हैं। इन दिनों काठमांडू और नई दिल्ली में व्यापार, कनेक्टिविटी, ऊर्जा, सीमा विवाद, सुरक्षा और चीन-अमेरिका से जुड़े व्यापक भू-राजनीतिक परिदृश्य पर खूब चर्चा हो रही है। लेकिन, नेपाल-भारत संबंधों के उतार-चढ़ाव को हमेशा से तय करने वाला एक अहम कारक इस पूरी बातचीत से स्पष्ट रूप से गायब है—और वह है ‘मधेस’।
मधेस: केवल घरेलू मुद्दा नहीं
विशेषज्ञों का मानना है कि मधेस का मुद्दा केवल कोई भावनात्मक या घरेलू विषय नहीं है। द्विपक्षीय तनावों के इतिहास पर करीब से नजर डालें तो पता चलता है कि नेपाल-भारत संबंधों में आए सबसे मुश्किल दौर का सीधा कनेक्शन मधेस से रहा है।
2015 का नेपाली संविधान और उसके बाद हुआ मधेस आंदोलन इसका सबसे ताजा उदाहरण है। यह विवाद केवल भारत-नेपाल संबंधों तक सीमित नहीं था; बल्कि यह तराई/मधेस में प्रतिनिधित्व, नागरिकता, संघीय सीमाओं और राजनीतिक समावेशन के अनसुलझे सवालों से उपजा था। लेकिन चूंकि मधेस सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से भारत के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है, इसलिए नेपाल का यह आंतरिक संवैधानिक संकट जल्द ही एक द्विपक्षीय विवाद में बदल गया।
यही पैटर्न पुरानी घटनाओं में भी दिखता है। 1989 का व्यापार और पारगमन (ट्रांजिट) संकट हो या नागरिकता, वर्क परमिट और खुली सीमा पर आवाजाही से जुड़े पुराने विवाद, इन सभी ने यह साबित किया है कि नेपाल के दक्षिणी मैदानी इलाकों में रहने वाले लोगों से जुड़ी नीतियां सीधे तौर पर दोनों देशों के व्यापक संबंधों को प्रभावित करती हैं। काठमांडू के लिए जो एक आंतरिक प्रशासनिक या संवैधानिक सवाल होता है, वह खुली सीमा के किनारे बसे समुदायों के लिए एक बिल्कुल अलग मायने रखता है।
बदलती भू-राजनीति और मधेस की रणनीतिक अहमियत
आज का भू-राजनीतिक संदर्भ भी तेजी से बदल रहा है। नेपाल में चीनी निवेश और रणनीतिक जुड़ाव का विस्तार हो रहा है, जबकि विकास और बुनियादी ढांचे के जरिए अमेरिकी दिलचस्पी भी बढ़ी है। ऐसे में नेपाल के दक्षिणी मैदानी हिस्से को केवल एक ‘सुरक्षा सीमा’ (सिक्योरिटी फ्रंटियर) के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह क्षेत्र नेपाल का प्रमुख व्यापारिक प्रवेश द्वार (कमर्शियल गेटवे) है और यहां की आबादी के भारत के साथ असाधारण रूप से घने सामाजिक और आर्थिक संबंध हैं।
काठमांडू और नई दिल्ली के लिए संदेश
इस पूरी स्थिति में काठमांडू के लिए एक स्पष्ट संदेश छिपा है: मधेस को राजनीतिक रूप से अलग-थलग या रणनीतिक रूप से नजरअंदाज करके भारत के साथ कभी भी स्थिर संबंध नहीं बनाए जा सकते। यह क्षेत्र भारत के साथ नेपाल का मुख्य सामाजिक और आर्थिक पुल है।
वहीं, नई दिल्ली के लिए भी यह एक सबक है: मधेस को केवल भारतीय प्रभाव, सीमा सुरक्षा या चुनावी गणित के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक जटिल राजनीतिक समाज है जिसकी अपनी आकांक्षाएं, शिकायतें और नेपाली सत्ता के साथ लगातार विकसित हो रहा अपना एक अलग रिश्ता है।
परिपक्व कूटनीति यह नहीं है कि मधेस की हर शिकायत को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना दिया जाए, और न ही यह मान लेना सही है कि मधेस कोई मायने नहीं रखता। काठमांडू को मधेस की बात सुननी चाहिए और दिल्ली को मधेस को समझना चाहिए। दोनों राजधानियों को यह स्वीकार करना होगा कि दक्षिणी मैदानी इलाकों की राजनीतिक गतिशीलता को नजरअंदाज करने की एक भारी रणनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
निष्कर्ष
नेपाल-भारत संबंधों का भविष्य अब केवल काठमांडू और नई दिल्ली के गलियारों में तय नहीं होगा। इसकी रूपरेखा बीरगंज, जनकपुर, विराटनगर, भैरहवा, नेपालगंज और पूरे मधेस बेल्ट में भी गढ़ी जाएगी। मधेस नेपाल-भारत संबंधों में कोई हाशिए का मुद्दा नहीं है; यह इस रिश्ते की सबसे केंद्रीय और अहम सच्चाइयों में से एक है।



