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मोरक्को की पहली महिला प्रधानमंत्री: ऐतिहासिक उपलब्धि या महिला अधिकारों की असली परीक्षा?

 

काठमांडू।

मोरक्को के राजा मोहम्मद षष्ठम द्वारा फातिमा ज़हरा एल मंसूरी को देश की पहली महिला प्रधानमंत्री नियुक्त किए जाने के बादमहिलाओं के सर्वोच्च राजनीतिक पद पर पहुँचने की क्षमता और अधिकारों को लेकर बहस फिर तेज हो गई है। कुछ लोगों ने इस नियुक्ति को महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है, जबकि कुछ धार्मिक और परंपरावादी समूहों ने इस पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि नियुक्ति से अधिक महत्त्वपूर्ण यह होगा कि नई प्रधानमंत्री महिलाओं के अधिकारों के लिए क्या कदम उठाती हैं।

मोरक्को की पूर्व न्यायमंत्री और इस्लामवादी नेतृत्व वाली सरकार में काम कर चुके मुस्तफा रामिद ने इसी महीने फेसबुक पर एक विस्तृत टिप्पणी लिखकर महिलाओं के देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद पर आसीन होने की उपयुक्तता पर सवाल उठाया था। उन्होंने इस्लामी परंपरा से जुड़ी एक कथन का उल्लेख किया, जिसका आशय है कि जिस समुदाय ने अपने कार्यों की जिम्मेदारी किसी महिला को सौंप दी, वह सफल नहीं होगा।

मुस्लिम बहुसंख्यक देश मोरक्को में समानता और शासन की जिम्मेदारी के बीच संतुलन की आवश्यकता बताते हुए रामिद ने यह तर्क भी दिया कि देश का सर्वोच्च पद, यानी राजा का पद, पुरुष के लिए सुरक्षित है।

मोरक्को एक संवैधानिक राजतंत्र है, लेकिन देश की कार्यपालिका और राजनीतिक व्यवस्था पर 63 वर्षीय राजा मोहम्मद षष्ठम का व्यापक प्रभाव बना हुआ है। एल मंसूरी की पार्टी ‘ऑथेंटिसिटी एंड मॉडर्निटी पार्टी’ (पीएएम) ने सितंबर में हुए संसदीय चुनाव में सबसे अधिक सीटें जीती थीं। इसके बाद पार्टी ने तीन अन्य दलों के साथ गठबंधन की घोषणा की। गठबंधन के चारों दलों के पास संसद की कुल 395 सीटों में से 207 सीटें हैं।

50 वर्षीय एल मंसूरी की नियुक्ति मोरक्को की महिलाओं के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जा रही है। हालांकि, इसने राजनीतिक सत्ता में महिलाओं की भागीदारी को लेकर समाज में मौजूद असहजता और विरोध को भी उजागर किया है।

महिला नेतृत्व पर समाज की मिली-जुली प्रतिक्रिया

एल मंसूरी की नियुक्ति के अगले दिन स्थानीय टेलीविजन चैनल ‘चुफ टीवी’ ने सड़कों पर लोगों से पूछा कि सरकार का नेतृत्व किसी महिला के हाथ में होने पर उनकी क्या राय है। अधिकांश मध्यम आयु वर्ग और बुजुर्ग पुरुषों ने जवाब देने से पहले कुछ देर सोचा। कुछ लोगों ने कहा कि राजा निर्णय ले चुके हैं, इसलिए वे इसे स्वीकार करते हैं।

एक बुजुर्ग व्यक्ति ने कहा, “सरकार के प्रमुख पद पर महिला का होना मुझे असामान्य लगता है। मैं निश्चित नहीं हूँ कि इस विचार के साथ सहज हूँ या नहीं।”

मोरक्को में राजतंत्र की आलोचना करने पर कानूनी जोखिम भी हो सकता है। वहाँ के आपराधिक कानून में राजा, राजपरिवार और राजतंत्र का अपमान करने वाले कुछ प्रकार के वक्तव्यों को अपराध माना गया है।

सोशल मीडिया पर एल मंसूरी की नियुक्ति राजनीतिक व्यंग्य का विषय भी बनी। दो महिलाओं के एक-दूसरे के बाल खींचने का वीडियो व्यापक रूप से साझा किया गया। इसके साथ ऐसी टिप्पणियाँ की गईं कि प्रधानमंत्री और उनके सहयोगियों के बीच संसद में होने वाले मतभेद भी इसी तरह के विवाद में बदल सकते हैं।

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हालाँकि, अनेक युवा मोरक्कोवासियों, विशेषकर महिलाओं ने इस नियुक्ति का स्वागत किया है।

उत्तराधिकार, बहुविवाह और महिला अधिकारों का प्रश्न

मोरक्को में सामाजिक सोच बदल रही है, लेकिन धार्मिक और परंपरावादी विचारों का प्रभाव अब भी मजबूत है। लैंगिक समानता से जुड़े विवादों में परिवार संबंधी कानून सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों में शामिल हैं। इनमें पैतृक संपत्ति का बँटवारा, विवाह और तलाक जैसे विषय आते हैं।

मोरक्को के मौजूदा उत्तराधिकार कानून के अनुसार, समान परिस्थितियों में बेटी को सामान्यतः बेटे के हिस्से की आधी संपत्ति मिलती है। देश के सर्वोच्च इस्लामी धार्मिक विद्वानों की परिषद ने इस्लामी न्यायशास्त्र का हवाला देते हुए महिलाओं और पुरुषों को समान उत्तराधिकार देने की माँग का विरोध किया है।

परिषद ने ‘तासिब’ नामक नियम को हटाने के प्रस्ताव को भी स्वीकार नहीं किया है। इस नियम के कारण कुछ परिस्थितियों में बिना भाई वाली महिला को अपनी विरासत का एक हिस्सा दूर के पुरुष रिश्तेदारों के साथ बाँटना पड़ सकता है।

मोरक्को की राष्ट्रीय मानवाधिकार परिषद ने वर्ष 2022 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि उत्तराधिकार संबंधी असमान नियम महिलाओं में गरीबी बढ़ाने में योगदान देते हैं।

देश में कुछ शर्तों के अंतर्गत बहुविवाह भी कानूनी है। परिवार संबंधी कानून में संशोधन के प्रस्तावों में यह व्यवस्था शामिल करने की बात है कि महिला विवाह अनुबंध में यह शर्त रख सके कि उसका पति दूसरी शादी नहीं करेगा।

हालाँकि, प्रस्तावित व्यवस्था में कुछ अपवाद भी हैं। उदाहरण के लिए, पहली पत्नी के संतान उत्पन्न करने में असमर्थ होने या बीमार होने जैसी परिस्थितियों से संबंधित प्रावधानों पर विचार किया गया है। महिला अधिकार संगठनों ने आशंका जताई है कि ऐसे अपवाद महिलाओं की निजता और स्वास्थ्य संबंधी सूचनाओं की सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं।

ये सभी मुद्दे मोरक्को के परिवार कानून ‘मुदावाना’ में संशोधन की बहस के केंद्र में हैं। यह कानून विवाह, तलाक और बच्चों की अभिभावकता जैसे विषयों को नियंत्रित करता है। परिवार कानून में संशोधन का प्रस्ताव वर्ष 2024 में घोषित किया गया था, लेकिन प्रस्तावित सुधार अभी तक कानून का रूप नहीं ले सके हैं।

ग्रामीण किशोरियों की शिक्षा भी बड़ी चुनौती

महिला अधिकारों के अतिरिक्त नई प्रधानमंत्री से ग्रामीण क्षेत्रों में किशोरियों की शिक्षा सुधारने की अपेक्षा भी की जा रही है।

मोरक्को के आधिकारिक राष्ट्रीय सांख्यिकी निकाय, उच्च योजना आयोग के वर्ष 2025 में जारी आँकड़ों के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में 15 से 17 वर्ष आयु वर्ग की केवल 55 प्रतिशत लड़कियाँ स्कूल जा रही थीं। शहरी क्षेत्रों में यह अनुपात 100 प्रतिशत बताया गया।

ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी, कम उम्र में विवाह और बीच में पढ़ाई छोड़ने की समस्या किशोरियों की शिक्षा में बाधा बन रही है।

युवा मोरक्कोवासी चिफाए लाजुजी ने बीबीसी से कहा कि ग्रामीण मोरक्को में अनेक लड़कियाँ कम उम्र में ही स्कूल छोड़ देती हैं। स्कूल दूर होने, सुरक्षित परिवहन उपलब्ध न होने और परिवारों की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण लड़कियों की शिक्षा प्रभावित होती है।

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उन्होंने यह भी कहा कि मासिक धर्म के दौरान उपयोग की जाने वाली स्वच्छता सामग्री खरीदने में असमर्थता भी कुछ लड़कियों के स्कूल छोड़ने का कारण बनती है। उनके अनुसार, मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य को अब भी वर्जित विषय माना जाता है। वह चाहती हैं कि स्कूलों में इस अवधि में इस्तेमाल होने वाली आवश्यक सामग्री निःशुल्क उपलब्ध कराई जाए।

दो दशक से अधिक का राजनीतिक अनुभव

एल मंसूरी राजनीति में नई नहीं हैं। सार्वजनिक जीवन में दो दशक से अधिक समय बिताने के दौरान वह माराकेश शहर की मेयर रह चुकी हैं। उन्होंने विभिन्न सरकारी पदों पर काम किया है और संसद में भी प्रतिनिधित्व किया है।

इससे पहले प्रधानमंत्री अजीज अखानुश के नेतृत्व वाली सरकार में उन्होंने पाँच वर्ष तक राष्ट्रीय क्षेत्रीय नियोजन, शहरी नियोजन, आवास और नगर नीति से संबंधित मंत्री के रूप में कार्य किया था।

प्रधानमंत्री नियुक्त होने के बाद एल मंसूरी ने इसे मोरक्को की महिलाओं के लिए ऐतिहासिक क्षण बताया।

उन्होंने कहा, “सरकार का नेतृत्व करने वाली पहली महिला होना केवल मेरे व्यक्तिगत गर्व का विषय नहीं है, बल्कि यह राज्य की सभी महिलाओं के लिए गर्व की बात है।”

हालाँकि, उन्होंने अभी तक स्पष्ट नहीं किया है कि वह परिवार कानून में संशोधन के प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए क्या योजना बना रही हैं। उनके राजनीतिक जीवन में महिला अधिकारों को लेकर कोई प्रमुख सार्वजनिक रुख सामने नहीं आया है। उत्तराधिकार, बहुविवाह और परिवार कानून में सुधार पर व्यापक बहस के दौरान भी उन्होंने स्पष्ट स्थिति व्यक्त नहीं की थी।

क्या महिला प्रधानमंत्री की नियुक्ति से बदलेगी राजनीतिक व्यवस्था?

ब्रिटेन के एक्सेटर विश्वविद्यालय में ग्लोबल साउथ का अध्ययन करने वाली विशेषज्ञ डॉ. आइरीन फर्नांडीज-मोलिना ने एल मंसूरी की नियुक्ति को मोरक्को की व्यापक राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में देखने की आवश्यकता बताई है।

उन्होंने बीबीसी से कहा कि सितंबर के संसदीय चुनाव में दो बातें प्रमुख थीं—पिछले दो दशकों में सबसे कम मतदान और राजा मोहम्मद षष्ठम द्वारा देश के इतिहास में पहली बार किसी महिला को प्रधानमंत्री नियुक्त करना।

उनके अनुसार, इन दोनों घटनाओं को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, पंजीकृत मतदाताओं में से केवल 38 प्रतिशत ने चुनाव में मतदान किया था। मतदान के योग्य सभी नागरिकों को आधार मानने पर यह अनुपात और कम था।

फर्नांडीज-मोलिना ने एल मंसूरी की नियुक्ति को ‘सत्तावादी राज्य नारीवाद’ के उदाहरण के रूप में व्याख्यायित किया। उनके अनुसार, इस अवधारणा में सत्ता अपनी वैधता और आधुनिक छवि को मजबूत करने के लिए ऊपर से चुनिंदा रूप में महिला अधिकारों के एजेंडे को अपनाती है।

उनका मानना है कि किसी महिला को सरकार के सर्वोच्च पद पर नियुक्त करके राजतंत्र आधुनिकीकरण और प्रगति का संदेश देना चाहता हो सकता है। लेकिन केवल नियुक्ति से राजनीतिक व्यवस्था या सामाजिक सुधारों की गति बदल जाएगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है।

ऐतिहासिक उपलब्धि, लेकिन पृष्ठभूमि पर भी सवाल

मोरक्को की महिला अधिकार कार्यकर्ता यास्मिना बेन्स्लिमाने के अनुसार, एल मंसूरी की नियुक्ति ने एक पुरानी बाधा को तोड़ा है। लेकिन प्रधानमंत्री पद तक पहुँचने में उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक संपर्कों की भूमिका को भी समझना आवश्यक है।

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बेन्स्लिमाने ने कहा कि यह नियुक्ति पुरानी धारणाओं को चुनौती देती है, क्योंकि इससे वह बाधा टूटी है जिसे अब तक पार नहीं किया जा सका था। लेकिन एल मंसूरी वहाँ तक कैसे पहुँचीं, यह भी महत्त्वपूर्ण प्रश्न है।

एल मंसूरी के दिवंगत पिता पाशा यानी वरिष्ठ स्थानीय अधिकारी थे और कूटनीतिज्ञ के रूप में भी कार्य कर चुके थे। बेन्स्लिमाने के अनुसार, उनकी सुविधासंपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक नेटवर्क तक पहुँच ने उन्हें उन अनेक महिलाओं की तुलना में बेहतर अवसर दिए, जिन्हें सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

बेन्स्लिमाने और कई महिला अधिकार संगठनों के लिए मुदावाना यानी परिवार कानून में सुधार नई सरकार की प्रमुख परीक्षाओं में से एक होगा।

हालाँकि, एल मंसूरी कितने और किस प्रकार के सुधार कर पाएँगी, यह देश की राजनीतिक व्यवस्था पर भी निर्भर करेगा। रक्षा और विदेश नीति जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में राजा के व्यापक अधिकार हैं। सरकार के प्रमुख को अधिकारों के विभाजन वाली राजनीतिक व्यवस्था के भीतर काम करना पड़ता है।

परिवार कानून में संशोधन के लिए उन्हें धार्मिक विद्वानों की उस परिषद से भी संवाद और सहमति की चुनौती का सामना करना होगा, जिसके सदस्य मुख्यतः पुरुष हैं।

नियुक्ति से अधिक महत्त्वपूर्ण होगा उनका काम

मोरक्को की कुछ महिलाओं ने एल मंसूरी की नियुक्ति का स्वागत किया है, लेकिन उनका मानना है कि प्रधानमंत्री के रूप में उनके वास्तविक काम से ही इस ऐतिहासिक उपलब्धि का महत्त्व तय होगा।

युवा मोरक्कोवासी सारा जुइतेन ने बीबीसी से कहा, “मुझे नहीं लगता कि एल मंसूरी का मूल्यांकन केवल महिला होने के आधार पर किया जाना चाहिए। सत्ता में महिला के पहुँचने का अर्थ यह नहीं है कि वह स्वतः महिला अधिकारों की समर्थक बन जाएगी।”

उन्होंने आगे कहा कि उनकी पार्टी स्वयं को आधुनिकीकरण समर्थक राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है। इसलिए यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि उसका दावा वास्तविक बदलाव में बदलता है या नहीं।

मोरक्को की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में एल मंसूरी ने इतिहास में स्थान बना लिया है। लेकिन महिला अधिकारों, शिक्षा, उत्तराधिकार, बहुविवाह और परिवार कानून में सुधार के लिए वह क्या कदम उठाती हैं, यह प्रश्न अभी अनुत्तरित है।

राजा, धार्मिक नेतृत्व और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं की अलग-अलग अपेक्षाओं के बीच वह किस तरह काम करती हैं, इससे उनके कार्यकाल की दिशा निर्धारित होगी।

निष्कर्षतः, किसी महिला का सर्वोच्च राजनीतिक पद पर पहुँचना प्रतिनिधित्व की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन वास्तविक लैंगिक समानता का आकलन उसके अधिकारों, नीतियों और निर्णयों के प्रभाव से ही किया जा सकता है। यदि एल मंसूरी महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता, संपत्ति में समान अधिकार और सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में ठोस सुधार ला पाती हैं, तो उनकी नियुक्ति केवल प्रतीकात्मक उपलब्धि न रहकर व्यापक सामाजिक परिवर्तन का आधार बन सकती है।

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