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नेपाल में भारत-विरोधी राष्ट्रवाद की सतही समझ: इतिहास, पहचान और राजनीति के अनसुलझे सवाल

 

हिमालिनी ऑनलाइन | विचार एवं विश्लेषण

क्या नई पीढ़ी की आर्थिक प्राथमिकताओं के साथ नेपाल में भारत-विरोधी राष्ट्रवाद का दौर समाप्त हो गया है, या इसकी जड़ें आज भी देश की ऐतिहासिक संरचना, राष्ट्रीय पहचान और आंतरिक राजनीति में मौजूद हैं ?

काठमांडू, हिमालिनी ऑनलाइन डेस्क, 23 ऑक्टोबर।

नेपाल के अर्थमंत्री स्वर्णिम वाग्ले द्वारा नई दिल्ली में नेपाल में भारत-विरोधी राष्ट्रवाद (Anti-Indian Nationalism) का दौर समाप्त होने संबंधी कथित टिप्पणी ने एक महत्वपूर्ण वैचारिक और राजनीतिक बहस को जन्म दिया है। इस संदर्भ में राकेश मिश्रा ने अपने सोशल मीडिया स्टेटस के माध्यम से नेपाल में राष्ट्रवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, राजनीतिक उपयोगिता और सामाजिक प्रभावों पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

मिश्रा का मानना है कि नेपाल में भारत-विरोधी राष्ट्रवाद को केवल कम्युनिस्ट विचारधारा या पुरानी पीढ़ी की राजनीतिक मानसिकता का परिणाम मानना समस्या की अधूरी और सतही व्याख्या है।

 क्या नई पीढ़ी के साथ बदल रहा है नेपाली राष्ट्रवाद?

अर्थमंत्री वाग्ले के कथन के अनुसार, नेपाल में भारत-विरोधी राष्ट्रवाद के कमजोर पड़ने के पीछे वैचारिक प्रभाव में कमी और पीढ़ीगत परिवर्तन महत्वपूर्ण कारण हो सकते हैं। नई पीढ़ी अब राजनीतिक विचारधाराओं की अपेक्षा आर्थिक विकास, रोजगार, अवसर और समृद्धि को अधिक प्राथमिकता दे रही है।

राकेश मिश्रा इस तर्क को पूरी तरह खारिज नहीं करते। उनके अनुसार, इसमें आंशिक सच्चाई अवश्य है, लेकिन केवल राजनीतिक विचारधाराओं के कमजोर होने से उन ऐतिहासिक और सामाजिक संरचनाओं का अंत नहीं हो जाता, जिन्होंने किसी विशेष राष्ट्रवादी भावना को जन्म दिया था।

उनका सवाल है कि यदि भारत-विरोधी राष्ट्रवाद की जड़ें नेपाल के राज्य निर्माण और राष्ट्रीय पहचान की प्रक्रिया में मौजूद हैं, तो केवल पीढ़ीगत बदलाव के आधार पर उसके समाप्त होने की घोषणा कैसे की जा सकती है?

 भारत-विरोधी राष्ट्रवाद की जड़ें केवल कम्युनिस्ट राजनीति में नहीं

मिश्रा के विश्लेषण के अनुसार, नेपाल में भारत-विरोधी राष्ट्रवाद का निर्माण केवल कम्युनिस्ट दलों ने नहीं किया। इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आधुनिक नेपाली राज्य के निर्माण, राजतंत्र की राष्ट्र-निर्माण परियोजना तथा एक भाषा, एक वेशभूषा और पहाड़ी हिंदू सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय पहचान के केंद्र में स्थापित करने की प्रक्रिया से भी जुड़ी हुई है।

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नेपाल और भारत के बीच ऐतिहासिक संबंधों में उत्पन्न तनावों ने भी इस भावना को प्रभावित किया है।

1814–1816 का ऐंग्लो-नेपाल युद्ध और 1816 की सुगौली संधि, 1950 की भारत–नेपाल शांति एवं मैत्री संधि, 1989–90 का व्यापार एवं पारगमन संकट तथा 2015 में नेपाल के नए संविधान की घोषणा के बाद उत्पन्न सीमा और आपूर्ति संकट ऐसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम रहे हैं, जिन्होंने नेपाली राष्ट्रवाद की राजनीतिक अभिव्यक्ति को प्रभावित किया।

मिश्रा के अनुसार, कम्युनिस्ट दलों ने भारत-विरोधी भावना को वैचारिक आधार अवश्य दिया, लेकिन राजतंत्र समर्थक शक्तियों, लोकतांत्रिक दलों और अन्य राष्ट्रवादी समूहों ने भी समय-समय पर अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप इसका उपयोग किया।

इसलिए भारत-विरोधी राष्ट्रवाद को किसी एक राजनीतिक विचारधारा से जोड़कर देखना ऐतिहासिक वास्तविकताओं को सीमित कर देना होगा।

राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा और भारत-विरोध में अंतर

नेपाल और भारत के बीच गहरे सांस्कृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक और सामाजिक संबंध हैं। इसके बावजूद नेपाल का अपनी स्वतंत्र राष्ट्रीय पहचान को सुरक्षित रखने का प्रयास स्वाभाविक और वैध है।

लेकिन मिश्रा के अनुसार, समस्या तब उत्पन्न होती है जब नेपाली राष्ट्रीय पहचान को भारत से दूरी बनाकर या भारत-विरोधी भावना प्रदर्शित करके प्रमाणित करने की कोशिश की जाती है।

राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा करना और भारत-विरोधी होना दो अलग-अलग बातें हैं। इसी प्रकार भारत सरकार की नीतियों की आलोचना करना भी अपने आप में भारत-विरोधी राष्ट्रवाद नहीं माना जा सकता।

किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र को अपने पड़ोसी देश की नीतियों से असहमति रखने का अधिकार है। लेकिन उस असहमति को स्थायी राष्ट्रीय पहचान या राजनीतिक वैधता का आधार बना देना एक अलग प्रवृत्ति है।

 मधेश की पहचान और आंतरिक समावेशिता का प्रश्न

मिश्रा ने नेपाल के भारत-विरोधी राष्ट्रवाद के आंतरिक सामाजिक प्रभावों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है।

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विशेष रूप से मधेश और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों की भाषा, संस्कृति, पारिवारिक रिश्ते, व्यापारिक गतिविधियां और सामाजिक जीवन भारत के सीमावर्ती समाजों से गहराई से जुड़े हुए हैं।

ऐसे में इन सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों को राष्ट्रीय निष्ठा के संदर्भ में संदेह की दृष्टि से देखना गंभीर समस्या पैदा कर सकता है।

मिश्रा के अनुसार, जब भारत से सांस्कृतिक निकटता को नेपाली नागरिकता या राष्ट्रीय प्रतिबद्धता की कसौटी बनाया जाता है, तब बाहरी राष्ट्रवाद देश के भीतर नागरिकता, समानता और समावेशिता से जुड़े प्रश्नों को भी जन्म देता है।

2015 के संवैधानिक संकट ने इस जटिलता को विशेष रूप से उजागर किया था। उस समय मधेश में उठे राजनीतिक और संवैधानिक सवाल भारत की कथित भूमिका तथा सीमा पर उत्पन्न संकट से जुड़ गए थे।

इस घटनाक्रम ने दिखाया कि नेपाल की आंतरिक राजनीतिक असहमति और भारत के साथ उसके संबंध कई बार एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।

आर्थिक विकास की चाह से क्या समाप्त हो जाएगा सांस्कृतिक पूर्वाग्रह?

नई पीढ़ी का रोजगार, उद्यमिता, आर्थिक विकास और समृद्धि की ओर आकर्षित होना सकारात्मक परिवर्तन है। लेकिन मिश्रा के अनुसार, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पुरानी राष्ट्रवादी मानसिकताएं स्वतः समाप्त हो गई हैं।

आर्थिक व्यावहारिकता और सांस्कृतिक पूर्वाग्रह एक ही समाज में साथ-साथ मौजूद रह सकते हैं।

कोई व्यक्ति भारत के साथ व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग का समर्थन कर सकता है, लेकिन साथ ही उसकी सोच में भारत के प्रति ऐतिहासिक अविश्वास या सांस्कृतिक दूरी की भावना भी मौजूद हो सकती है।

इसलिए नेपाल में राष्ट्रवाद के बदलते स्वरूप को समझने के लिए केवल आयु या पीढ़ी के आधार पर निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं होगा।

इसके लिए विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों, सामाजिक समुदायों, राजनीतिक विचारधाराओं और पीढ़ियों के बीच जनमत तथा सामाजिक दृष्टिकोण का गंभीर अध्ययन आवश्यक है।

 नेपाल–भारत संबंधों में सुधार के लिए आत्मविश्लेषण जरूरी

राकेश मिश्रा के अनुसार, नेपाल और भारत के बीच संबंधों को मजबूत बनाने के लिए आर्थिक सहयोग, कूटनीतिक संवाद, व्यापारिक साझेदारी और पारस्परिक विश्वास अत्यंत आवश्यक हैं।

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लेकिन स्थायी और सार्थक सुधार के लिए केवल आर्थिक हितों पर आधारित संबंध पर्याप्त नहीं होंगे।

नेपाल को यह भी समझना होगा कि उसकी राष्ट्रीय पहचान किन ऐतिहासिक परिस्थितियों में निर्मित हुई, भारत-विरोधी भावना विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के लिए बार-बार उपयोगी क्यों साबित हुई और देश के भीतर मौजूद सामाजिक असमानताओं ने इस प्रवृत्ति को किस प्रकार प्रभावित किया।

मिश्रा का विश्लेषण इस बुनियादी सवाल पर केंद्रित है कि नेपाल का राष्ट्रवाद बार-बार भारत-विरोध के माध्यम से अपनी वैधता स्थापित करने की आवश्यकता क्यों महसूस करता है।

### राजनीतिक आशावाद या ऐतिहासिक वास्तविकता?

मिश्रा के अनुसार, भारत-विरोधी राष्ट्रवाद समाप्त हो चुका है या नहीं, यह बहस का केवल एक पहलू है। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस राष्ट्रवाद को जन्म देने वाली ऐतिहासिक, राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां कितनी बदली हैं।

इन परिस्थितियों का गहराई से अध्ययन किए बिना किसी युग के समाप्त होने की घोषणा करना गंभीर राजनीतिक विश्लेषण की अपेक्षा राजनीतिक आशावाद या अवसरवाद भी हो सकता है।

उनका निष्कर्ष है कि नेपाल–भारत संबंधों को वास्तव में नई दिशा देने के लिए नेपाल को सबसे पहले अपनी राष्ट्रीय पहचान, राजनीतिक इतिहास और सामाजिक अंतर्विरोधों को समझना होगा।

इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि भारत के साथ संबंध सुधारने से पहले नेपाल को अपने भीतर मौजूद राष्ट्रवाद की प्रकृति और उसके ऐतिहासिक आधारों का ईमानदारी से आत्मविश्लेषण करना चाहिए।

संदर्भ: यह आलेख राकेश मिश्रा के सोशल मीडिया स्टेटस में व्यक्त विचारों पर आधारित हिंदी समाचार-विश्लेषण है। अर्थमंत्री स्वर्णिम वाग्ले के कथन का उल्लेख मूल स्टेटस के आधार पर किया गया है; उनके भाषण के मूल पाठ से स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।

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