कुर्सी से वंचित होने से अपनी पहचान बनाने तक : सुनीता देवी मेस्तर्नी
सुनीता देवी मेस्तर्नी, जनकपुरधाम, 7 नवंबर। मेरी राजनीतिक यात्रा किसी शौक या व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा का परिणाम नहीं, बल्कि संयोग, जिम्मेदारी और संघर्ष की उपज है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन मैं भी राजनीति में प्रवेश करूँगी, जनता की प्रतिनिधि बनूँगी और दलित समुदाय के अधिकारों के लिए सार्वजनिक रूप से आवाज उठाऊँगी। लेकिन समय और परिस्थितियों ने मुझे राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। इस यात्रा में मैंने अवसर के साथ अपमान, सम्मान के साथ भेदभाव, सहयोग के साथ असहयोग और सफलता के साथ अनेक पीड़ाएँ भी झेली हैं।
नेपाल का संविधान २०७२ जारी होने के बाद वर्ष २०७४ में पहली बार स्थानीय तह का चुनाव हुआ। उसी चुनाव में मैं जनकपुरधाम उपमहानगरपालिका के वार्ड नंबर ३ से वार्ड सदस्य के रूप में निर्वाचित हुई। इसके बाद कार्यपालिका सदस्य के चुनाव में भी मुझे जीत हासिल हुई। मेरे लिए यह एक बड़ी उपलब्धि थी। मेरे समुदाय के लोग बहुत खुश थे। वर्षों से राज्य की मुख्यधारा और निर्णय प्रक्रिया से वंचित रहे दलित समुदाय की एक महिला का जनप्रतिनिधि बनना अपने आप में गौरव की बात थी।
लेकिन मेरी खुशी के साथ ही एक नए संघर्ष की शुरुआत भी हुई। निर्वाचित होने के बाद मुझे महसूस हुआ कि चुनाव जीतना और समाज में समान व्यवहार तथा सम्मान प्राप्त करना दो अलग-अलग बातें हैं। जनप्रतिनिधि का पद हासिल करने के बावजूद जातिगत भेदभाव, सामाजिक उपेक्षा और राजनीतिक असमानता से मुक्त होना आसान नहीं था।
तत्कालीन महन्थ ठाकुर के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनता पार्टी से मैं जनप्रतिनिधि बनी थी। हमारे वार्ड में दलित समुदाय के मतदाताओं की संख्या काफी थी। इसलिए संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार दलित महिला सदस्य के पद पर मुझे उम्मीदवार बनाया गया था। इसका एक अन्य संभावित कारण यह भी हो सकता है कि मैं दूसरे उम्मीदवारों की तुलना में कुछ अधिक शिक्षित थी। मेरी सास पहले से ही उस पार्टी को सहयोग करती आ रही थीं। संभवतः मेरी राजनीतिक उम्मीदवारी में उनकी भी भूमिका रही होगी।
वास्तव में मेरे परिवार में मुझे राजनीति में लाने की कोई इच्छा नहीं थी। लेकिन मेरे पति की प्रबल इच्छा, विश्वास और प्रोत्साहन ने मुझे आगे बढ़ने का साहस दिया। अंततः मैं चुनाव में शामिल हुई और जनता के मतों से निर्वाचित हुई।
शपथ ग्रहण के बाद विभिन्न सभाओं, सम्मेलनों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में मुझे भी आमंत्रित किया जाने लगा। शुरुआती दिनों में मैं प्रायः चुपचाप और अकेले बैठकर कार्यक्रमों में शामिल होती थी। स्थानीय सरकार संचालन ऐन, जनप्रतिनिधियों के अधिकारों, जिम्मेदारियों और कार्यप्रणाली के बारे में मुझे पर्याप्त जानकारी नहीं थी। बैठकों में कैसे बोलना है, अपने विचार किस तरह रखने हैं और प्राप्त अधिकारों का उपयोग कैसे करना है, इन सभी विषयों में मैं बिल्कुल नई थी।
उस समय सभी लोग मुझे प्यार और स्नेह देते थे। विभिन्न कार्यक्रमों में बुलाते थे और सम्मान भी करते थे। पार्टी के नेता और कार्यकर्ता कहा करते थे, ‘हमारी पार्टी ने एक महादलित महिला को न केवल राजनीति में प्रवेश कराया, बल्कि जनप्रतिनिधि के रूप में चुनाव लड़ाकर निर्वाचित भी कराया।’
लेकिन समय बीतने के साथ मैं राजनीति को समझने लगी। अपने अधिकारों को पहचानने लगी और दलित समुदाय की समस्याओं तथा मुद्दों को सार्वजनिक रूप से उठाने लगी। इसके बाद लोगों के व्यवहार में बदलाव आने लगा। शुरुआत में दिखाया गया प्यार, सद्भाव और अपनापन धीरे-धीरे असहजता और असहयोग में बदलने लगा। मुझे महसूस होने लगा कि जो लोग मुझे जनप्रतिनिधि बनाने के लिए तैयार थे, वे मेरी आवाज सुनने के लिए उतने तैयार नहीं थे।
निर्वाचित होने के कुछ महीनों बाद ही मैंने दलित समुदाय के अधिकार, सम्मान और समानता के मुद्दों पर आवाज उठानी शुरू कर दी थी। इसके बाद मेरी मुश्किलें और बढ़ती गईं।
वार्ड स्तर की बैठकों में अन्य सदस्यों के लिए कुर्सियों की व्यवस्था होती थी, लेकिन दलित महिला सदस्य होने के कारण कई बार मेरे बैठने के लिए कुर्सी तक उपलब्ध नहीं कराई जाती थी। एक ही पद पर जनता के मतों से निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बीच इस तरह का व्यवहार देखकर मुझे बहुत पीड़ा होती थी। मेरे मन में बार-बार सवाल उठता था—क्या हम सभी जनता के मतों से निर्वाचित होकर नहीं आए हैं? जब हमारा पद और जिम्मेदारी समान है, तो हमारे साथ व्यवहार अलग-अलग क्यों?
जब मैं किसी विषय पर अपनी राय रखने की कोशिश करती थी, तो जवाब मिलता था, ‘चुपचाप बैठो, मैंने ही तुम्हें जिताकर यहाँ तक पहुँचाया है।’ ऐसा व्यवहार किया जाता था, मानो मेरे निर्वाचित होने का अर्थ यह हो कि मेरे पास अपने अधिकार और निर्णय लेने की स्वतंत्र क्षमता ही नहीं है।
वार्ड अध्यक्ष और नगर प्रमुख एक ही पार्टी के होने के कारण भी मेरी स्थिति सहज नहीं थी। निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने के बजाय जरूरत पड़ने पर मुझे केवल हस्ताक्षर करने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की जाती थी। न तो पर्याप्त बजट और अवसर उपलब्ध कराए जाते थे और न ही मेरी क्षमता तथा नेतृत्व विकास के लिए आवश्यक वातावरण तैयार किया जाता था।
मैं जनता की प्रतिनिधि थी, लेकिन अपने ही वार्ड की निर्णय प्रक्रिया में अपनी आवाज स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रही थी। यही मेरे राजनीतिक जीवन का सबसे पीड़ादायक पहलू था।
जब मैंने अपने अधिकारों के लिए बोलना शुरू किया, तब मेरे बारे में तरह-तरह की बातें होने लगीं। ‘सुनीता बहुत बोलने लगी है’, ‘उसका चरित्र अच्छा नहीं है’, ‘मैंने उसे जिताकर यहाँ तक पहुँचाया, उसने मेरे लिए क्या किया है?’ जैसी टिप्पणियाँ सुननी पड़ती थीं।
मुझे सबसे अधिक पीड़ा इस बात से होती थी कि मेरे द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब देने के बजाय मेरे व्यक्तिगत जीवन और चरित्र पर सवाल उठाए जाते थे। मैं दलित समुदाय के अधिकारों की बात करती थी, लेकिन उसे व्यक्तिगत स्वार्थ से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता था।
उस समय मुझे जातिगत भेदभाव के साथ-साथ पुरुषवादी सोच का भी सामना करना पड़ा। एक महिला का राजनीति में आकर अपनी राय रखना, सवाल करना और अधिकार माँगना कुछ लोगों के लिए सहज रूप से स्वीकार्य नहीं था। इसके ऊपर मैं दलित समुदाय की महिला थी। इसलिए मुझे महसूस होता था कि मेरी आवाज को कमजोर करने के लिए तरह-तरह के प्रयास किए जा रहे हैं।
कभी-कभी मेरे मन में सवाल उठता था कि इन सभी अपमानों को सहने के बजाय इस्तीफा देकर घर में बैठ जाना ही उचित होता। आखिर मुझे इतना अपमान क्यों सहना पड़े? अपने ही समुदाय के लिए आवाज उठाने पर मुझे बार-बार सफाई क्यों देनी पड़े?
लेकिन फिर मेरा मन कहता था कि मैं यहाँ केवल अपनी व्यक्तिगत इच्छा से नहीं आई हूँ। मेरे साथ एक पूरे समुदाय की आशा, विश्वास और प्रतिनिधित्व जुड़ा हुआ है। यदि मैंने ही हार मान ली, तो मेरे बाद राजनीति में आने वाली दलित महिलाओं के लिए भी रास्ता कठिन हो जाएगा।
हमारे समुदाय में शिक्षा और राजनीतिक चेतना की कमी थी। आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण राजनीतिक पहुँच और प्रभाव भी सीमित था। ऐसी स्थिति में मुझे आवश्यक सहयोग, समर्थन और संरक्षण नहीं मिल सका। इसके बावजूद मैंने खुद को संभालते हुए आगे बढ़ने का प्रयास जारी रखा।
मेरी राजनीतिक यात्रा में एक बेहद पीड़ादायक घटना भी घटी। जनकपुरधाम उपमहानगरपालिका में पत्रकारों और नगर प्रमुख सहित अन्य व्यक्तियों के बीच विवाद बढ़ने के बाद झड़प की स्थिति पैदा हो गई। उक्त झड़प में मैं गंभीर रूप से घायल हो गई और इलाज के लिए जनकपुर अंचल अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।
उस समय मेरे शरीर पर चोटें आई थीं, लेकिन मन पर लगी चोट उससे कहीं अधिक गहरी थी। बीमार अवस्था में मुझे जिस संवेदनशीलता, सहयोग और मानवीय व्यवहार की अपेक्षा थी, वह नहीं मिल सका। जिस समय स्वास्थ्य उपचार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी, उस समय मेरी घटना को भी राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा गया। मुझे महसूस हुआ कि इलाज और मानवीय सहयोग जैसे विषयों पर भी राजनीति की जा रही थी।
इस घटना ने मुझे एक गंभीर बात सिखाई—राजनीति में कमजोर वर्ग और समुदाय का प्रतिनिधित्व करना ही पर्याप्त नहीं होता। संकट के समय साथ देने वाली व्यवस्था, सहयोग और संरक्षण भी उतने ही आवश्यक होते हैं।
नए अनुभवों, जातिगत भेदभाव, सामाजिक अपमान, राजनीतिक असहयोग और व्यक्तिगत पीड़ाओं के बीच मैंने अपना पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। यह यात्रा मेरे लिए आसान नहीं थी। कई बार निराश हुई, कई बार खुद को अकेला महसूस किया। लेकिन मैंने अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने का फैसला कभी नहीं किया।
आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो मुझे एक बात पर गर्व होता है। यदि मैंने हिम्मत नहीं की होती, किताबें पढ़कर अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों की जानकारी हासिल नहीं की होती और दलित समुदाय के लिए आवाज नहीं उठाई होती, तो शायद आज भी घर की चारदीवारी तक ही सीमित रहती। जनप्रतिनिधि बनने के बाद ही मुझे अपनी क्षमता पहचानने का अवसर मिला। मैं समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल हुई।
इस यात्रा ने मुझे सिखाया कि शिक्षा ही मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। शिक्षा के माध्यम से ही व्यक्ति अपने अधिकारों को पहचान सकता है। अधिकारों की पहचान होने के बाद उनके लिए संघर्ष करने का साहस पैदा होता है। मेरे भीतर यह विश्वास जागा है कि विचार स्पष्ट हों और इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ा जा सकता है।
मेरे राजनीतिक संघर्ष के साथ-साथ व्यक्तिगत जीवन की जिम्मेदारियाँ भी कम नहीं थीं। मेरे छह बच्चे हैं। आर्थिक अभाव, गरीबी, सामाजिक भेदभाव और अनेक कठिनाइयों के बावजूद मैं अपने सभी बच्चों को स्नातक स्तर तक शिक्षा दिलाने में सफल रही हूँ।
मेरे परिवार में राजनीति से जुड़ी कोई पुरानी पृष्ठभूमि नहीं थी। मैंने स्वयं भी पहले कभी राजनीति को करीब से नहीं समझा था। लेकिन जीवन की कठिनाइयों और अनुभवों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। मेरी हमेशा यही इच्छा रही कि हमने जिस अभाव और भेदभाव को झेला है, हमारे बच्चों को उसका सामना न करना पड़े। वे शिक्षित बनें और आत्मसम्मान के साथ जीवन जी सकें। इसी सोच के कारण मैंने हमेशा उनकी शिक्षा को प्राथमिकता दी।
अपने जीवन में झेली गई पीड़ाओं ने ही मुझे शिक्षा का महत्त्व समझाया। इसलिए मैंने यह मान्यता अपनाई कि चाहे कितनी भी कठिन परिस्थिति क्यों न आए, बच्चों की शिक्षा के साथ समझौता नहीं करना चाहिए।
आज जब अपने अतीत को याद करती हूँ, तो अनेक घटनाएँ आँखों के सामने आ जाती हैं। जनप्रतिनिधि बनने की खुशी, पहली बार सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होने का संकोच, बैठक में कुर्सी न मिलने की पीड़ा, अधिकारों के लिए बोलने पर सुननी पड़ी अपमानजनक टिप्पणियाँ, घायल होकर अस्पताल में बिताए दिन और पाँच वर्षों तक किया गया संघर्ष—ये सभी मेरे जीवन के अविस्मरणीय अनुभव हैं।
राजनीति में आने के बाद मैंने एक बात स्पष्ट रूप से समझी है—दलित महिलाओं को चुनाव में उम्मीदवार बना देना ही समावेशी लोकतंत्र नहीं है। उन्हें निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना, स्वतंत्र रूप से अपने विचार रखने का वातावरण तैयार करना, बजट और संसाधनों तक उनकी पहुँच सुनिश्चित करना तथा उन्हें समान सम्मान देना ही वास्तविक समावेशिता है।
दलित महिलाओं को राजनीति में प्रवेश करने पर केवल जातिगत भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता, बल्कि उन्हें पुरुषवादी सोच, आर्थिक विपन्नता, शैक्षिक पिछड़ेपन, राजनीतिक संरक्षण की कमी और अपने ही समुदाय के भीतर कमजोर सहयोग जैसी चुनौतियों से भी जूझना पड़ता है। इन तमाम बाधाओं के बीच उन्हें बार-बार अपनी क्षमता साबित करनी पड़ती है।
मेरी इच्छा है कि भविष्य में राजनीति में प्रवेश करने वाली दलित महिलाओं को मेरी तरह उपेक्षा, अपमान और भेदभाव का सामना न करना पड़े। उन्हें केवल पद तक पहुँचाकर औपचारिक प्रतिनिधि बनाने के बजाय निर्णय लेने का अधिकार और सम्मान भी दिया जाना चाहिए। ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित होनी चाहिए, जिसमें उनकी आवाज सुनी जाए और उनके विचारों को स्वीकार किया जाए।
मेरे जीवन ने मुझे सिखाया है कि भेदभाव इंसान को कमजोर बनाने की कोशिश करता है, लेकिन शिक्षा, आत्मविश्वास और संघर्ष उसे अपनी पहचान बनाने में सक्षम बनाते हैं। मैंने जीवन में बहुत कुछ खोया होगा, अनेक अपमान सहे होंगे, लेकिन अपना आत्मसम्मान और संघर्ष करने का साहस कभी नहीं खोया।
मैं सुनीता देवी मेस्तर्नी हूँ। मेरी पहचान केवल पूर्व वार्ड सदस्य होने तक सीमित नहीं है। मेरी वास्तविक पहचान अनेक चुनौतियों, भेदभाव और अपमान से लड़ते हुए अपनी आवाज और अस्तित्व स्थापित करने के संघर्ष में है। मैं चाहती हूँ कि मेरे जीवन के अनुभव भविष्य में राजनीति में प्रवेश करने वाली दलित महिलाओं के लिए एक सीख बनें। उन्हें भेदभाव और अपमान नहीं, बल्कि समानता, सम्मान और अवसरों से परिपूर्ण वातावरण में अपना नेतृत्व स्थापित करने का

